
वसन्त ऋतु ( चैत्र-वैशाख )
*खाएं:- पुराने जौ, गेहूं, मूंग, मसूर, चने की दालें, मूली, घीय, गाजर, बथुआ, चौलाई, परवल, सरसों, मेथी, पालक, धनिया, अदरक, शहद, फलों का रस, दलिया, खिचड़ी, तुलसी, काली मिर्च, मुलेठी, अदरक का जल, विजयसार, चंदन का जल।
*न खाएं:-नया अन्न, ठंडे एवं चिकनाई युक्त, भारी, खट्टे एवं मीठे आहार, दही, उड़द, आलू, प्याज, गन्ना, नया गुड़, भैंस का दूध, सिंघाड़ा।
*ग्रीष्म ऋतु ( ज्येष्ठ-आषाढ़ ) :-
*खाएं:-* हल्के, मीठे, चिकनाई वाले पदार्थ, ठंडे पदार्थ, चावल, जौ, मूंग, मसूर, दूध, शरबत, दही की लस्सी, फलों का रस, सत्तू, छाछ, संतरा, अनार, नींबू, खरबूजा, तरबूज, शहतूत, गन्ना, नारियल पानी, जलजीरा, प्याज, कच्चा आम।
*न खाएं:-* धूप, परिश्रम, व्यायाम, सहवास, प्यास रोकना, रेशमी कपड़े, कृत्रिम सौंदर्य प्रसाधन, प्रदूषित जल, गरम, तीखे, नमकीन, तले हुए पदार्थ, तेज मसाले, मैदा, बेसन l
*वर्षा ऋतु (श्रावण-भाद्रपद) :-*
*खाएं:-* नमकीन व खट्टे पदार्थ, शहद, पुराने जौं, गेहूं, शालि चावल, हरे चने, मसूर दाल, मेथी, काली मिर्च, सौंफ, पिप्पली, सरसों का तैल, तिल तैल, दूध में हल्दी के साथ सौंठ का चूर्ण, गरम करके ठंडे किए हुए जल, शहद-जल (उष्ण), सप्ताह में एक दिन उपवास।
न खाएं: अधिक ठंडे या भारी आहार, अस्वच्छ जल, अत्यधिक नमक या तीखे रस।
शरद ऋतु (आश्विन-कार्तिक):
खाएं: तिक्त (नीम जैसा), मधुर और कषैले द्रव्य, शालि चावल, गेहूं, जौ, साठी चावल, दूध, दही, खोया, मलाई, शर्करा, राब, शाक, परवल, आँवला, मुनक्का, फल, मधु, श्करा, हंसोदक जल।
*न खाएं:-* अत्यधिक चिकनाई युक्त या गरम आहार, अत्यधिक तीखे या नमकीन पदार्थ।
*हेमन्त ऋतु ( मार्गशीर्ष-पौष ) :-*
*खाएं:-* भारी भोजन, घी, चिकनाई युक्त, दही, मलाई, रबड़ी, गुड़, गन्ने का रस, तिल, उड़द, खजूर, नए चावल का भात, चीनी, मिश्री, मिठाई, शहद, मौसमी फल, बादाम, पिस्ता, अखरोट।
*न खाएं:-* अत्यधिक ठंडे या हल्के आहार, अत्यधिक खट्टे या खांसी वाले
शिशिर ऋतु ( माघ-फाल्गुन )
खाएं:भारी भोजन, चिकनाई वाला, दही, मलाई, रबड़ी, ऊष्ण जल, गुड़, गन्ने का रस, तिल, उड़द, मीठी चीजें, नए चावल का भात, बादाम, पिस्ता, अखरोट, चीनी, मिश्री, मौसमी फल।
न खाएं: ठंडे एवं रूखे आहार, अत्यधिक ठंडे पेय, अत्यधिक नमकीन या भारी भोजन।
नोट:- ऋतुचर्या के अनुसार आहार-विहार का पालन करने से रोगों की उत्पत्ति की संभावना काफी कम हो जाती है। ऋतु संधि काल (दो ऋतुओं के बीच का संक्रमण काल) में आहार में अचानक परिवर्तन करने के बजाय धीरे-धीरे परिवर्तन करें, ताकि शरीर को नए मौसम के अनुसार अनुकूलित होने में आसानी हो और कोई स्वास्थ्य समस्या या विकार उत्पन्न न हो।

