अक्षय तृतीया: बाजार की चमक-दमक के बीच कहीं खो न जाए वास्तविक अर्थ

अक्षय तृतीया: बाजार की चमक-दमक के बीच कहीं खो न जाए वास्तविक अर्थ

-#मनोज_जोशी

 

आज जब हम अक्षय तृतीया की बात करते हैं, तो अक्सर चर्चा सोना खरीदने और बाजार की चमक-दमक तक सीमित रह जाती है। लेकिन इस दिन का वास्तविक अर्थ इससे कहीं गहरा, कहीं अधिक आध्यात्मिक और कहीं अधिक स्थायी है। “अक्षय”, यानी जो कभी समाप्त न हो। यह केवल धन का नहीं, बल्कि पुण्य, आस्था और कर्म के उस चक्र का प्रतीक है, जो समय के साथ घटता नहीं, बल्कि बढ़ता ही जाता है।

हिंदु परंपरा में अक्षय तृतीया को वह दुर्लभ क्षण माना गया है, जब ब्रह्मांडीय ऊर्जा अपने सबसे शुद्ध और संतुलित रूप में होती है। मान्यता है कि इसी दिन सतयुग और त्रेतायुग का आरंभ हुआ था यानी सृष्टि के उस स्वर्णिम काल का संकेत, जब धर्म अपने चरम पर था। और धर्म यानी कर्मकांड या पूजा पद्धति नहीं।

महाभारत के शांति पर्व में धर्म की व्याख्या करते हुए लिखा गया है,

“धारणाद् धर्म इत्याहुः धर्मो धारयते प्रजाः।

यः स्यात् धार्यते लोकं स धर्म इति निश्चयः॥”

धर्म वही है जो प्रजा को संभालकर रखे।

और जो पूरे लोक जिसमें समाज और सृष्टि सब शामिल हैं उसको संतुलित और सुरक्षित बनाए रखे, वही निश्चय ही धर्म है।”

तो ऐसे समय में जब धर्म 100% अपने वास्तविक रूप में विद्यमान था, उसी समय से अक्षय तृतीया पर्व मनाया जा रहा है।

भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा इस दिन इसलिए की जाती है, क्योंकि वे केवल धन नहीं, बल्कि धर्म, संतुलन और संरक्षण के प्रतीक हैं।

यही वह दिन है जब भगवान परशुराम का अवतार हुआ एक ऐसा अवतार, जिसने अधर्म के विरुद्ध संघर्ष का संदेश दिया। महाभारत की रचना का प्रारंभ भी इसी तिथि से जुड़ा माना जाता है, जब वेदव्यास ने गणेश जी को लिखने के लिए आमंत्रित किया। यह केवल एक कथा नहीं, बल्कि यह संकेत है कि ज्ञान, लेखन और सृजन की शुरुआत भी जब इस दिन होती है, तो वह “अक्षय” बन जाती है।

प्राचीन ग्रंथों में भी इस तिथि की महिमा स्पष्ट रूप से वर्णित मिलती है। स्कंद पुराण में कहा गया है,

“वैशाखस्य शुक्लपक्षे तृतीया या भवेत् शुभा।

तस्यां कृतं यत् पुण्यं स्यात् अक्षयं भवति ध्रुवम्॥”

अर्थात, वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पर किया गया स्नान, दान, जप और कोई भी शुभ कर्म अक्षय फल देने वाला होता है,उसका पुण्य कभी नष्ट नहीं होता।

इसी भाव को भविष्य पुराण में भी स्पष्ट रूप से कहा गया है—

“अक्षयां तृतीयां पुण्यां सर्वपापप्रणाशिनीम्।

यत् कृतं तत्र दानं च सर्वं भवति अक्षयम्॥”

अर्थात, यह अक्षय तृतीया पुण्यदायी और पापों का नाश करने वाली है, और इस दिन किया गया दान तथा शुभ कर्म अक्षय (कभी नष्ट न होने वाला) हो जाता है।

आदि शंकराचार्य द्वारा रचित कनकधारा स्तोत्र भी अक्षय तृतीया से जुड़ा हुआ है।यह केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि माता लक्ष्मी की कृपा को आमंत्रित करने वाला एक अत्यंत प्रभावशाली वैदिक-भाव वाला स्तोत्र माना जाता है। इसमें कुल 21 श्लोक हैं, जिनमें देवी लक्ष्मी की करुणा, समृद्धि और अनुग्रह का अत्यंत सुंदर काव्यात्मक वर्णन किया गया है।

कथा के अनुसार, जब शंकराचार्य भिक्षा के लिए एक निर्धन ब्राह्मण स्त्री के घर पहुंचे, तो उसके पास देने के लिए कुछ भी नहीं था,फिर भी उसने श्रद्धा से एक आंवला अर्पित किया। उस निःस्वार्थ भाव से प्रभावित होकर शंकराचार्य ने “कनकधारा स्तोत्र” की रचना की। उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर माता लक्ष्मी ने उस घर में स्वर्ण (कनक) की वर्षा कर दी, जिसे “कनकधारा” कहा गया।

इस स्तोत्र का आध्यात्मिक अर्थ यह है कि सच्ची श्रद्धा और निष्काम दान से ही समृद्धि का द्वार खुलता है, और यही अक्षय तृतीया का मूल संदेश भी है,जहां भाव प्रमुख है, वहां फल स्वतः अक्षय हो जाता है।

लेकिन इस पर्व की सबसे गहरी परत “दान” में छिपी है। भारतीय परंपरा में अक्षय तृतीया का सबसे बड़ा संदेश है संग्रह नहीं, वितरण। जब भीषण गर्मी में कोई व्यक्ति जल से भरा घड़ा दान करता है, किसी जरूरतमंद को अन्न देता है, या छाया और राहत का साधन उपलब्ध कराता है ,तब वह केवल एक सामाजिक कार्य नहीं करता, बल्कि अपने कर्म को अक्षय बना देता है।

इस विचार को भगवद्गीता में भी स्पष्ट रूप से समझाया गया है,

“दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।

देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥” (अध्याय 17, श्लोक 20)

अर्थात, जो दान बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के, उचित समय, स्थान और पात्र को दिया जाए, वही सात्त्विक दान है।

विशेष रूप से अक्षय तृतीया के संदर्भ में दान का उल्लेख पुराणों में भी मिलता है। मत्स्य पुराण में कहा गया है,

“वैशाखे मासि तृतीयायां दानं जलधनादिकम्।

अक्षयं फलमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा॥”

अर्थात, वैशाख मास की तृतीया को जल, धन आदि का दान करने से अक्षय फल प्राप्त होता है,इसमें कोई संदेह नहीं।

इसी प्रकार पद्म पुराण में उल्लेख मिलता है

“तृतीयायां तु वैशाखे दानं पुण्यप्रदं स्मृतम्।

विशेषतः जलदानं सर्वपापप्रणाशनम्॥”

अर्थात, वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन किया गया दान अत्यंत पुण्यदायी होता है, विशेषकर जलदान सभी पापों का नाश करने वाला माना गया है।

यानी, अक्षय तृतीया पर दान केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि शास्त्रों द्वारा स्थापित एक सिद्धांत है,जहां दान है, वहीं अक्षय फल है।

जैन परंपरा में भी यह दिन उतना ही पवित्र है। भगवान ऋषभदेव ने वर्षभर के तप के बाद इसी दिन पहला आहार ग्रहण किया था। यह घटना केवल उपवास तोड़ने की नहीं, बल्कि संयम, तपस्या और संतुलन की चरम अवस्था का प्रतीक है ,जहां भोग और त्याग के बीच सही संतुलन स्थापित होता है।

आज के समय में, जब हम अक्षय तृतीया को केवल निवेश और खरीदारी से जोड़ देते हैं, तब शायद हम उसके मूल संदेश से दूर हो जाते हैं। असली “अक्षय” वह सोना नहीं है जो तिजोरी में रखा है, बल्कि वह कर्म है जो समाज में रोशनी फैलाता है, वह दान है जो किसी की प्यास बुझाता है, और वह संकल्प है जो जीवन को अर्थ देता है।

इस अक्षय तृतीया पर यदि कुछ खरीदना ही है, तो केवल वस्तुएं नहीं बल्कि सद्भाव, सेवा और सच्चे कर्म खरीदिए। क्योंकि यही वह संपत्ति है, जो कभी समाप्त नहीं होती… यही है इस दिन का वास्तविक “अक्षय” अर्थ।

©️ लेखक – मनोज जोशी