अभिमन्यु:- चक्रव्यूह की mystical यात्रा और अपूर्णता की पूर्णता

अभिमन्यु:- चक्रव्यूह की mystical यात्रा और अपूर्णता की पूर्णता

 

अभिमन्यु को चक्रव्यूह के सात द्वार खोलने थे।

अभिमन्यु के भी सात आयाम हैं जो अभिमन्यु के जीवन को एक mystical यात्रा के रूप में परिभाषित करते हैं — पूर्वजन्म के अधूरे कर्म से लेकर गर्भ में अधूरे ज्ञान तक, चक्रव्यूह के आध्यात्मिक प्रतीकवाद से लेकर एकाकी युद्ध में चेतना की उत्कर्ष-यात्रा तक, और अन्ततः उस मोक्ष तक जो अपूर्णता के माध्यम से पूर्णता की ओर ले जाता है।

 

(१)

प्रत्येक mystical परम्परा — चाहे वह वेदान्त हो, सूफ़ीवाद हो, या Neoplatonism — इस सत्य पर एकमत है कि आत्मा का जन्म आकस्मिक नहीं होता। वह एक उद्देश्य लेकर आती है, एक अधूरा कर्म लेकर आती है, एक ऋण लेकर आती है जो चुकाना होता है।

 

“जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।” — भगवद्गीता 2.27

 

भागवत पुराण और कुछ दक्षिण भारतीय पौराणिक परम्पराओं में अभिमन्यु को एक विशिष्ट पूर्व-आत्मा का अवतार माना गया है। कुछ आख्यानों में उन्हें चन्द्रमा-पुत्र वर्चस माना गया है जिसे स्वर्गलोक से इस भूलोक में केवल सोलह वर्षों के लिए भेजा गया था, क्योंकि देवताओं को उनकी दिव्य ऊर्जा की पृथ्वी पर आवश्यकता थी।

 

रहस्यवादी साधक इसे ‘नियोजित अवतरण’ (Intentional Incarnation) कहते हैं। प्लोटिनस (Plotinus) ने अपने Enneads में लिखा है कि आत्मा The One से निसृत होती है और एक विशिष्ट कार्य के लिए भौतिक जगत् में प्रवेश करती है। जब वह कार्य पूर्ण होता है, आत्मा वापस लौट जाती है। अभिमन्यु का सोलह वर्ष का जीवन इसी सिद्धान्त का जीवन्त प्रमाण है — अल्पकाल में सम्पूर्ण उद्देश्य।

 

“The soul does not come to be in time; it is in time that we come to be.” — Plotinus, Enneads IV.3.9

 

भारतीय दर्शन में कर्म-सिद्धान्त के अनुसार, जब किसी आत्मा का कोई कर्म-ऋण अनसुलझा रह जाता है, तो उसे पुनः जन्म लेना पड़ता है। अभिमन्यु का पूर्वजन्म इसी की अभिव्यक्ति है — एक ऐसी आत्मा जिसे एक बार और, एक निश्चित भूमिका में, एक निश्चित समय पर आना था।

 

(२)

 

अभिमन्यु के रहस्यवाद का सर्वाधिक प्रभावशाली और दार्शनिक रूप से समृद्ध प्रसंग वह है जब वे अपनी माता सुभद्रा के गर्भ में थे। अर्जुन उन्हें चक्रव्यूह में प्रवेश करने की विधि सुना रहे थे। किन्तु सुभद्रा मध्य में ही निद्रा में लीन हो गईं और अर्जुन का वर्णन प्रवेश की विधि तक ही सीमित रह गया। निकास का रहस्य अनसुना रह गया।

यहाँ प्रश्न उठता है — क्या यह एक संयोग था? या यह ब्रह्माण्डीय नियोजन था?

 

वेदान्त दर्शन में माया और अविद्या के सिद्धान्त का मूल यही है कि यदि जीव को सम्पूर्ण ज्ञान दे दिया जाए — यदि उसे जन्म और मृत्यु दोनों का, प्रवेश और निकास दोनों का बोध हो जाए — तो वह इस संसार में टिक नहीं सकता। उसे संसार की आवश्यकता ही न रहे। अतः ईश्वर ने यह अविद्या का पर्दा डाल रखा है।

 

“अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते।” — ईशावास्योपनिषद्, मन्त्र 11

 

अर्थात् अविद्या के द्वारा मृत्यु को पार किया जाता है और विद्या के द्वारा अमृत को प्राप्त किया जाता है। अभिमन्यु के जीवन में यह सूत्र अक्षरशः चरितार्थ होता है। उन्हें अर्धज्ञान मिला — प्रवेश का, संघर्ष का, लड़ने का — किन्तु निकास का नहीं। और यही अर्धज्ञान उनकी नियति बना।

 

(३)

आधुनिक depth psychology के जनक Carl Gustav Jung ने collective unconscious का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। उनके अनुसार प्रत्येक मनुष्य अपने जन्म से पूर्व के अनुभवों, अपनी प्रजाति की स्मृतियों और अपने archetypes को साथ लेकर आता है।

 

“The collective unconscious contains the whole spiritual heritage of mankind’s evolution, born anew in the brain structure of every individual.” — C.G. Jung, The Structure of the Psyche

 

अभिमन्यु का गर्भ-संस्कार Jung के इसी सिद्धान्त का प्रतीक है। वे जो ज्ञान गर्भ में लेकर आए, वह केवल युद्ध-विद्या नहीं था — वह उनकी आत्मा की पूर्व-स्मृति थी, उनके अस्तित्व का उद्देश्य था। और सुभद्रा का सो जाना — वह माया का वह क्षण था जब ब्रह्माण्ड ने निर्णय किया कि इस आत्मा को कितना जानने का अधिकार है।

 

(४)

 

चक्रव्यूह के सात द्वार महाभारत की सर्वाधिक mystically charged अवधारणाओं में से एक हैं। यह एक सैन्य संरचना मात्र नहीं थी — यह ब्रह्माण्ड की, मानव-चेतना की, और मुक्ति-मार्ग की प्रतीकात्मक रूपरेखा थी।

 

सात द्वार सात आध्यात्मिक तल हैं। भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में ‘सात’ की संख्या का विशिष्ट महत्त्व है। सात चक्र — मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्रार — मानव-चेतना के सात स्तर हैं। सात कोश — अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनंदमय, चित्त और सत् — आत्मा के सात आवरण हैं। सात लोक — भूलोक से सत्यलोक तक — अस्तित्व के सात आयाम हैं।

 

चक्रव्यूह के सात द्वार इन सभी की एक साथ अभिव्यक्ति हैं। सात महारथी जो अभिमन्यु का मार्ग रोक रहे थे — द्रोण, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, कृतवर्मा, शकुनि और दुर्योधन — वे सात आन्तरिक शत्रुओं के प्रतीक हैं जो साधक की मुक्ति का मार्ग अवरुद्ध करते हैं : अहंकार, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर।

 

“काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः। महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।” — भगवद्गीता 3.37

 

Sufi और Kabbalistic दृष्टिकोण

Sufism में ‘Nafs’ — अहंकारी स्व — के सात स्तर बताए गए हैं जिन्हें पार करते हुए साधक ‘फ़ना’ (Fana) — अर्थात् आत्म-विलय — तक पहुँचता है। ईरानी सूफ़ी कवि जलालुद्दीन रूमी ने मसनवी में लिखा है :

 

“Die and become! Until you have learned this, you are only a troubled guest on the dark earth.” — Rumi, Masnavi

 

यहूदी परम्परा के Kabbalah में ‘Sephiroth’ के दस स्तर हैं और उनमें से सात निचले स्तर मानव-अनुभव का प्रतिनिधित्व करते हैं। चक्रव्यूह के सात द्वारों की तुलना इन Sephiroth से करना युक्तिसंगत है — दोनों में यात्रा ‘नीचे’ से ‘ऊपर’ की ओर है, भौतिक से आध्यात्मिक की ओर।

 

चक्रव्यूह केवल अभिमन्यु का नहीं था। यह हम सबका है।

क्रमशः …..