:- जो मिलाता है उसे बाँटने वाला बता रहे हैं।*_
तमिलनाडु असेंबली में कल उदयनिधि स्टालिन ने कहा है कि “सनातन, जिसने लोगों को बाँटा, उसे मिटा देना चाहिये।
लोगों को तो आप स्वयं बांट रहे हैं और मिथ्यासिद्धांत गढ़ते जा रहे हैं कि सनातन ने लोगों को बांटा?
आज कौनसा राजनीतिक दल है जो लोगों को नहीं बांट रहा? लेकिन आपने उनमें से किसी का नाम नहीं लिया। चलो, अब आप यही बता दीजिए कि अब तक लोगों को मिलाने के लिए आपने क्या किया और समन्वय के लिए आपके पास आगे की क्या योजना है? उस पर आप कहां तक बढ़े हैं?
सनातन को मिटाने की बात तो आत्महत्या की बात है, द्वादशआलवार तथा तमिलवेद सनातन हैं। तमिल संस्कृति सनातन ही तो है। सुब्रमण्यम को मत भूलिए।
कैसा दिग्भ्रम है, कैसा स्मृतिभ्रंश है, *स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।* जिसने लोगों को मिलकर रहना सिखाया, उसे बांटने वाला बतला रहे हैं और जो लोगों को बांट रहे हैं, उनका नाम भी लेने की हिम्मत आप में नहीं है।
दक्षिण भारत के वसव का नाम सुना है? जिसने लिंगायत की प्रतिष्ठा की थी, वह सनातन ही तो है।
मिटाना ही है और मिटाने की शक्ति है, तो सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक, न्यायिक, शैक्षिक और राजनैतिक पाखंड को मिटाइए, विषमता को मिटाइए, अन्याय और अत्याचार को मिटा दीजिए।