शंख और तुलसी से ऐसे करें भगवान कृष्ण की पूजा, शास्त्रों में बताया है महत्व
भगवान कृष्ण विष्णु जी के अवतार है। इनकी पूजा में शंख और तुलसी दल, तुलसी की मंजरी मुख्य होते हैं। ऐसा कहाजाता है कि आप हजार मिष्ठान बना लो, लेकिन अगर इनमें तुलसी दल नहीं हैं, तो इनका भगवान के लिए कोई अर्थ नहीं है। इसलिए जन्माष्टमी पर श्रीहरि के भोग में तुलसी दल जरूर होने चाहिए। इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि तुलसी के पत्ते कटे-फटे ना हों, भगवान को साबूत तुलसी दल अर्पित करना चाहिए।
भगवान कहते हैं कि जैसे दोनों पक्षों की एकादशी मुझे प्रिय है, वैसे ही गौर और कृष्ण तुलसी भी मुझे प्रिय है। इसके अलावा भगवान ने अपनी पूजा में शंख का भी महत्व बताया है। किसी तरह इन दोनों की पूजा से भगवान श्रीहरि प्रसन्न होते हैं। आइए जानें शास्त्रों में इनके विषय में क्या बताया गया है।
शास्त्रों में कहा गया है कि जो मनुष्य तुलसी की मंजरियों से भगवान की पूजा करता है, वह मोक्ष का भागी होता है। जो तुलसी का पौधा लगाकर उसके पत्तों से पूजा करता है, वह बैकुंठ धाम को आता है। बासी फूल ओर बासी जल पूजाके लिये वर्जित हैं। परंतु तुलसीदल ओर गंगाजल बासी होनेपर भी वर्जित नहीं हे । जिसके पत्ते कटे न हों ओर जो मंजरी के साथ हो, ऐसी तुलसी भगवान विष्णु को लक्ष्मी के समान प्रिय है। ऐसा कहा जाता है कि उसके अत्यन्त दुर्लभ मनोरथ, बल, स्त्री, पुत्र ओर भक्ति जैसे सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं।
शंख भी प्रिय है भगवान विष्णु को
शंख के जल से भगवान को स्नान कराने से श्रीहरि प्रसन्न होते हैं। अगर पंचामृत की सभी वस्तुओं को शंख में भरकर स्नान कराया जाए और उनके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। इसके अलावा यह भी कहा गया है कि जो शंख में जल भर ओम नमो नाराणाय का उच्चारण करते हुए मुझे स्नान कराता है, उसके पुण्य कभी खत्म नहीं होते हैं। इसलिए जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण को पंचामृत से स्नान कराने से पहले आप भी इसे शंख में भर लें और फिर श्रीहरि को स्नान कराएं।