जीवन और मृत्यु को अलग मत कीजिए, वो एक ही साँस के दो नाम हैं:

हम अक्सर देखते हैं कि हमारी जिंदगी एक लगातार चलने वाले झगड़े की तरह बन गई है। सुबह से शाम तक, साल दर साल, बस एक संघर्ष चलता रहता है। कभी पैसे की चिंता, कभी रिश्तों की उलझन, कभी अपने ही मन से लड़ाई। हम इस संघर्ष को इतना सामान्य मान बैठे हैं कि शांति का नाम सुनते ही भीतर डर उठता है। लगता है अगर ये लड़ाई खत्म हो गई, तो फिर बच क्या जाएगा? पर सच तो ये है कि यही लड़ाई एक भ्रम है। हमने जीवन को टुकड़ों में बाँट रखा है। ये अच्छा है, ये बुरा है, ये मेरा है, ये तेरा है, ये जीवन है, ये मृत्यु है। इन्हीं टुकड़ों के बीच जो दरारें पैदा होती हैं, उनमें हमारा सारा संघर्ष पनपता है। जब हम इन दरारों को ध्यान से देखना शुरू करते हैं, तब समझ में आता है कि इन्हें हमारे अपने मन ने बनाया है।

 

ये जो हम हैं, ये चेतना जिसे हम अपना मन कहते हैं, वो कोई खाली पात्र नहीं है। उसमें वर्षों की धूल जमी हुई है। वो धूल है हमारा भय, हमारी पुरानी यादें, हमारी मान्यताएँ जिन्हें हमने बिना परखे स्वीकार कर लिया। हमें लगता है कि हम स्वतंत्र हैं, पर सच में हम उसी धूल से बनी दीवारों के भीतर कैद हैं। हर दिन हम वही दीवारें देखते हैं, वही रास्ते चलते हैं, वही सवाल दोहराते हैं। और इसी को जीवन समझ लेते हैं। पर ये जीवन नहीं, एक यांत्रिकता है। असली जीवन तो तब शुरू होता है जब ये मशीन कुछ क्षणों के लिए रुक जाती है, जब हम इस आदत भरे ढर्रे से बाहर झाँकते हैं।

 

जब हम द्वंद्व छोड़ते हैं, तो एक अलग तरह की ऊर्जा जन्म लेती है:

 

हमारे भीतर हमेशा दो आवाजें चलती रहती हैं। एक कहती है, ये करो। दूसरी कहती है, ये मत करो। एक कहती है, ये सही है। दूसरी कहती है, ये गलत है। इसी द्वंद्व में हमारी ऊर्जा बिखर जाती है। हम जितना सोचते हैं, उतना ही उलझते जाते हैं, क्योंकि सोचना भी उसी द्वंद्व का हिस्सा है। पर एक तरीका है बिना सोचे देखने का, बिना चुने समझने का। जैसे हम आकाश में चलते बादलों को देखते हैं। हम ये तय नहीं करते कि कौन सा बादल अच्छा है और कौन सा बुरा। वो बस होते हैं। ठीक वैसे ही अपने भीतर उठने वाले हर विचार, हर भावना को बिना लेबल लगाए देखिए। ये देखना कोई प्रयास नहीं है, बल्कि एक गहरा ठहराव है। इसी ठहराव में धीरे धीरे वो दोनों आवाजें शांत होने लगती हैं। फिर एक ऐसी अवस्था आती है जहाँ कोई चुनाव नहीं बचता, सिर्फ जागरूकता बचती है।

 

इस जागरूकता से जो ऊर्जा जन्म लेती है, वो बिल्कुल नई होती है। वो हमारी पुरानी ऊर्जा से अलग होती है, जो हमेशा संघर्ष में जलती रहती थी। अब वही ऊर्जा करुणा बन जाती है, रचनात्मकता बन जाती है। करुणा का अर्थ केवल किसी पर तरस खाना नहीं है। करुणा का अर्थ है दूसरे को अपने से अलग न देख पाना। जब ये अलगाव टूटता है, तो दूसरे की पीड़ा भी अपनी लगने लगती है, बिना किसी उपदेश के, बिना किसी कर्तव्य के। यही असली धर्म है। और यही वो एकमात्र चीज़ है जो दुनिया को भीतर से बदल सकती है, न कि कोई नया कानून या नई व्यवस्था।

 

जीवन और मृत्यु को अलग मत कीजिए, वो एक ही साँस के दो नाम हैं:

 

हम मृत्यु से बहुत डरते हैं। ये डर हमारी हर हरकत में छिपा होता है। हम बच्चे पैदा करते हैं ताकि कुछ हमारे बाद भी बचा रहे। हम धन इकट्ठा करते हैं ताकि नाम बना रहे। हम मंदिर और स्मारक बनवाते हैं ताकि किसी तरह अमर हो जाएँ। पर ये सब भागने के तरीके हैं। मृत्यु कहीं बाहर नहीं है। वो हमारे जीने के हर पल में मौजूद है। जैसे साँस लेने के बाद उसे छोड़ना पड़ता है, वैसे ही हर शुरुआत के साथ एक अंत जुड़ा हुआ है। यही अंत जीवन को संतुलन देता है। जो इसे स्वीकार कर लेता है, वो हर पल को पूरी तरह जी पाता है, क्योंकि उसे पता होता है कि अगला पल शायद आए ही नहीं। और जो इससे डरता है, वो जीते जी भी अधूरा रह जाता है, क्योंकि उसका मन हमेशा कल की तैयारी में लगा रहता है और आज को खो देता है।

 

एक छोटी सी कहानी याद आती है। एक बाग में एक फूल खिला। उसे पता चला कि कुछ ही दिनों में वो मुरझा जाएगा। वो डर गया। उसने अपनी पंखुड़ियाँ समेट लीं, किसी से खुलकर नहीं मिला, बस मृत्यु के बारे में सोचता रहा। जब वो मुरझाया, तब उसे एहसास भी नहीं हुआ कि उसने अपनी पूरी उम्र डर में गँवा दी। उसने कभी पूरी तरह खिलना ही नहीं सीखा। अगर वो अपनी छोटी सी उम्र को स्वीकार कर लेता, तो शायद पूरी तरह खिलता, रंग बिखेरता, अपनी खुशबू फैलाता, और फिर शांति से मुरझा जाता। उस मुरझाने में भी कोई दुख नहीं होता, सिर्फ एक स्वाभाविक प्रक्रिया होती। ठीक वैसे ही हम भी एक प्रक्रिया हैं, एक बहाव हैं। इस बहाव को रोकने की कोशिश मत कीजिए। बस इसके साथ बहिए।

 

जब हम पूरी तरह वर्तमान में उतरते हैं, तो इतिहास का बोझ खत्म होने लगता है:

 

हमारी सबसे बड़ी समस्या यही है कि हम जहाँ होते हैं, वहाँ पूरी तरह मौजूद नहीं होते। जब हम खाना खा रहे होते हैं, तब मन कहीं और भटक रहा होता है। जब हम किसी से बात कर रहे होते हैं, तब भीतर कल की चिंता चल रही होती है। यही बिखराव हमारी थकान का असली कारण है। एक ही समय में सौ जगह होना कोई शक्ति नहीं, बल्कि एक बीमारी है। इसलिए पहली सीख यही है कि जो भी कर रहे हैं, उसे पूरे मन से करें। अगर चाय बना रहे हैं, तो सिर्फ चाय बनाइए। उसकी सुगंध को महसूस कीजिए, पानी के उबलने की आवाज सुनिए, उठती हुई भाप को देखिए। ये छोटी छोटी बातें ही हमें वर्तमान की जमीन पर वापस लाती हैं।

 

और जब हम वर्तमान में टिक जाते हैं, तब पुराने दुखों का वजन हल्का पड़ने लगता है। भविष्य की चिंताओं का असर कम हो जाता है। सब कुछ बस घट रहा होता है, और हम उस घटने के साथ होते हैं। इस अवस्था में हम न अतीत के कैदी रहते हैं, न भविष्य के भिखारी। हम सिर्फ एक साक्षी बन जाते हैं। जैसे कोई पहाड़ की चोटी पर खड़ा होकर नीचे की सारी हलचल को देख रहा हो। वो हलचल उसे छूती नहीं, फिर भी वो उससे अलग नहीं है। यही वो जगह है जहाँ करुणा अपने आप जन्म लेती है। क्योंकि जब हम ऊपर से सब कुछ देखते हैं, तब हर उलझे हुए इंसान के लिए भीतर एक कोमलता पैदा होती है।

 

फिर हमें किसी को बदलने की जल्दी नहीं रहती। हम उपदेश देने नहीं भागते। हम बस उपस्थित रहते हैं। और हमारी वही उपस्थिति धीरे धीरे एक नदी की तरह दूसरों की प्यास बुझाने लगती है। यही सबसे बड़ी सेवा है। इससे बड़ा कोई धर्म नहीं। इसलिए आज, इसी पल, बिना किसी बहाने के, अपने भीतर उस साक्षी को महसूस कीजिए। वो हमेशा से वहीं है, शांत बैठा हुआ, हमारे जागने का इंतज़ार करता हुआ।

 

(यह लेख “सत्यदर्शी जी” की आत्मज्ञान विषयक पुस्तक से प्रेरित है।