
*मनोज जोशी*
*आज* ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक और आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की पुण्यतिथि है। उन्हें सादर नमन करते हुए मन में एक प्रश्न उठता है कि 1925 में नागपुर में कुछ किशोरों के साथ शुरू हुई उनकी छोटी-सी पहल सौ वर्ष बाद देश के सबसे बड़े संगठित सामाजिक आंदोलनों में से एक कैसे बन गई?
इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए केवल संघ की यात्रा को देखना पर्याप्त नहीं है। उसी कालखंड में शुरू हुई एक दूसरी वैचारिक यात्रा को भी देखना होगा।
ईस्वी सन् 1925 भारतीय इतिहास में केवल कैलेण्डर वर्ष नहीं, बल्कि दो अलग-अलग वैचारिक यात्राओं की शुरुआत का वर्ष था।
दिसंबर 1925 में कानपुर में कम्युनिस्ट सम्मेलन हुआ, जिसे भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन अपनी स्थापना के महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखता है। उसी वर्ष दशहरे पर नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। एक ओर सैकड़ों प्रतिनिधियों वाला सम्मेलन था, दूसरी ओर कुछ किशोरों की छोटी-सी शाखा।
यदि उस समय कोई भविष्यवाणी करता, तो शायद कम्युनिस्ट आंदोलन को अधिक संभावनाशील मानता। लेकिन सौ वर्ष बाद तस्वीर बिल्कुल अलग है। भारत में वामपंथ अपने पुराने प्रभाव क्षेत्रों तक सिमट गया है, जबकि संघ एक छोटे समूह से बढ़कर देश के सबसे व्यापक संगठित सामाजिक नेटवर्कों में से एक बन चुका है।
यह अंतर कैसे पैदा हुआ?
इसका उत्तर केवल विचारधारा में नहीं, बल्कि संगठन, नेतृत्व, कार्यपद्धति और समय के साथ स्वयं को बदलने की क्षमता में छिपा है।
विचार से अधिक महत्वपूर्ण संगठन
किसी भी आंदोलन की शुरुआत विचार से होती है, लेकिन उसका भविष्य संगठन तय करता है।
कम्युनिस्ट आंदोलन का आधार एक सुव्यवस्थित वैचारिक ढाँचा था। वर्ग संघर्ष, मजदूर अधिकार, आर्थिक समानता और समाजवादी व्यवस्था उसके प्रमुख लक्ष्य थे। विचार स्पष्ट था और दुनिया के अनेक देशों में उसे बड़ी सफलता भी मिली।
संघ की शुरुआत एक राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में नहीं हुई। उसका घोषित उद्देश्य समाज का संगठन, चरित्र निर्माण और सांस्कृतिक चेतना का विकास था। इसलिए उसकी ऊर्जा चुनाव जीतने के बजाय कार्यकर्ता निर्माण पर केंद्रित रही।
यहीं से दोनों यात्राओं के रास्ते अलग होने लगे।
सोवियत संघ का पतन और वैचारिक संकट
बीसवीं सदी के अधिकांश हिस्से में दुनिया भर के कम्युनिस्ट आंदोलनों के लिए सोवियत संघ प्रेरणा का केंद्र था।
लेकिन 1991 में सोवियत संघ का विघटन केवल एक देश का पतन नहीं था। यह उस विचार के लिए भी बड़ा झटका था जिसे दशकों तक मानवता का भविष्य बताया गया था। दुनिया भर के कम्युनिस्ट दलों को अपने अस्तित्व और दिशा पर नए सिरे से विचार करना पड़ा।
भारत में भी इसका प्रभाव पड़ा।
इसके विपरीत संघ का विकास किसी विदेशी मॉडल पर आधारित नहीं था। उसकी पूरी यात्रा भारतीय समाज और भारतीय सांस्कृतिक संदर्भों के भीतर हुई। इसलिए वैश्विक राजनीतिक परिवर्तनों का उस पर वैसा प्रभाव नहीं पड़ा जैसा कम्युनिस्ट आंदोलनों पर पड़ा।
बदलते भारत को किसने बेहतर समझा?
1947 का भारत, 1975 का भारत और 2025 का भारत एक जैसे नहीं हैं।
देश कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था से औद्योगिक अर्थव्यवस्था और फिर सेवा तथा डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ा। समाज की आकांक्षाएँ बदलीं। रोजगार के स्वरूप बदले। संचार के तरीके बदल गए।
कम्युनिस्ट आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत ट्रेड यूनियन और संगठित मजदूर वर्ग था। लेकिन भारत की नई अर्थव्यवस्था में आईटी प्रोफेशनल, स्वरोजगार, स्टार्टअप, सेवा क्षेत्र और असंगठित कार्यबल तेजी से बढ़े।
संघ ने इसी दौर में अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार किया। छात्र, शिक्षक, किसान, मजदूर, वनवासी, महिलाएँ, पेशेवर वर्ग, शिक्षा, सेवा और ग्राम विकास जैसे क्षेत्रों में अलग-अलग संगठन विकसित किए गए।
विचार वही रहा, लेकिन समाज तक पहुँचने के रास्ते बदलते गए।
संघ ने क्या बदला और क्या नहीं?
आलोचक अक्सर कहते हैं कि संघ का मूल विचार नहीं बदला। समर्थक इसे उसकी सबसे बड़ी शक्ति मानते हैं। लेकिन एक तथ्य निर्विवाद है कि उसकी कार्यपद्धति लगातार बदली।
1925 में शाखा केंद्र में थी।
1950 और 1960 के दशक में छात्र और मजदूर संगठनों का विस्तार हुआ।
1975 के आपातकाल ने संगठन को भूमिगत नेटवर्क और वैकल्पिक संरचनाओं की आवश्यकता सिखाई।
1980 और 1990 के दशक में सांस्कृतिक और सामाजिक आंदोलनों का विस्तार हुआ।
2000 के बाद सेवा कार्य, शिक्षा और ग्राम विकास प्रमुख हुए।
2010 के बाद डिजिटल संवाद, सोशल मीडिया और शहरी युवा वर्ग पर विशेष ध्यान दिया गया।
अर्थात संगठन ने हर दशक में अपने काम करने के तरीके को समय के अनुसार ढाला। लेकिन उसके मूल उद्देश्य में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं आया।
यहीं डॉ. हेडगेवार का वह विचार महत्वपूर्ण हो जाता है जिसने संघ की दिशा तय की।
“जो लोग संघ से बाहर हैं, संघ उनके लिये भी है”
अपने अंतिम बौद्धिक में डॉ. हेडगेवार ने कहा था,
“संघ के बाहर का हिन्दू समाज ही हमारा वास्तविक महत्वपूर्ण कार्यक्षेत्र है। संघ की स्थापना सिर्फ संघ में आने वाले स्वयंसेवकों के लिये नहीं की गई है। जो लोग संघ से बाहर हैं, संघ उनके लिये भी है।”
संभवतः यही वाक्य संघ की दीर्घकालिक सफलता का सबसे बड़ा सूत्र है।
अधिकांश संगठन अपने सदस्यों के लिए काम करते हैं। डॉ. हेडगेवार ने संघ को अपने स्वयंसेवकों तक सीमित संगठन के रूप में नहीं देखा। उनके लिए शाखा लक्ष्य नहीं थी, साधन थी। लक्ष्य था समाज का संगठन।
यही कारण है कि संघ की दृष्टि शाखा के भीतर से अधिक शाखा के बाहर रही।
संघ को समझने की कुंजी भी शायद इसी विचार में छिपी है।
नेतृत्व निर्माण की कला
किसी संगठन की असली ताकत उसके नेताओं से नहीं, बल्कि नए नेताओं को तैयार करने की क्षमता से मापी जाती है।
कम्युनिस्ट आंदोलन में अनेक प्रतिभाशाली नेता हुए, लेकिन समय के साथ नई पीढ़ी का नेतृत्व अपेक्षित गति से विकसित नहीं हो पाया।
दूसरी ओर संघ ने कार्यकर्ता निर्माण को ही अपनी केंद्रीय प्रक्रिया बनाया। हजारों प्रचारक और लाखों स्वयंसेवक नेतृत्व की नई परतें बनाते रहे।
डॉ. हेडगेवार से लेकर गुरुजी गोलवलकर, बालासाहब देवरस, राजेंद्र सिंह, सुदर्शन और मोहन भागवत तक नेतृत्व बदला, लेकिन संगठन की निरंतरता बनी रही।
विभाजन और विस्तार
भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन का इतिहास विभाजनों का इतिहास भी रहा है।
वैचारिक मतभेदों ने अनेक धाराओं को जन्म दिया। एक धारा से दूसरी निकली, फिर तीसरी। परिणाम यह हुआ कि ऊर्जा का एक हिस्सा आंतरिक बहसों और संगठनात्मक संघर्षों में खर्च होता रहा।
संघ परिवार में भी अनेक संगठन बने, लेकिन वे मूल संगठन से अलग स्वतंत्र वैचारिक धारा बनकर विकसित नहीं हुए। संगठनात्मक एकता काफी हद तक बनी रही।
यह भी दोनों यात्राओं के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है।
सत्ता और संगठन का अंतर
पश्चिम बंगाल इसका एक रोचक उदाहरण है।
वाम मोर्चा 34 वर्षों तक सत्ता में रहा। यह विश्व के सबसे लंबे लोकतांत्रिक वाम शासन में से एक था। लेकिन सत्ता से हटने के बाद उसका जनाधार तेजी से सिकुड़ गया।
यह दिखाता है कि सत्ता और संगठन एक ही चीज नहीं हैं।
दूसरी ओर संघ ने अपने अधिकांश इतिहास में बिना सत्ता के संगठन विस्तार किया। इसलिए उसकी प्राथमिकता चुनावी सफलता से अधिक सामाजिक उपस्थिति पर बनी रही।
तकनीक का दौर
एक समय था जब वामपंथ स्वयं को आधुनिक विचारों का प्रतिनिधि मानता था। लेकिन डिजिटल युग में तकनीक को अपनाने की गति दोनों पक्षों में अलग दिखाई दी।
सोशल मीडिया, डिजिटल संवाद, ऑनलाइन प्रशिक्षण और नए संचार माध्यमों का उपयोग संघ से जुड़े संगठनों ने तेजी से बढ़ाया। इससे युवा पीढ़ी तक पहुँच आसान हुई।
यह भी संगठनात्मक अनुकूलन का एक उदाहरण है।
क्या कहानी यहीं खत्म हो जाती है?
नहीं।
इतिहास कभी अंतिम निर्णय नहीं देता।
डॉ. हेडगेवार ने अपने अंतिम बौद्धिक में संगठन को ही राष्ट्रोन्नति का मार्ग बताया था। संभव है कि संघ की सौ वर्ष की यात्रा को समझने की सबसे सरल कुंजी भी वहीं छिपी हो।
जो समय को पढ़ लेता है, वह आगे बढ़ता है। जो केवल समय को कोसता है, वह पीछे छूट जाता है।
