मनोज जोशी :-
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के संदर्भ में एकात्मता स्तोत्र का यह श्लोक
“अरुन्धत्यनसूया च सावित्री जानकी सती
द्रौपदी कण्णगी गार्गी मीरा दुर्गावती तथा॥
लक्ष्मीरहल्या चन्नम्मा रुद्रमाम्बा सुविक्रमा
निवेदिता सारदा च प्रणम्या मातृदेवताः॥”
यह संस्कृत श्लोक भारत की महान स्त्रियों को नमन करता है। यह केवल स्तुति नहीं है, बल्कि भारतीय इतिहास, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा में स्त्री की बहुआयामी भूमिका का स्मरण है।
यह श्लोक “एकात्मता स्तोत्रम्” का एक भाग है, जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की शाखाओं में प्रतिदिन सामूहिक रूप से उच्चारित किया जाता है। इस स्तोत्र का उद्देश्य भारत की विविध सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और ऐतिहासिक परंपराओं को एक सूत्र में जोड़ना है, ताकि समाज में सांस्कृतिक एकात्मता की भावना सुदृढ़ हो।
विशेष बात यह भी है कि 2025-26 का कालखंड आरएसएस का शताब्दी वर्ष है। संघ की स्थापना 1925 में विजयादशमी के दिन डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में की थी। इस दृष्टि से यह वर्ष संगठन के 100 वर्ष पूरे होने का प्रतीक है।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के संदर्भ में यह श्लोक विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इसमें भारत की विभिन्न युगों और क्षेत्रों की महान स्त्रियों का स्मरण किया गया है।
एकात्मता स्तोत्र का इतिहास और रचयिता
एकात्मता स्तोत्रम् की रचना आधुनिक काल में भारत की सांस्कृतिक एकता को रेखांकित करने के उद्देश्य से किया गया था।
इस स्तोत्र के रचयिता प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान और राष्ट्रवादी चिंतक श्री शिवराम शंकर आप्टे (दादा साहेब आप्टे) माने जाते हैं। उन्होंने इसे इस भाव से रचा कि भारत की विविध परंपराएँ, चाहे वे संत हों, ऋषि हों, वीर हों या समाज सुधारक, सब मिलकर एक ही सांस्कृतिक धारा का निर्माण करती हैं।
इस स्तोत्र में भारत के अनेक महापुरुषों और महापुरुषियों का स्मरण किया गया है, जैसे
आदि शंकराचार्य, गुरु नानक, स्वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद, छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी आदि।
इसी क्रम में यह श्लोक भारत की महान महिलाओं का स्मरण करता है।
श्लोक का भावार्थ
इस श्लोक में जिन महिलाओं का स्मरण किया गया है, वे अलग-अलग काल, क्षेत्र और परंपराओं से आती हैं, लेकिन उनमें एक समान तत्व है, साहस, ज्ञान, भक्ति और त्याग।
भावार्थ:
अरुंधती, अनुसुइया, सावित्री, सीता (जानकी), सती, द्रौपदी, कन्नगी, गार्गी, मीरा, रानी दुर्गावती, लक्ष्मी, अहल्या, चन्नम्मा, रुद्रमाम्बा, भगिनी निवेदिता और माँ सारदा ये सभी मातृदेवियाँ हमारे लिए वंदनीय हैं।
भारतीय परंपरा में नारी के विविध आदर्श
1. तपस्या और पतिव्रता की शक्ति
अरुंधती, अनुसुइया और सावित्री भारतीय परंपरा में निष्ठा और तपस्या के अद्भुत उदाहरण हैं।
अरुंधती ऋषि वशिष्ठ की पत्नी थीं। विवाह संस्कार में आज भी दंपत्ति को अरुंधती तारा दिखाया जाता है।
अनुसुइया अपने तप और पतिव्रत के लिए प्रसिद्ध थीं।
सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस प्राप्त किए।
2. धर्म और स्वाभिमान की प्रतीक
सीता, सती और द्रौपदी भारतीय साहित्य में मर्यादा और न्याय की प्रतिनिधि हैं।
सीता (जानकी) धैर्य और त्याग की प्रतिमूर्ति हैं।
सती (दक्षायणी) आत्मसम्मान और समर्पण का प्रतीक हैं।
द्रौपदी अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक हैं।
3. ज्ञान और दर्शन की परंपरा
गार्गी वैदिक युग की महान दार्शनिक थीं।
उन्होंने बृहदारण्यक उपनिषद में ऋषि याज्ञवल्क्य के साथ ब्रह्मज्ञान पर शास्त्रार्थ किया। यह घटना बताती है कि प्राचीन भारत में स्त्रियाँ भी उच्च बौद्धिक विमर्श का हिस्सा थीं।
4. भक्ति और आध्यात्मिक चेतना
मीरा बाई कृष्ण भक्ति की महान संत थीं।
उन्होंने सामाजिक परंपराओं से ऊपर उठकर भक्ति को अपने जीवन का आधार बनाया।
इसी प्रकार माँ सारदा (रामकृष्ण परमहंस की सहधर्मिणी) आध्यात्मिक करुणा और मातृत्व की प्रतिमूर्ति मानी जाती हैं।
5. वीरता और नेतृत्व
इस श्लोक में कई वीरांगनाओं का भी उल्लेख है—
रानी दुर्गावती ने मुगल सेना के विरुद्ध युद्ध किया।
कित्तूर की रानी चन्नम्मा ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया।
रुद्रमाम्बा (रुद्रमा देवी) दक्षिण भारत की एक शक्तिशाली शासक थीं।
ये उदाहरण बताते हैं कि भारतीय इतिहास में स्त्रियाँ शासन और युद्ध दोनों में अग्रणी रही हैं।
राष्ट्र सेविका समिति और नारी संगठन
संघ परिवार में महिलाओं के संगठन के रूप में राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना 1936 में नागपुर में लक्ष्मीबाई केलकर (मौसीजी) ने की थी।
इस संगठन का उद्देश्य महिलाओं में राष्ट्रभावना, सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक मूल्यों का विकास करना है।
राष्ट्र सेविका समिति की शाखाओं में भी भारतीय इतिहास की वीरांगनाओं और महान स्त्रियों के जीवन से प्रेरणा लेने की परंपरा रही है। इस दृष्टि से एकात्मता स्तोत्र में नारी-शक्ति का यह स्मरण अत्यंत अर्थपूर्ण माना जाता है।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस और भारतीय दृष्टि
आज पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में महिलाओं के अधिकार और समानता की बात करती है।
लेकिन भारतीय संस्कृति में स्त्री को केवल अधिकारों के संदर्भ में नहीं, बल्कि शक्ति और सृजन की मूल ऊर्जा के रूप में देखा गया है।
शास्त्रों में कहा गया है,
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः”
अर्थात जहाँ स्त्रियों का सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं।
निष्कर्ष
एकात्मता स्तोत्र का यह श्लोक हमें यह याद दिलाता है कि भारतीय सभ्यता में नारी का स्थान अत्यंत ऊँचा रहा है।
इन महान महिलाओं के जीवन से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि स्त्री
ज्ञान की ज्योति है
भक्ति की धारा है
साहस की प्रतीक है
और समाज की आधारशिला है।
जब दुनिया अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रही है और भारत में आरएसएस अपना शताब्दी वर्ष देख रहा है, तब यह श्लोक हमें उस सांस्कृतिक परंपरा की याद दिलाता है जिसमें नारी को केवल सम्मान ही नहीं, बल्कि “मातृदेवता” का स्थान दिया गया है।