हम आखिर कैसा समाज बनाना चाहते हैं? ऐसा समाज, जो किसी मंत्री की अश्लील, अपमानजनक और अहंकारपूर्ण भाषा पर आक्रोश व्यक्त करे, लेकिन वही भाषा जब किसी आंदोलनकारी समूह या युवाओं की ओर से इस्तेमाल की जाए, तो उसे रचनात्मकता, राजनीतिक व्यंग्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम देकर स्वीकार कर ले?
एक मंत्री द्वारा पत्रकार के लिए अपमानजनक शब्द का प्रयोग निस्संदेह निंदनीय है। सत्ता में बैठे व्यक्ति से भाषा, आचरण और संवेदनशीलता के उच्च स्तर की अपेक्षा स्वाभाविक है। पत्रकार जब जनहित का प्रश्न पूछ रहा हो, तब उसे अपमानित करना केवल व्यक्तिगत दुर्व्यवहार नहीं, बल्कि सत्ता की जवाबदेही से बचने की प्रवृत्ति भी माना जाएगा। इसलिए ऐसी टिप्पणी की आलोचना होनी ही चाहिए।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या सार्वजनिक जीवन की मर्यादा केवल मंत्रियों और सत्ता पक्ष के लिए है? क्या विरोध करने वालों, युवाओं, कलाकारों और आंदोलनकारियों को अश्लीलता तथा निजी अपमान की खुली छूट मिल जानी चाहिए? क्या किसी व्यक्ति के चेहरे, शरीर, परिवार या निजी जीवन पर अभद्र टिप्पणी केवल इसलिए रचनात्मक हो जाती है, क्योंकि वह सत्ता के विरुद्ध की गई है?
व्यंग्य लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हथियार है। सत्ता की आलोचना भी जरूरी है। लेकिन व्यंग्य और अश्लीलता, आलोचना और निजी अपमान तथा असहमति और अमर्यादा के बीच एक स्पष्ट अंतर होता है। इस अंतर को जानबूझकर मिटाना समाज को अधिक लोकतांत्रिक नहीं, बल्कि अधिक असहिष्णु और असभ्य बनाता है।
सबसे चिंताजनक भूमिका उन बुद्धिजीवियों, मीडिया संस्थानों और सामाजिक समूहों की है, जो भाषा की नैतिकता का मूल्यांकन वक्ता की विचारधारा देखकर करते हैं। विरोधी पक्ष की अभद्रता उन्हें लोकतंत्र पर हमला दिखाई देती है, लेकिन अपने पक्ष की अभद्रता उन्हें युवा आक्रोश, हास्य अथवा प्रतिरोध की नई भाषा लगती है। यही दोहरा मापदंड सामाजिक संवाद की विश्वसनीयता को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाता है।
यह तर्क दिया जा सकता है कि सत्ता में बैठे व्यक्ति की जिम्मेदारी आंदोलनकारी नागरिक से अधिक होती है। यह सही भी है। लेकिन अधिक जिम्मेदारी का अर्थ यह नहीं कि दूसरे पक्ष की कोई जिम्मेदारी ही नहीं है। मंत्री की गलती बड़ी हो सकती है, पर इससे आंदोलनकारी की अश्लीलता सही नहीं हो जाती। लोकतंत्र में अधिकारों के साथ आत्मसंयम और उत्तरदायित्व भी आवश्यक हैं।
समाज केवल कानूनों से सभ्य नहीं बनता। वह उन मानकों से सभ्य बनता है, जिन्हें वह अपने लोगों और विरोधियों—दोनों पर समान रूप से लागू करता है। मंत्री की अपमानजनक भाषा गलत है, तो युवाओं की अपमानजनक भाषा भी गलत है। विचारधारा बदलने से शब्दों का चरित्र नहीं बदल जाता।
हमें तय करना होगा कि हम असहमति की संस्कृति बनाना चाहते हैं या अपमान की; तर्क का समाज बनाना चाहते हैं या गाली और उपहास का। यदि अश्लीलता को रचनात्मकता और अपमान को प्रतिरोध कहा जाने लगा, तो आने वाली पीढ़ियां संवाद नहीं, केवल एक-दूसरे को नीचा दिखाना सीखेंगी। ऐसा समाज किसी भी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं हो सकता।
मनोज जोशी ( वरिष्ठ पत्रकार )