( श्रावण मास के सोमवार को समर्पित )
भगवान श्री कृष्ण भगवद्गीता के विभूति योग में घोषणा करते हैं –
रुद्राणां शंकर: अस्मि
अर्थात् ग्यारह रुद्रों में मैं शंकर (शिव) हूं। यह उक्ति भगवान शिव एवं भगवान श्री कृष्ण की अभेदता का प्रमाण है। इसका अर्थ यह हुआ कि दोनों एक ही हैं।
ब्रह्मवैवर्त पुराण में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं –
*शिवेति शब्दमुच्चार्य प्राणांस्त्यजति यो नर:।*
*कोटिजन्मार्जितात् पापान्मुक्तो मुक्तिं प्रयाति स:।।*
अर्थात् जो मनुष्य “शिव” शब्द का उच्चारण कर शरीर छोड़ता है , वह करोड़ों जन्मों के संचित पापों से मुक्त होकर (छुटकारा पाकर) मुक्ति को प्राप्त हो जाता है।
हरिवंश पुराण में एकादश (ग्यारह) रुद्र कह गए हैं –
*हरश्च बहुरूपश्च त्र्यंबकश्चापराजित:।*
*वृषाकपिश्च शम्भुश्च कपर्दी रैवतस्तथा।।*
*मृगव्याधश्च शर्वश्च कपाली च विशांपते।*
*एकादशैते कथिता रुद्रास्त्रिभुवनेश्वरा:।।*
इन 11 रूद्रों में सर्वश्रेष्ठ शंकर जी (शिव जी) में भगवान का विशेष प्रकाश है। ग्यारह रुद्र शंकर के ही विभिन्न रूप हैं।
भक्त के सारे कष्टों का हरण कर उसकी कामनाएं सहज में पूरी कर देते हैं, इसलिए शंकर को “रूद्र” भी कहा जाता है –
*रुतम्-दु:खम् , द्रावयति – नाशयति इति रुद्र:*
अर्थात् भक्तों के दुःखों से द्रवित होकर ही भोलेनाथ सभी दुःखों को नष्ट कर देते हैं।
निरुक्तकार यास्क ने कहा है –
*शेते अनेन इति शिवम् कल्याणमित्यर्थ:*
अर्थात् सृष्टि में नित्य सुखमय आह्लाद व सहज विश्रांति के प्रदाता को शिव कहा गया है।
कल्याण-प्रदाता एवं कल्याणकारक होने के कारण शंकर को शिव कहा गया है –
*शिवं कल्याणं नित्यम्ऽस्येति शिव:।*
शिव तत्व की साकार मूर्ति को शंकर या हर जैसे अनेक संकटहर्ता नामों से संबोधित किया जाता है। ‘ शंकर ‘ शब्द की निरूक्ति – ” शं तनोतु इति शंकर: ” है। इसका अर्थ है संकटों का जो हरण करे , वह ” शंकर ” है।
संकटों का हरणकर्ता होने के कारण ही उन्हें ” हर – हर महादेव ” कहा जाता है।
रुद्रहृदयोपनिषद में शिव के बारे में कहा गया है –
सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा शिवत्मिका
अर्थात् सभी देवताओं की आत्मा में रुद्र उपस्थित हैं और सभी देवता रुद्र की आत्मा हैं, इसलिए शिवजी को महादेव कहा जाता है। भगवान शंकर को इसलिए भी महादेव कहा जाता है क्योंकि वे देव, दानव, यक्ष, किन्नर , नाग, मनुष्य सभी के द्वारा पूजे जाते हैं।
रुद्राभिषेक –
किसी विशेष मनोरथ की पूर्ति के लिए तद्नुसार पूजन सामग्री तथा विधि से रुद्राभिषेक किया जाता है।
जल से अभिषेक करने पर समय पर उत्तम वर्षा होती है तथा भक्त के रोग-शोक , दुःख – दारिद्र्य सभी नष्ट हो जाते हैं।
असाध्य रोगों को शांत करने के लिए कुशायुक्त जल से रुद्राभिषेक किया जाता है।।
भवन एवं वाहन प्राप्ति के लिए दही से रुद्राभिषेक होता है।
लक्ष्मी प्राप्ति के लिए गन्ने के रस से, धन वृद्धि के लिए एवं पारिवारिक समृद्धि के लिए शहद एवं घी से रुद्राभिषेक किया जाता है।
तीर्थ के जल से अभिषेक करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
इत्र मिले जल से अभिषेक करने से बीमारी नष्ट होती है और शरीर पुष्ट होता है।
पुत्र प्राप्ति के लिए गो-दुग्ध से रुद्राभिषेक करना चाहिए।
ज्वर की शांति हेतु शीतल गंगाजल से रुद्राभिषेक करें।
सहस्त्रनाम मंत्रों का उच्चारण करते हुई घृत की धारा से रुद्राभिषेक करने पर वंश का विस्तार होता है।
शक्कर मिले दूध से अभिषेक करने पर जड़ बुद्धिवाला (मूर्ख) भी विद्वान हो जाता है। सरसों के तेल से अभिषेक करने पर शत्रु पराजित होता है।
शिव पूजा में निषेध
भगवान शिव की पूजा में हल्दी नहीं चढ़ाई जाती।
शिव जी ने शंखचूड़ नामक असुर का वध किया था , इसलिए शंकर भगवान की पूजा में शंख वर्जित माना गया है।
नारियल पानी से कभी भगवान शिव का अभिषेक नहीं करना चाहिए क्योंकि नारियल लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है।
तुलसी भी भगवान शिव को नहीं चढ़ाने चाहिए।
रुद्र-अर्चना एवं रुद्राभिषेक से हमारे सभी कष्ट, दुःख एवं पाप निर्मूल होते हैं।