
– *मनोज जोशी*
*कर्नाटक* में हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को लेकर एक बार फिर यह सवाल उठाया गया कि संघ किसी कानून के तहत पंजीकृत नहीं है। राजनीतिक बहस के बीच यह तर्क सामने आया कि जब आरएसएस पंजीकृत संस्था नहीं है, तो उसकी वैधता और जवाबदेही पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। यह विवाद नया नहीं है। पिछले कई दशकों से समय-समय पर यह प्रश्न सार्वजनिक विमर्श में उभरता रहा है। लेकिन इस बहस में एक मूलभूत प्रश्न अक्सर छूट जाता है। भारतीय कानून वास्तव में क्या कहता है? क्या किसी सामाजिक, सांस्कृतिक या वैचारिक संगठन के लिए पंजीकरण अनिवार्य है?
सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि भारत में किसी संगठन का अस्तित्व और उसका पंजीकरण दो अलग-अलग विषय हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(c) के तहत नागरिकों को संघ, संगठन या संस्था बनाने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। संविधान नागरिकों को संगठित होने का अधिकार देता है, लेकिन यह कहीं नहीं कहता कि किसी संगठन के अस्तित्व के लिए उसका पंजीकृत होना अनिवार्य है।
जिस कानून का सबसे अधिक उल्लेख किया जाता है, वह सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 है। इस अधिनियम की धारा 1 और धारा 20 विभिन्न प्रकार की साहित्यिक, वैज्ञानिक, शैक्षणिक, परोपकारी और सामाजिक संस्थाओं के पंजीकरण की व्यवस्था करती हैं। लेकिन अधिनियम में कहीं भी ऐसा प्रावधान नहीं है जो यह कहता हो कि ऐसे सभी संगठनों का पंजीकरण अनिवार्य होगा अथवा अपंजीकृत संगठन अवैध माने जाएंगे।
विधिक दृष्टि से यह एक सुविधा प्रदान करने वाला कानून है। इसका उद्देश्य इच्छुक संस्थाओं को एक स्वतंत्र विधिक पहचान प्राप्त करने का अवसर देना है। पंजीकरण कराने पर संस्था अपने नाम से संपत्ति रख सकती है, बैंक खाते संचालित कर सकती है, मुकदमा दायर कर सकती है या उसके विरुद्ध मुकदमा चल सकता है। लेकिन यह सुविधा है, अस्तित्व की शर्त नहीं।
यहीं भारतीय विधि की एक महत्वपूर्ण अवधारणा सामने आती है, जिसे सामान्यतः “अपंजीकृत संगठन” कहा जाता है। भारतीय कानून संगठन के अस्तित्व और उसकी स्वतंत्र विधिक पहचान को अलग-अलग मानता है। किसी संगठन का अस्तित्व उसके सदस्यों की इच्छा, उसके उद्देश्य और उसकी गतिविधियों से बनता है, जबकि पंजीकरण उसे अतिरिक्त कानूनी सुविधाएं प्रदान करता है।
सरल शब्दों में कहें तो यदि कुछ व्यक्ति किसी साझा उद्देश्य के लिए संगठित होकर नियमित रूप से कार्य करते हैं, अपने नियम बनाते हैं और स्वयं को एक समूह के रूप में संचालित करते हैं, तो वे बिना किसी पंजीकरण के भी एक संगठन के रूप में अस्तित्व में रह सकते हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(c) उन्हें ऐसा करने का अधिकार देता है।
भारत में ऐसे संगठनों के उदाहरण असंख्य हैं। अनेक धार्मिक मंडल, रामलीला समितियां, गणेश उत्सव समितियां, भजन मंडलियां, साहित्यिक मंच, सांस्कृतिक समूह और सामाजिक संगठन वर्षों तक बिना किसी औपचारिक पंजीकरण के कार्य करते रहे हैं। उनकी वैधता का आधार उनका पंजीकरण नहीं, बल्कि उनका शांतिपूर्ण और विधिसम्मत अस्तित्व है।
निश्चित रूप से पंजीकरण के अपने लाभ हैं। पंजीकृत संस्था अपने नाम से संपत्ति रख सकती है, बैंक खाते संचालित कर सकती है, अनुबंध कर सकती है और मुकदमा दायर या उसका सामना कर सकती है। इसके विपरीत, अपंजीकृत संगठन को ऐसे मामलों में अपने पदाधिकारियों, न्यासों या अन्य कानूनी व्यवस्थाओं का सहारा लेना पड़ सकता है। लेकिन यह अंतर सुविधा का है, वैधता का नहीं।
कानून का मूल सिद्धांत यह है कि पंजीकरण संगठन को जन्म नहीं देता, बल्कि उसे एक पृथक विधिक पहचान प्रदान करता है। इसलिए किसी संगठन का अपंजीकृत होना अपने आप में उसकी अवैधता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। जब तक कोई संगठन किसी कानून का उल्लंघन नहीं कर रहा, तब तक उसका अस्तित्व केवल इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि उसने सोसायटी, ट्रस्ट या कंपनी के रूप में पंजीकरण नहीं कराया है।
आरएसएस के संदर्भ में भी यही स्थिति दिखाई देती है। संघ की स्थापना 1925 में एक सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन के रूप में हुई थी। उसकी मूल गतिविधियां शाखाएं, प्रशिक्षण वर्ग, बौद्धिक कार्यक्रम, सामाजिक संपर्क और स्वयंसेवी कार्य हैं। ऐसी गतिविधियों के लिए कानून किसी अनिवार्य पंजीकरण की मांग नहीं करता। संघ स्वयं को मुख्यतः व्यक्तियों के संगठन के रूप में देखता है, न कि संपत्ति या व्यावसायिक गतिविधियों के संचालन के लिए बनाई गई संस्था के रूप में।
यह भी उल्लेखनीय है कि जहां कानूनी संरचना की आवश्यकता होती है, वहां संघ से प्रेरित अनेक संस्थाएं अलग-अलग विधिक स्वरूपों में कार्य करती हैं। शिक्षा, सेवा, प्रकाशन, शोध, स्वास्थ्य और सामाजिक कार्यों से जुड़ी अनेक संस्थाएं ट्रस्ट, सोसायटी या अन्य वैधानिक ढांचों के तहत संचालित होती हैं। अर्थात जहां कानून किसी विशेष स्वरूप की अपेक्षा करता है, वहां उसका पालन किया जाता है।
इतिहास भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। आरएसएस की स्थापना को लगभग एक शताब्दी होने जा रही है। स्वतंत्र भारत की विभिन्न सरकारों, प्रशासनिक संस्थाओं और न्यायालयों के समक्ष उसका अस्तित्व कभी इस आधार पर अवैध नहीं ठहराया गया कि वह स्वयं एक पंजीकृत सोसायटी नहीं है। यदि भारतीय कानून में ऐसा कोई अनिवार्य प्रावधान होता, तो यह प्रश्न बहुत पहले ही निर्णायक रूप से सामने आ चुका होता।
निश्चित रूप से किसी भी संगठन की आलोचना हो सकती है। आरएसएस के विचारों, कार्यपद्धति और सार्वजनिक भूमिका पर मतभेद हो सकते हैं। लोकतंत्र में यह स्वाभाविक भी है। लेकिन कानूनी प्रश्न का उत्तर राजनीतिक पसंद और नापसंद के आधार पर नहीं, बल्कि कानून की कसौटी पर दिया जाना चाहिए।
और कानून की कसौटी पर तथ्य यही है कि भारत में किसी सामाजिक, सांस्कृतिक या वैचारिक संगठन का अस्तित्व केवल पंजीकरण पर निर्भर नहीं है। सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 पंजीकरण की सुविधा देता है, उसे सार्वभौमिक रूप से अनिवार्य नहीं बनाता। इसलिए केवल इस आधार पर कि आरएसएस स्वयं एक पंजीकृत संस्था नहीं है, उसे अवैध या गैरकानूनी ठहराना भारतीय विधिक व्यवस्था की भावना और प्रावधानों के अनुरूप तर्क नहीं माना जा सकता।
कानूनी दृष्टि से निष्कर्ष स्पष्ट है। जब तक कोई संगठन कानून का उल्लंघन नहीं कर रहा, तब तक उसका अस्तित्व केवल पंजीकरण के प्रश्न पर निर्भर नहीं करता। पंजीकरण एक विधिक सुविधा है, संगठन की वैधता का एकमात्र स्रोत नहीं।
