–रमेश शर्मा:—-
भारत राष्ट्र के रूपान्तरण केलिये चल रहे षड्यंत्र से सनातन समाज को जागरुक करने के अपने संकल्प के अंतर्गत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरणा से देशभर सकल हिन्दू सम्मेलन का अभियान आरंभ हुआ जो जनवरी माह के अंत तक चलेगा। इन सम्मेलनों के बाद समाज में संगठनात्मक समरसता और दायित्व वोध की झलक भी देखने को मिलने लगी।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी साँस्कृतिक और सामाजिक यात्रा के सौ वर्ष पूरे कर लिये हैं। संघ की स्थापना 1925 में हुई थी। वह 27 सितंबर विजयदशमीं का दिन था। संघ की पहली शाखा में केवल छै स्वयंसेवक थे। अब यह विश्व का सबसे विशाल सामाजिक संगठन है। जिसकी केवल भारत में ही 83129 दैनिक शाखाएँ संचालित हो रहीं हैं। तकनीकि रूप से भले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सःगठन कहा जाय लेकिन यह करोड़ों कार्यकर्ताओं का मानों एक परिवार है। संघ की स्थापना से लेकर आजतक इस शताब्दी यात्रा में सतत हमले हुये। सरकारों ने प्रतिबंध लगाये, संघ कार्यकर्ताओं और प्रचारकों पर हमले हुये, हत्याएँ हुई। शाब्दिक हमले तो कभी बंद ही नहीं हुये। यदि अंग्रेजीकाल की बात छोड़ दी जाय तो स्वतंत्रता के बाद भी तीन बार प्रतिबंध लगे। गाँधी जी हत्या में झूठा फँसाया गया। लेकिन संघ की ध्येयनिष्ट यात्रा में कोई अंतर नहीं आया। वह हर संकट के बाद मानों और संकल्पनिष्ट होकर सामने आया। इतने हमलों के बाद भी संघ ने कभी किसी की आलोचना नहीं की, किसी को बुरा नहीं कहा। भारत राष्ट्र के परम वैभव के प्रति संघ की ध्येयनिष्टा अखंड रही। राष्ट्र, समाज और संस्कृति के प्रति यही संकल्पशीलता संघ के शताब्दी वर्ष आयोजन में दिखी। संघ ने अपने शताब्दी समागम को किसी उत्सव के रूप में मनाया अपितु अपनी ध्येय को गति देने का निमित्त बनाया। शताब्दी यात्रा पूर्ण करने के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने तीन अभियान चलाये। पहला गणवेश धारी स्वयंसेवकों का पथ संचलन दूसरा हर घर संपर्क अभियान और तीसरा “जात पात की करो विदाई, हम सब हिन्दु भाई भाई” उद्घोष के साथ सकल हिन्दु सम्मेलनों का आयोजन। स्वयसेवकों द्वारा गणवेश में बस्ती स्तर पर 2 अक्टोबर से 12 अक्टोबर 2025 की बीच, विशाल पथ संचलनों का आयोजन किया गया था। देशभर की प्रत्येक बस्ती में आयोजित ऐसे पथ संचलन में सरसंघचालक से लेकर संघ का प्रत्येक सामान्य कार्यकर्ता भी गणवेश में सम्मिलित हुआ। दूसरे कार्यक्रम के रूप में संघ के स्वयसेवकों ने अपनी बस्ती एवं मोहल्लों में 15 नवम्बर से 30 नवम्बर 2025 की बीच प्रत्येक घर पर दस्तक दी। इस गृह सम्पर्क अभियान में “संगठित हिन्दु समर्थ भारत” का संदेश दिया गया। इसी श्रृंखला की तीसरी कड़ी में पूरे देश में हिन्दू सम्मेलन के आयोजन आरंभ हुआ। भारत के एक छोटे ग्राम से लेकर महानगरों तक की प्रत्येक बस्ती में ऐसे एक लाख से अधिक हिंदू सम्मेलन आयोजित करने की योजना बनी। इनकी शुरुआत 20 दिसम्बर 2025 से हुई थी और इन्हें 20 जनवरी 2026 तक पूरा किया जाना है। लेकिन कहीं कहीं यह तिथि आगे भी बढ़ाई गई है और संभावना है कि 25 जनवरी तक लक्ष्य पूरा हो जायेगा। हिंदू सम्मेलन आयोजित करने की भावना तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की है, पर इनका आयोजक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वयं नहीं है। इनका आयोजन स्थानीय स्तर पर सकल हिंदू समाज द्वारा किया जा रहा है। अब तक जैसे समाचार पूरे देश से आ रहे हैं उनके अनुसार प्रत्येक आयोजन में हिंदू समाज की उत्साह पूर्वक सहभागिता देखने को मिली। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों और सेवा बस्तियों में अपेक्षाकृत अधिक उत्साह देखा गया। जितना उत्साह सम्मेलन में सम्मिलित होने का था। उससे अधिक उत्साह सम्मेलन के बाद सामाजिक समरसता के वातावरण में देखा गया। सम्मेलन में आये वक्ताओं का संदेश बहुत स्पष्ट और सामयिक था। प्रत्येक हिन्दु सम्मेलन में स्थानीय वक्ताओं के अतिरिक्त तीन प्रकार के मुख्य वक्ता रहे। इनमें एक संत समाज से, दूसरे सामाजिक एवं साँस्कृतिक संगठनों से संबंधित मातृशक्ति और तीसरे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंधित वक्ता। संतों की ओर से शास्त्रों और पुराणकथाओं के आधार पर संपूर्ण समाज को अपनी परंपराओं से जुड़ने और एक जुट रहने का आव्हान किया गया। यह स्पष्ट किया गया कि सभी सनातनी ऋषियों की संतान हैं, जाति भेद सल्तनतकाल और अंग्रेजीकाल में फैलाये गये। अब हमें उस कुचक्र से सावधान रहना है। संतों ने यह आव्हान भी किया कि सप्ताह कम से कम एक दिन परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठें, घर का बना भोजन साथ खाएं और अपने ईष्ट की पूजा प्रार्थना करें, इससे न केवल पारिवारिक और सामाजिक रिश्ते मजबूत होंगे अपितु यह परिवार की प्रगति और अपनी परंपराओं को समझने का आधार बनेगा । जबकि सामाजिक अथवा साँस्कृतिक संगठनों से संबंधित मातृ शक्ति के वक्ता ने कुटुम्ब समन्वय, स्वत्व वोध और स्वदेशी का महत्व, जीवन केलिये पर्यावरण की महत्ता, नागरिक कर्तव्यों का पालन एवं संगठित सामाज की महत्ता समझाई। स्वाभाविक है कि समाज में अधिकार के साथ कर्त्तव्य पालन का भाव आया, पर्यावरण के प्रति जागरुकता बढ़ी, स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग और स्वसंस्कृति के अनुरुप जीवन शैली बढ़ी तो समाज और राष्ट्र की अनेक समस्याओं का समाधान स्वमेव हो जायेगा। वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंधित वक्ता ने संघ की ध्येयनिष्ट शताब्दी यात्रा की जानकारी दी और देश एवं समाज के सामने बढ़ती चुनौतियों की ओर समाज का ध्यान आकर्षित किया। इन वक्ताओं ने इतिहास और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घटने वाली घटनाओं का उदाहरण देकर समझाया कि वही समाज इतिहास में अमिट रहता है जो सजग और संगठित रहता है। लगभग सभी वक्ताओं ने समस्त हिंदू समाज में आपसी समझ बढ़ाने, एक दूसरे का सहयोगी बनकर देश का इतिहास एवं पूर्वजों की परंपरा को जानने पर जोर दिया गया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहल पर ये हिन्दु सम्मेलन ऐसे समय आयोजित किये जा रहे हैं जब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ शक्तियाँ सनातन हिन्दू समाज को विभाजित करने का कुचक्र कर रहीं हैं। ये शक्तियाँ भारत राष्ट्र के साँस्कृतिक स्वरूप का रूपान्तरण करने के कुचक्र मे एकजुट होकर कार्य कर रहीं हैं। उनका प्रयास सनातन हिन्दु समाज को भ्रमित करना, उसे अपनी जड़ों से काटना और जातीय विभेद पैदा करना है ताकि भारत राष्ट्र की प्रगति को अवरुद्ध किया जा सके और सनातन हिन्दु समाज का धार्मिक और सांस्कृतिक रूपान्तरण कराया जा सके। इसके लिये प्रतिदिन नये नये षड्यंत्र किये जा रहे हैं। जन्म और जाति आधारित विभेद उत्पन्न करके आंतरिक अशान्ति पैदा करने का कुचक्र किया जा रहा है। जबकि वास्तविकता यह है कि भारत में सामाजिक व्यवस्था जन्म अथवा जाति आधारित नहीं थी। भारत की सामाजिक व्यवस्था गुण और कर्म आधारित “वर्ण व्यवस्था” रही है। इसे समझने केलिये हर कालखंड में पर्याप्त उदाहरण हैं। यदि पुराण काल में देखे तो कुबेर और रावण एक ही पिता की संतान हैं। लेकिन समाज में दोनों का स्थान अलग अलग है। कुबेर की गणना देवताओं में होती है, दीपावली पर पूजन किया जाता है जबकि रावण की गणना राक्षसों में होती है, दशहरे के दिन पुतला जलाया जाता है। वहीं मातंग ऋषि ने अपने आश्रम की उत्तराधिकारी माता शबरी को बनाया था। माता शबरी का संबंध शबर वनवासी समाज से है। महर्षि व्यास की माता मछली पालक समाज से थीं और महर्षि बाल्मीकि का जन्म व्याध समाज में हुआ था। पुराण काल से परे बाद के इतिहास को देखे तो मगध के दोनों नंदवंश और मौर्य वंश सेवा वर्ग से संबंधित थे। जिन्हें आज की शब्दावली में अनुसूचित जाति कहते हैं। यदि भारत में जन्म या जाति आधारित समाज व्यवस्था होती तो ये दोनों शासक कैसे बनते। मध्यकाल में देखे तो रानी दुर्गावती कालिंजर के चंदेल राजपूत राजा की पुत्री थीं। उनका विवाह गौंडवांना में हुआ था। संत रविदास जी का जन्म चर्म शिल्पकार समाज में हुआ था। वे रामानंदाचार्य के शिष्य थे और मीराबाई एवं झाला रानी ने संत रविदासजी को अपना गुरु बनाया था। यदि भारतीय समाज जीवन में जाति का निर्धारण जन्म आधारित होता तो न मीरा बाई संत रविदासजी को अपना गुरु नहीं बनातीं और न रानी दुर्गावती का विवाह भी गौंडवांना में होता। भारतीय इतिहास में केवल यही उदाहरण नहीं हैं। ऐसे असंख्य विवरण हैं। लेकिन योजना पूर्वक सनातन हिन्दु समाज को बाँटने का प्रयास हो रहा है। विभाजन की यह लकीर गहरी करने के रोज नये बहाने ढूँढे जा रहे हैं। कभी जन गणना के नाम पर तो कभी किसी के बहाने। और तो और व्यक्तिगत अपराध की घटनाओं में पीड़ित और आरोपी दोनों को जाति से जोड़कर प्रचारित किया जाता है। जबकि किसी अन्य समाज या वर्ग में जाति आधारित विभाजन की बात कतई नहीं होती। केवल हिन्दू समाज में जातीय विभाजन की चर्चा जोर शोर से की जाती है। सनातन हिन्दू समाज को जागरुक होकर इस षड्यंत्र को समझना होगा। सकल हिन्दू समाज द्वारा आयोजित इन सम्मेलनों में जागरुकता का यही संदेश दिया गया। यह बात बहुत स्पष्ट रूप से समझाई गई कि समाज और देश दोनों की प्रगति केलिये सबको एकजुट होना आवश्यक है।
समाज को एकजुटता के इस संदेश के साथ इन सम्मेलनों से भारतीय समाज जीवन में यह संदेश बहुत स्पष्ट रूप से गया कि किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसके जन्म, जाति, भाषा, स्थान, संपत्ति या सामाजिक स्थिति के आधार पर नहीं होता। उसका महत्व उसकी कर्मशीलता पर निर्भर करता है। पूरा राष्ट्र उत्थान के लिये सामाजिक समरसता की भावना ही सबसे बड़ी शक्ति है। सम्मेलनों के बाद विभिन्न बस्तियों में स्थानीर स्तर आपसी विवाद को परस्पर बाथचीत से विराम देने के समाचार भी आने लगे। जिससे भारत के भविष्य निर्माण के लिये एक अच्छा वातावरण बनता दिखाई दे रहा है।
