जो खुद को अज्ञानी नहीं मानता, वही सबसे बड़ा अज्ञानी है:

जो खुद को अज्ञानी नहीं मानता, वही सबसे बड़ा अज्ञानी है:

हमने हमेशा सुना है कि साधना करो, ध्यान करो, योग करो, तप करो। और फिर हम करने भी लगते हैं। सुबह उठकर एक घंटा बैठते हैं, मंत्र दोहराते हैं, साँस पर ध्यान लगाते हैं। कुछ दिनों बाद भीतर एक हल्का सा गर्व उठने लगता है कि अब हम कुछ खास हो गए हैं। अहंकार नए कपड़े पहन लेता है। अब हम दूसरों को देखकर सोचने लगते हैं, “ये अभी अंधेरे में हैं, और हम रोशनी में पहुँच गए हैं।” यही सबसे बड़ी चाल है। असल में जिसे हम साधना समझ रहे होते हैं, वो साधना नहीं होती, बल्कि अहंकार का एक नया रूप होता है। अहंकार मरना नहीं चाहता, इसलिए वो आध्यात्मिकता का वस्त्र पहन लेता है। अब वो कहता है, “मैं ध्यानी हूँ, मैं संत हूँ, मैं ज्ञानी हूँ।” देखिए, ‘मैं’ फिर लौट आया। केवल नाम बदल गया, बीमारी वही रही।

 

कोई भी प्रयास, चाहे वो कितना भी पवित्र क्यों न दिखाई दे, अगर उसकी जड़ में ‘मैं’ बैठा है, तो वो बंधन ही पैदा करेगा। “मैं ध्यान कर रहा हूँ” का अर्थ है कि एक कर्ता मौजूद है और एक कर्म। जब तक कर्ता है, तब तक मन है। और मन कभी सच में शांत नहीं होता। उसे जितना शांत करने की कोशिश करेंगे, वो उतना ही उछलेगा। जैसे कोई पानी को हाथ से समतल करने लगे, तो पानी और हिलने लगेगा। असली शांति तब आती है जब पानी को अकेला छोड़ दिया जाता है। ठीक वैसे ही मन को भी छोड़ देना पड़ता है। न कोई दमन, न कोई नियंत्रण, न कोई जबरदस्ती। बस देखना होता है कि मन अपने आप कैसे शांत होने लगता है, जब हम उसकी हर चाल में हस्तक्षेप करना बंद कर देते हैं।

 

जो खुद को अज्ञानी नहीं मानता, वही सबसे बड़ा अज्ञानी है:

 

एक बहुत गहरा रोग है, “मैं जानता हूँ” का रोग। हम किताबें पढ़ लेते हैं, सत्संग सुन लेते हैं, ज्ञानी लोगों से मिल लेते हैं। धीरे धीरे शब्दों का एक बड़ा ढेर जमा हो जाता है। फिर हम ‘ब्रह्म’, ‘आत्मा’, ‘माया’, ‘मोक्ष’ जैसे शब्द बड़ी सहजता से बोलने लगते हैं। और भीतर एक भावना उठती है कि अब हम जान गए। पर ये ‘जानना’ और असली जानना, दोनों में जमीन आसमान का अंतर है। जो सच में जानता है, वो कभी ये दावा नहीं करता कि “मैं जानता हूँ।” क्योंकि जहाँ वास्तविक जानना होता है, वहाँ ‘मैं’ बचता ही नहीं। फिर कौन कहेगा कि “मैं जानता हूँ”? जो ये कह रहा है, वो अभी भी उसी पुराने अहंकार में जी रहा है, बस उसने अपनी पुरानी दुनिया की जगह आध्यात्मिक शब्दों की दुनिया बना ली है।

 

इसलिए पहली सीख यही है कि हम कुछ नहीं जानते। और इसमें कोई शर्म नहीं है। बल्कि यही स्वीकार सबसे बड़ा ज्ञान है। जब हम ईमानदारी से कहते हैं, “हम नहीं जानते,” तभी भीतर एक खुलापन पैदा होता है। तब हम बच्चे की तरह निर्मल हो जाते हैं। तब सीखना शुरू होता है, पर बिना किसी पूर्वाग्रह के। जो पहले से मान बैठा है कि वो जानता है, उसके पास सीखने की कोई जगह नहीं बचती। वो केवल अपनी पुरानी जानकारी दोहराता रहता है। इसलिए संतों ने कहा कि अज्ञान सबसे सुंदर शुरुआत है। अज्ञानी होने का मतलब मूर्ख होना नहीं है। इसका मतलब है कि हमने अपने पुराने कबाड़ को थोड़ी देर के लिए अलग रख दिया है और अब चीजों को नए सिरे से देखने को तैयार हैं। और यही वो दरवाजा है जहाँ से पहली बार सत्य भीतर प्रवेश करता है।

 

हर साधना एक जाल बन सकती है, क्योंकि जाल बुनने वाला खुद उसी में फँस जाता है:

 

बहुत लोग पूछते हैं, “फिर करें क्या?” और जब जवाब मिलता है, “कुछ मत करो,” तो वे और परेशान हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि बिना किए कुछ कैसे होगा? क्योंकि उनकी पूरी आदत ‘कुछ करने’ की बनी हुई है। यही ‘करने’ की आदत सबसे बड़ा बोझ है। करने से हम कभी ‘होने’ की अवस्था तक नहीं पहुँचते। ‘होने’ के लिए भीतर की भागदौड़ रुकनी पड़ती है। जैसे नींद अपने आप आती है। उसके लिए हम कुछ नहीं करते, बस ढीले पड़ जाते हैं। वैसे ही अपने सच्चे स्वरूप को जानने के लिए भी कोई विशेष क्रिया जरूरी नहीं है। लेकिन मन को ये बात आलस्य जैसी लगती है। वो सोचता है, “इतना आसान कैसे हो सकता है?” जबकि सच तो ये है कि यही सबसे कठिन बात है, क्योंकि हमारा पूरा जीवन करने में बीता है। हमारी पूरी पहचान इसी पर बनी है कि हम क्या करते हैं। अगर ये करना रुक जाए, तो फिर हम कौन रह जाएँगे? यही असली डर है।

 

इसी डर के कारण हम ‘करना’ छोड़ नहीं पाते। एक साधना छोड़ते हैं, तो दूसरी पकड़ लेते हैं। मंदिर जाना छोड़ते हैं, तो योग करने लगते हैं। योग छोड़ते हैं, तो सेवा में लग जाते हैं। कुछ न कुछ चलता ही रहना चाहिए। लेकिन ये सारी क्रियाएँ हमें उसी पुराने चक्र में घुमाती रहती हैं। क्योंकि हर क्रिया एक फल पैदा करती है, और फल की इच्छा एक नया बंधन बन जाती है। एकमात्र ऐसी क्रिया जो बंधन नहीं बनाती, वो वही है जिसमें कर्ता नहीं बचता। और ऐसा तब होता है जब भीतर ये स्पष्ट हो जाता है कि “हम कुछ नहीं कर रहे, सब अपने आप घट रहा है।” हाथ उठता है, पैर चलते हैं, शब्द निकलते हैं, पर “मैं कर रहा हूँ” यही भ्रम है। जैसे ही ये भ्रम टूटता है, फिर करना और न करना दोनों बराबर हो जाते हैं। तब एक अजीब सी सहजता आती है। शरीर काम करता रहता है, पर भीतर गहरी शांति बनी रहती है। इसे ही जाग्रत आलस्य कहा जा सकता है।

 

जब कोई लक्ष्य नहीं बचता, तभी पहली बार हम अपने हो पाते हैं:

 

हम हर पल किसी न किसी लक्ष्य की तरफ भाग रहे हैं। छोटे लक्ष्य, बड़े लक्ष्य, सांसारिक लक्ष्य, आध्यात्मिक लक्ष्य। लेकिन क्या हमने कभी सोचा कि लक्ष्य के बिना जीवन कैसा होगा? ये सोचते ही डर पैदा होता है, क्योंकि हमें बचपन से सिखाया गया है कि लक्ष्यहीन जीवन व्यर्थ है। पर शायद सच्चाई उलटी है। लक्ष्य ही हमें वर्तमान से दूर ले जाते हैं। वे हमें हमेशा भविष्य में धकेलते रहते हैं, जबकि जीवन केवल इसी क्षण में है। न कल में, न आने वाले समय में। इसलिए जो सोचता है कि “जब वो मिल जाएगा तब मैं सुखी हो जाऊँगा,” वो कभी सुखी नहीं हो पाता। क्योंकि एक लक्ष्य पूरा होता है और उसके पीछे दस नए लक्ष्य खड़े हो जाते हैं। ये दौड़ कभी खत्म नहीं होती।

 

इस दौड़ से बाहर आने का एक ही रास्ता है, ये देख लेना कि लक्ष्य खुद एक भ्रम है। हम पहले से ही पूरे हैं। हमें कुछ पाना नहीं है, क्योंकि जिसे पाने के लिए हम भाग रहे हैं, वो पहले से हमारे भीतर मौजूद है। ये सुनने में बहुत सरल लगता है, लेकिन इसे जीना कठिन है। क्योंकि हमने अपने आप को टूटा हुआ मान लिया है। हमें लगता है कि हमारे भीतर कोई कमी है, इसलिए हम लगातार कुछ खोज रहे हैं। लेकिन वो कमी असली नहीं है। वो केवल एक धारणा है। जैसे कोई स्वस्थ व्यक्ति मान ले कि वो बीमार है, तो वो डॉक्टर ढूँढेगा, दवाइयाँ ढूँढेगा, इलाज करवाएगा। लेकिन आराम नहीं मिलेगा, क्योंकि बीमारी असल में है ही नहीं। जैसे ही उसे दिख जाता है कि वो पहले से स्वस्थ है, सारी भागदौड़ खत्म हो जाती है।

 

ठीक यही हमारे साथ है। हम पहले से पूरे हैं, शांत हैं, शुद्ध चैतन्य हैं। बस इसे देख लेना है। और ये देखना कोई क्रिया नहीं है। ये अपने आप घटित होता है, जब हम सारी क्रियाओं की व्यर्थता को पूरी तरह समझ लेते हैं। तब अचानक पता चलता है कि हम हमेशा से वहीं थे जहाँ पहुँचने के लिए भटक रहे थे। कोई कमी नहीं थी, कोई अधूरापन नहीं था। बस एक अनंत शांति थी, जो हमेशा से भीतर मौजूद थी। उसी का नाम आत्मा है। और वही हमारा वास्तविक स्वरूप है।

 

(यह लेख “सत्यदर्शी जी” की आत्मज्ञान विषयक पुस्तक से प्रेरित है। )