हमारा चाहना और प्रकृति का चाहना

 

व्यक्ति का चाहना उसकी अभिलाषा का अंग होता है और व्यक्ति के लिए प्रकृति का चाहना उसके कर्मों का फल होता हैl

दो प्रतिशत लोग ऐसे भाग्यशाली होते हैं जो जैसा चाहते हैं वैसा प्राप्त कर लेते हैं l अधिकांश लोग दिशा प्राप्ति के लिए प्रयास मात्र कर पाते हैंl फल विपरीत मिलता है l

कुछ लोगों को माता पिता संरक्षक से जीवन की दिशा निर्धारित मिलती है l ऐसे लोग भाग्यशाली होते हैं l ऐसे लोग दश प्रतिशत में आते हैं l कुछ लोग ऐसे होते हैं जो जीवन दिशा के बारे में सोचते ही नहीं l ये लोग जिधर रास्ता मिलता है उधर निकल लेते हैं l ये ज्यादातर सुखी और संघर्षशील होते हैं l कुछ लोग ऐसे होते हैं जो इस जीवन को उद्देश्य हीन बिना किसी उपलब्धि के काट देते हैं l

ज्योतिष शास्त्र में पंचम भाव, दशम भाव, एकादश भाव और द्वितीय भाव उस स्थूल दिशाको बतलाते हैं जिससे विद्या, स्थिर जीविका, नित्य आय और समग्र जीवन में मिलने वाला स्थिर धन ज्ञात होता है lभाग्य भाव से अदृश्य भाग्य का संकेत मिलता है जो जन्मान्तर का प्रतिफलन होता है l

हम सभी एक निश्चित फल भोग और कार्य करने की अनिश्चित क्षमता लेकर आते हैं l जैसे वेग से निकला पर्वतीय जल प्रवाह अपनी दिशा ढलान के अनुसार तय करता है वैसे ही हम सभी अपने अपने अज्ञात प्रवाह से जीवन की दिशा तय करते हैं l जो लोग प्रवाह को अपनी इच्छा के अनुसार मोड़ कर अनुकूल दिशा स्थिति प्राप्त करना चाहते हैं वे या तो विनष्ट हो जाते हैं या आंशिक सफलता को प्राप्त कर संतुष्ट हो जाते हैं l

हमारा पूर्व का अफलित संकल्प वर्तमान जीवन को सर्वाधिक प्रभावित करता है l ऐसे में यदि वर्तमान जीवन संकल्प पूर्व के संकल्प से भिन्न होता है तो बहुत विसंगति, विफलता और हताशा मिलती है l

जीवन की इस जटिल समस्या का समाधान गीता में मिलता हैl

मनुष्य के पास चेतना और बुद्धि का ऐसा संगम है जो उसे जीवन के लक्ष्य को निर्धारित करने में सहयोग देता है l सत्य और श्रम को दीर्घ काल तक जारी रखने वाला व्यक्ति अदृश्य काल के कपाल पर अपने हस्ताक्षर को करता है l

आप के कार्य में यदि अदृश्य बाधा डालता हो तो आप वह कीजिए जो अदृश्य चाहता हो l जो व्यक्ति एक दिशा में दीर्घ काल तक कार्य करके विफल हो चुका होता है उसका वह कार्य संचित हो जाता है l

यदि हमारा चाहना सत्संकल्प से पूर्ण है तो प्रकृति भी उसे पूरा करती है l वह जानती है कि किससे क्या काम लेना है और कब तक लेना है l सत्संकल्प से प्रकृति का शुभ उदय होता है l प्रत्येक सूर्योदय से मनुष्य के जीवन का एक दिन तय होता है l

 

*तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु*

अर्थात् मेरा मन शुभ संकल्पों वाला / मंगलमय संकल्पों से युक्त हो।