भारत की आत्मा में बसे सनातन धर्म के महान ग्रन्थ — रामायण, महाभारत, श्रीमद् भागवत, वेद, उपनिषद्, पुराण और गीता — केवल पुस्तकें नहीं हैं। ये लोकमानस के सखा हैं, सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते आ रहे विश्वसनीय साथी हैं।जब विपदा आती है, जब संकट घेर लेता है, जब धर्म का संकट होता है, तब इन ग्रन्थों के पात्र जीवंत हो उठते हैं। राम की मर्यादा, सीता की पतिव्रता, हनुमान की निश्छल भक्ति, कृष्ण की गीता-उपदेश, भीष्म का प्रतिज्ञा-पालन, द्रौपदी का साहस, सावित्री का संकल्प — ये सब हमारे अपने हो जाते हैं। ये पात्र दूर के नहीं, बल्कि हमारे परिवार के सदस्य बन जाते हैं। वे सिखाते हैं कि संकट में भी धर्म का मार्ग छोड़ना नहीं चाहिए।
कहने का तात्पर्य हैं कि इन ग्रन्थों ने लोकजीवन को नैतिकता का आधार प्रदान किया। जो लोग बिना पढ़े-समझे इन परंपराओं को खारिज करते हैं, वे लोक-आस्था की शक्ति को नहीं जानते। वे भारतीय समाज की उस मजबूत नींव को नकारते हैं, जिसने हजारों वर्षों तक संस्कृति को जीवित रखा।
आइए, हम इन ग्रन्थों को फिर से अपनाएँ। घर-घर में रामायण पढ़ें, बच्चों को गीता के श्लोक सिखाएँ, भागवत की कथाएँ सुनाएँ। इससे न केवल हमारा व्यक्तिगत जीवन सुधरेगा, बल्कि पूरा समाज नैतिकता, साहस और करुणा से भर जाएगा।लोकमानस के ये सखा आज भी हमारे साथ हैं। जब हम इन्हें अपनाते हैं, तो हमारी पीढ़ियाँ भी इनके सहारे मजबूत बनती हैं।