मध्य प्रदेश राज्य की वित्तीय स्थिति हाशिए पर

 

 

केन्द्र सरकार का और राज्य सरकार दोनों का अगले साल का बजट आने वाला है और ऐसे में यह समझना जरूरी है कि कैसे केन्द्र और राज्य सरकार बढ़ते कर्ज़ से निपटेगी। खासकर राज्य सरकारें जिन्होंने चुनाव जीतने के लिए फ्री रेवड़ियां बांटने की योजनाएं लागू कर दी है।

 

मध्य प्रदेश राज्य भी इससे अछूता नहीं है और स्थिति यह की कर्ज़ का आंकड़ा राज्य के कुल बजट का लगभग ११०% हो चुका है जो की चिंतनीय और संवेदनशील है।

 

२२ साल पहले मध्यप्रदेश पर २०००० करोड़ रुपए का कर्ज था , जो आज बढ़कर ४६४००० करोड़ रुपए हो चुका है। पिछले २ सालों से सरकार लगभग हर साल ४०००० करोड़ रुपए का कर्ज ले रही है।

 

हमारे प्रदेश का कुल बजट ४२०००० करोड़ रुपए का है और कर्ज़ ४६४००० करोड़ रुपए हो चुका है। हर साल ब्याज के रूप में २७००० करोड़ रुपए हम भरते हैं।

 

लाड़ली बहना में लगभग १.२५ करोड़ महिलाएं लाभार्थी हैं जिसका कुल खर्च हर माह १२०० करोड़ रुपए से बढ़ाकर १८३६ करोड़ रुपए हो चुका है। पिछले २ सालों में सरकार ने ३८५०० करोड़ रुपए लाड़ली बहना में बांट चुके हैं।

 

कुछ लोगों का मानना है कि गरीब तबके को लाभ दिया जाना चाहिए और उनको पैसे बांटने से वह अपरोक्ष रूप से राज्य की अर्थव्यवस्था में आता है तो यह नुकसान नहीं हो सकता। लेकिन यदि यह नुकसान नहीं तो फिर कर्ज़ की जरूरत क्यों?

 

राज्य सरकार हर दिन १२५ करोड़ रुपए का कर्ज ले रही है और सिर्फ २०००० करोड़ रुपए का सालाना कर्ज़ लाड़ली बहना में पैसा बांटने के लिए लिया जाता है। तो ऐसे में फ्री के पैसे बांटने का औचित्य समझ से परे है!

 

राज्य सरकार को यह बताना होगा कि लाड़ली बहना योजना राज्य की वित्तीय स्थिति पर भार नहीं है। योजना पर खर्च – कर्ज़ से नहीं बल्कि आय के संसाधन से होना चाहिए।

 

अर्थशास्त्र का सिद्धांत है कि कर्ज़ से लिए हुए पैसे का उपयोग बांटने हेतु नहीं बल्कि आधारभूत संरचना एवं विकास कार्य में लगाना चाहिए ताकि आय के संसाधन बढ़े और कर्ज़ को जल्द चुकाया जा सकें। लेकिन पैसे बांटने के लिए कर्ज़ का उपयोग वित्तीय स्थिति को हाशिए पर ला रहा है। ऐसे में तय है कि सरकार बिजली, पेट्रोल डीजल, रीयल एस्टेट और शराब के दामों में वृद्धि करेगी और आम मध्यम वर्ग का जीवन मुश्किल करेगी।

 

यह तो साफ है कि फ्री रेवड़ियों ने राज्य की वित्तीय स्थिति को खराब कर दिया है, लेकिन क्या होना चाहिए ताकि स्थिति को सम्हाला जा सकें:

 

१. लाड़ली बहना योजना के लिए एक स्वैच्छिक दान कोष का गठन हो जिसमें प्रदेश का हर व्यक्ति पार्टी व्यापारी कंपनी दान दें सकें और उसे आयकर में इसकी छूट प्राप्त हो। जितना कोष में हर माह दान आयेगा वही सिर्फ बांटा जाएगा।

2. कर्ज़ में कमी लाना और कर्ज़ के पैसे का उपयोग संरचना विकास में लगाना जिससे आम व्यक्ति को सस्ता इलाज शिक्षा एवं आवागमन के साधन उपलब्ध हो।

3. आधारभूत संरचना विकास से व्यापार और उद्योग को बढ़ावा मिलेगा। सस्ता कर्ज और बिजली मिलेगी तो उद्योग बढ़ेगा, टैक्स कलेक्शन बढ़ेगा जिससे आय के संसाधन होंगे और कर्ज़ से राहत मिलेगी।

 

कर्ज़ लेकर रेवड़ियां बांटने की योजनाओं पर लगाम कसनी होगी खासकर चुनाव के समय घोषित योजनाएं के वित्तीय पहलू की समीक्षा चुनाव आयोग को करनी होगी और तभी चुनावी घोषणापत्र में शामिल करने की परमीशन देनी होगी।

 

वैश्विक स्थिति नाजुक हैं और ऐसे में संसाधनों का सही एवं उचित उपयोग ही देश को आगे ले जायेगा। हमारी संवैधानिक संस्थाओं और न्यायपालिका को एक अहम भुमिका निभानी होगी ताकि सरकारों पर लगाम कसी जा सकें और फ्री योजनाओं के उचित संसाधन तय किए जा सकें।

 

*अब मध्यप्रदेश सरकार को तय करना होगा कि कैसे लाड़ली बहना योजना को ३००० रुपए प्रति माह प्रति महिला कैसे दिए जाएंगे ताकि आम आदमी खासकर मध्यम वर्ग पर बोझ न बढ़े?*

 

*सीए अनिल अग्रवाल जबलपुर ९८२६१४४९६५*