Geeta

अभिमन्यु:- चक्रव्यूह की mystical यात्रा और अपूर्णता की पूर्णता ( भाग – 02)

 

 

प्रत्येक मनुष्य इस संसार में एक चक्रव्यूह में प्रवेश करता है जिसका नाम है — जीवन। उसे प्रवेश की विधि पता होती है — जन्म। किन्तु निकास का ज्ञान अधूरा होता है। मृत्यु कब, कैसे, किस रूप में आएगी — यह किसी को नहीं पता। और इसी अज्ञान के भीतर, यही अपूर्णता लेकर, हम सब जीते और लड़ते हैं।

 

“We shall not cease from exploration, and the end of all our exploring will be to arrive where we started and know the place for the first time.” — T.S. Eliot, Little Gidding

 

(५)

 

13वें दिन के युद्ध में जो घटित हुआ वह केवल एक बालक की वीरता की गाथा नहीं थी — यह चेतना के क्रमिक निर्वस्त्रीकरण (Stripping of the Self) की mystical प्रक्रिया थी। प्रत्येक अस्त्र का टूटना, प्रत्येक आधार का छिनना — यह आत्मा की उस परम अवस्था की ओर यात्रा थी जहाँ केवल शुद्ध चेतना शेष रहती है।

 

Via Negativa का एक सिद्धान्त है। नेति नेति की एक प्रक्रिया है। ईसाई रहस्यवाद की परम्परा में ‘Via Negativa’ या ‘Apophatic Theology’ का सिद्धान्त है — ईश्वर को उसके न होने के माध्यम से परिभाषित करना। Meister Eckhart ने लिखा है :

 

“To be empty of all created things is to be full of God.” — Meister Eckhart, German Sermons

 

अभिमन्यु का युद्ध इसी Via Negativa का जीवन्त रूपान्तरण था। उपनिषद् की ‘नेति नेति’ (न यह, न यह) की प्रक्रिया — जहाँ सत्य को जोड़ने से नहीं, बल्कि असत्य को हटाते-हटाते प्राप्त किया जाता है — अभिमन्यु के युद्ध में साकार हुई।

 

धनुष टूटा — ‘नेति’ (मैं अस्त्र-धारी नहीं हूँ)।

 

रथ नष्ट हुआ — ‘नेति’ (मैं रथी नहीं हूँ)।

 

तलवार टूटी — ‘नेति’ (मैं तलवारबाज़ नहीं हूँ)।

 

कवच उतरा — ‘नेति’ (मैं शरीर नहीं हूँ)।

 

अन्त में रथ का पहिया हाथ में लेकर खड़े अभिमन्यु — यही वह आत्मा है जो सब कुछ छूट जाने के बाद भी ‘है’। यही ब्रह्म है। यही ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ का अनुभव है।

 

अभिमन्यु को घेरने वाले सात महारथी यदि सात आन्तरिक शत्रु हैं, तो उनसे एकाकी लड़ना क्या है? यह वह साधना है जो प्रत्येक मनुष्य को अकेले करनी होती है।

 

कोई गुरु नहीं बचा सकता। कोई मित्र नहीं लड़ सकता। अर्जुन, भीम, कृष्ण — द्रोण ने सबको रोक लिया। जीवन का मूल सत्य यही है कि आत्मा की अन्तिम यात्रा एकाकी होती है। Dark Night of the Soul — जैसा St. John of the Cross ने वर्णित किया है — वह अकेलापन जिसमें साधक को लगता है कि ईश्वर भी नहीं है, मार्गदर्शक भी नहीं है, फिर भी चलते रहना है।

 

“In this dark night of contemplation, the soul comes to understand, at least obscurely, that it has utterly failed and that all things have failed it.” — St. John of the Cross, Dark Night of the Soul

 

अभिमन्यु का वह क्षण जब वे रथ के टूटे पहिये को हाथ में लेकर खड़े थे — घायल, अकेले, घिरे हुए — यही Dark Night of the Soul था। और फिर भी वे लड़े। यह सिर्फ वीरता नहीं, यह उनका योग है।

 

(६)

 

अभिमन्यु की आयु सोलह वर्ष थी। यह संयोग नहीं था। महाभारत में जिस तरह की ग्रंथियां वेदव्यास जी ने बाँधी हैं उनमें संख्याओं का विशेष महत्त्व है — न्यूमरालॉजी या संख्या-विद्या का विनियोग भी इसमें मिलेगा।

 

भारतीय परम्परा में ‘षोडश कला’ — सोलह कलाएँ — चन्द्रमा की पूर्णता का प्रतीक हैं। पूर्णिमा का चन्द्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है। अभिमन्यु चन्द्र-वंशी थे, और यह भी कहा जाता है कि वे वर्चस् — चन्द्रमा के पुत्र — के अवतार थे। सोलह वर्ष में उनका जाना इसी चांद्र-पूर्णता का प्रतीक है।

 

इसके अतिरिक्त, वेदान्त में षोडश कलाएँ पुरुष (आत्मा) की सम्पूर्णता का प्रतीक भी हैं। छान्दोग्य उपनिषद् में ‘षोडशकल पुरुष’ की चर्चा है जो अपनी सभी कलाओं में परिपूर्ण है। अभिमन्यु ने सोलह वर्ष में वह जी लिया जो साधारण मनुष्य सौ वर्षों में भी नहीं जी पाता l

 

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।

( भगवद्गीता 4.38 )

 

Henri Bergson ने अपनी कृति ‘Time and Free Will’ में ‘durée’ — अर्थात् अनुभव-समय और घड़ी-समय के बीच भेद — की अवधारणा प्रस्तुत की। रहस्यवादी साधक के अनुभव में समय रैखिक नहीं होता। एक क्षण में सम्पूर्ण जीवन जिया जा सकता है।

 

“Time is not a line but a network of intentionalities.” — Maurice Merleau-Ponty, Phenomenology of Perception

 

अभिमन्यु का जीवन इसी non-linear समय का उदाहरण है। उन्होंने सोलह वर्षों में जो अनुभव किया, जो प्रेम किया (उत्तरा से विवाह), जो युद्ध किया, जो त्याग किया — वह एक पूर्ण आत्मा की पूर्ण यात्रा थी। आयु की माप वर्षों में नहीं, चेतना की गहराई में होती है।

 

(७)

 

पश्चिमी तर्क-बुद्धि अभिमन्यु की मृत्यु को त्रासदी कह सकती है। भारतीय अध्यात्म उसे transcendence — उत्तरण — कहता है। इन दोनों में मूलभूत अन्तर है।

 

सभी साधना परम्पराओं में मृत्यु को एक द्वार माना गया है, अन्त नहीं। तिब्बती बौद्ध धर्म में ‘Bardo Thodol’ (Book of the Dead) में मृत्यु को एक महान् अवसर के रूप में प्रस्तुत किया गया है — वह क्षण जब आत्मा अपनी वास्तविक प्रकृति को पहचान सकती है।

 

“O nobly born, now the clear light of Reality itself dawns upon you. Recognize it. Your awareness, empty, naked, and void, is itself the very Reality, the All-Good.” — Bardo Thodol (Tibetan Book of the Dead)

 

हिन्दू परम्परा में ‘वीरगति’ एक विशेष अवस्था है। युद्धभूमि में, धर्म के लिए, वीरतापूर्वक मरने वाले को सीधे स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है — यह मान्यता केवल पुरस्कार की नहीं, बल्कि चेतना की उस अवस्था की है जिसमें योद्धा मृत्यु के क्षण में होता है।

 

यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्। सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्।।

( भगवद्गीता 2.32 )

 

यह हमारे जीवन का भी सबसे विरोधाभासी किन्तु सच्चा सिद्धान्त है : अभिमन्यु को चक्रव्यूह से निकास नहीं पता था — और यही उनकी मुक्ति का कारण बना।

 

यदि उन्हें निकास पता होता, तो वे निकल जाते। और यह महान् बलिदान नहीं होता। यह कर्म-ऋण नहीं चुकता। यह आत्मा की उस गहराई तक पहुँचने का अवसर नहीं मिलता जहाँ सब कुछ छूट जाने के बाद भी चेतना जीवित रहती है।

 

यह Paradox of Completion है कि अपूर्णता ही पूर्णता है। यही Zen Buddhism का ‘Koan’ है, यही Taoism का ‘Wu Wei’ है, यही वेदान्त का ‘नेति नेति’ है।

 

“The Tao that can be named is not the eternal Tao. The name that can be named is not the eternal name.” — Laozi, Tao Te Ching 1

 

अभिमन्यु का जीवन इसी अनिर्वचनीय सत्य का आख्यान है। उनकी कथा हमें बताती है कि जो आत्मा बिना निकास जाने भी, बिना परिणाम की चिन्ता किए भी, पूरी शक्ति से अपना धर्म निभाती है — वही मुक्त होती है।

 

यदि अभिमन्यु की कथा का सार एक वाक्य में कहना हो, तो वह यह है : हम सब अभिमन्यु हैं।

 

हम सब एक ऐसे संसार में आए हैं जिसमें प्रवेश करना जानते हैं — जन्म। इस संसार में लड़ना जानते हैं — जीवन। किन्तु निकास का ज्ञान अधूरा है — मृत्यु का रहस्य अज्ञात है। और इसी अज्ञान के भीतर, इस अपूर्णता को लेकर, हम सब अपने-अपने चक्रव्यूह में घिरे हुए हैं।

 

हमारे चक्रव्यूह के महारथी कोई राजा नहीं हैं — वे हमारे भय हैं, हमारी असुरक्षाएँ हैं, हमारे अहंकार हैं, हमारी विफलताएँ हैं। और हम भी अकेले ही उनसे लड़ते हैं।

 

“The cave you fear to enter holds the treasure that you seek.” — Joseph Campbell, The Hero with a Thousand Faces

 

अभिमन्यु का संदेश यह नहीं है कि ‘जीतो’। उनका संदेश यह है कि ‘लड़ो — पूरी तरह, पूरी आत्मा से, बिना परिणाम की चिन्ता किए। और यह जानते हुए कि तुम्हारा रथ टूटेगा, तुम्हारा धनुष टूटेगा, तुम्हारे साथी नहीं आएँगे — फिर भी लड़ो। क्योंकि यही धर्म है, यही योग है, यही मुक्ति है।’

 

अभिमन्यु की जीवनी हमें यह सिखाती है कि आध्यात्मिक पूर्णता का अर्थ सब कुछ जानना नहीं है — बल्कि जो जानते हैं उसे पूरी शक्ति और पूरी निष्ठा से जीना है। उनका गर्भ में अधूरा ज्ञान ब्रह्माण्डीय नियोजन था, उनका चक्रव्यूह संसार का प्रतीक था, उनका एकाकी युद्ध आत्मा की वह साधना थी जो अन्ततः मोक्ष की ओर ले जाती है।

 

उनकी मृत्यु — सोलह वर्ष की आयु में — कोई अन्याय नहीं थी। वह एक दीपक का वह क्षण था जब उसने अपनी सारी ऊर्जा एक ही बार में उंडेल दी और जगत् को प्रकाश दिया। यह षोडश-कला की पूर्णता थी।

 

अन्ततः, Meister Eckhart के शब्दों में जो सबसे गहरा सत्य अभिमन्यु की कथा में प्रकट होता है वह यह है :

 

“The most powerful prayer, one well-nigh omnipotent to gain all things, and the noblest work of all is the outcome of a quiet mind.” — Meister Eckhart

 

अभिमन्यु का वह अन्तिम क्षण — जब टूटे पहिये को हाथ में लिए वे खड़े थे, न रथ था, न अस्त्र था, न सहायक था — वह ‘quiet mind’ का वह परम क्षण था। उस क्षण में वे केवल एक योद्धा नहीं थे — वे एक मुक्त आत्मा थे।

 

काश हम सब भी हों।