पृथ्वी लोक की अनन्त समस्यायें

 

( भाग – 01 )

 

यह पृथ्वी भी अद्भुत और अपूर्व हैl यहाँ गर्भ में आते ही समस्यायें आरम्भ हो जाती हैं l जन्म लेने से पूर्व से लेकर मृत्यु तक समस्यायें ही समस्यायें हैं इस धरती पर l मनुष्य या जीव भी इन समस्याओं से लड़ता रहता है l या तो विजय प्राप्त करता है या समस्याओं से पराजित होता है l

*समस्याओं का निराकरण तीन स्तर पर होता है-*

देव द्वारा , राजा द्वारा या स्वयं के पुरुषार्थ द्वारा l देव द्वारा प्राप्त सहयोग दुर्लभ होता है l सभी पात्र नहीं होते कि उन्हें दैवीय सहायता मिल सके l राजा द्वारा या राज्यांग द्वारा सहायता तभी मिलती है जब देव अनुकूल हो l प्रायः विपत्ति काल में दी जाने वाली सहायता को राजा के चक्र ( प्रशासनिक जन ) खा जाते हैं l स्वयं का पुरुषार्थ ही एक ऐसा माध्यम होता है जो समस्याओं से व्यक्ति का उद्धार करता है l यह अलग बात है कि हर पुरुषार्थ के पीछे सफलता खड़ी नहीं मिलती है l

समस्याओं से भयभीत हो कर आत्महत्या करना या पलायन करना इस बात को सूचित करता है कि व्यक्ति की जीवंतता कितनी स्वल्प है l

*समस्याओं के पीछे के कारण —*

हमारे पूर्व के कर्म ही हमारी समस्याओं के जनक होते हैं l इन्हें विंशोतरी महादशा और अंतर दशा द्वारा जाना जाता है l साथ ही समुद्र में फंसे व्यक्ति की तरह

प्रार्थना और पुरुषार्थ दोनों का सहयोग लेना पड़ता है l

 

भूमि पर जन्म तभी होता है जब आपको पुराना भोग भोगना हो और नया कर्म करके नयी समस्याओं को अगले जीवन के लिए तैयार करना हो l यदि मोक्ष हो जाए तो कभी समस्याएं उत्पन्न ही न हों पर जन्म लेने का अर्थ ही है समस्याओं

को साथ ले कर धरती पर आना l

जीवन समुद्र में उठने वाली अनन्त लहरें समस्याएं ही तो हैंl

इन समस्याओं को या तो तैरना होता है या लहरें लील लेती हैं l

क्रमशः …..