सिर्फ रायसेन मामले में मुस्‍ल‍िम समाज के बाहर आने से काम नहीं चलेगा, लव जिहाद पर भी साहस दिखाएं ! 

सिर्फ रायसेन मामले में मुस्‍ल‍िम समाज के बाहर आने से काम नहीं चलेगा, लव जिहाद पर भी साहस दिखाएं !

 

मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के गौहरगंज में छह वर्ष की मासूम बच्ची से दुष्कर्म की घटना ने पूरे प्रदेश को हिला दिया है। आरोपी सलमान की गिरफ्तारी के बाद जिस प्रकार समाज में आक्रोश उभरा, वह सामान्य घटना नहीं है। इससे भी अधिक महत्‍वपूर्ण बात यह रही कि इस बार मुस्लिम समाज भारी संख्या में सड़क पर उतरा और अपराधी के लिए फाँसी की मांग करते हुए यह स्पष्ट संदेश दिया कि किसी भी दरिंदे को मजहब की ढाल नहीं दी जाएगी। भोपाल के माता मंदिर चौराहे पर हुए इस बड़े प्रदर्शन में युवाओं ने सलमान के पुतले को फाँसी पर लटकाकर विरोध जताया और “मासूम बच्ची को न्याय दो, सलमान को फाँसी दो” जैसे नारे बुलंद किए।

 

कहा गया, इस्लाम किसी भी प्रकार की दरिंदगी का समर्थन नहीं करता और शरीयत में ऐसे अपराधों के लिए कठोर दंड का उल्लेख है। आरोपी सलमान का कोई भी मुस्लिम वकील केस नहीं लड़ेगा और न ही कोई संस्था उसकी मदद करेगी। कहना होगा कि यह घटना केवल एक अपराध के खिलाफ विरोध का उदाहरण नहीं, आज एक व्यापक सामाजिक सवाल से भी जुड़ी हुई दिखाई देती है और वह है लव-जिहाद जैसा अहम विषय।

 

वास्‍तव में पहचान छिपाकर बनाए गए संबंध, छलपूर्वक विवाह, तथा जबरन या भ्रम पैदा कर धर्मांतरण जैसे मामलों को लेकर उठता विवाद मध्‍य प्रदेश में थम नहीं रहा है, हर बार सामने आते मामलों में इसमें गैर मुसलमान (हिन्‍दू, जैन, बौद्ध, सिख एवं अन्‍य) को इस्‍लामिस्‍टों द्वारा घेरा जाता है। प्रेम के जाल में छल से फंसाया जा रहा है। लगातार मध्य प्रदेश में पिछले कई वर्षों से ऐसे मामलों को लेकर चर्चा हो रही है। इस संवेदनशील पृष्ठभूमि में यदि समाज का कोई हिस्सा अपराधी के खिलाफ अपने ही समुदाय से उठकर खड़ा होता है, तो यह उक्‍त घटना का विरोध नहीं कहलाता, यह तो एक सामाजिक बदलाव का संकेत होता। पर दुख है कि इस मामले में अब तक इस्‍लामिक संगठन मौन साधे हुए हैं।

 

मध्य प्रदेश में उपलब्ध कानूनी आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2020 से जुलाई 2025 तक राज्य में कुल 283 “लव जिहाद” के मामले दर्ज हुए, जिन्हें सरकार ने “धर्मांतरण, छलपूर्वक विवाह, पहचान छिपाने” जैसे अपराधों की श्रेणी में दर्ज किया। इन मामलों में चिंताजनक तथ्य यह है कि 71 पीड़िताएँ नाबालिग थीं। जिलावार देखें तो इंदौर में लगभग 74 मामले और भोपाल में 33 मामले दर्ज हुए, जो कुल प्रकरणों का लगभग 40 प्रतिशत हैं। उज्जैन, खंडवा, धार, सागर और जबलपुर जैसे जिलों में भी ऐसे प्रकरण समय-समय पर दर्ज होते रहे। इसके बाद जुलाई से अब नवम्‍बर अंत तक कई नए लव जिहाद के मामले सामने आ चुके हैं, उनकी भी संख्‍या लगभग 100 से अधिक है।

वास्‍तव में यह आंकड़े दिखाते हैं कि मुद्दा केवल चर्चाओं या आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है, पुलिस रजिस्टर तक पहुँचा हुआ ये गैर मुसलमानों की बेटियों को लेकर वास्तविक सामाजिक संकट है। लेकिन आंकड़े एक और बड़ी सच्चाई भी सामने रखते हैं। दर्ज हुए 283 मामलों में से लगभग 197 अभी भी अदालतों में लंबित हैं। शेष मामलों में या तो आरोप सिद्ध नहीं हो पाए या जांच के दौरान खामियाँ मिलीं। उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार लगभग 50 मामलों में आरोपी बाइज्जत बरी हुए, जबकि केवल सात मामलों में दोष सिद्ध हुआ और अदालत ने सजा सुनाई।

 

इस बीच न्‍यायालय को भी और समाज में भी ये ध्‍यान में आया कि अधिकांश मामलों में अपराधी होने के बाद भी सजा इसलिए नहीं दी जा सकी, क्‍योंकि बल पूर्वक, लालच देकर या अन्‍य दबाव बनाकर पीड़‍ित पक्ष को अदालत के सामने बयानों में बदलाव कर दिया गया। कुछ में तो न्‍यायालय ने तथ्‍यों के आधार पर सजा भी सुनाई है। वस्‍तुत: यह स्थिति बताती है कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, जांच की गुणवत्‍ता, सबूतों की मजबूती और पीड़िता की सुरक्षा जैसे पहलू अधिक महत्वपूर्ण हैं। जिनके अभाव में कई बार पीड़िताएँ सामाजिक दबाव में बयान बदल देती हैं या सबूत समय पर इकट्ठे नहीं हो पाते।

 

सरकार ने माना कि इस चुनौती से निपटने के लिए मई 2025 में एक विशेष जांच दल (SIT) भी गठित किया गया है, ताकि पहचान छिपाने या छलपूर्वक विवाह तथा धर्मांतरण के मामलों की जांच अधिक प्रभावी ढंग से हो सके। ऐसे परिदृश्य में गौहरगंज की घटना और उस पर मुस्लिम समाज की प्रतिक्रिया एक अलग और सकारात्मक संकेत देती है। किंतु यह भी सोचने पर विवश करती है कि क्‍या ये मुसलिम समाज का कोई बहुसंख्‍यक हिन्‍दू समाज के आक्रोश को शांत करने का पैतरा तो नहीं, क्‍योंकि यदि स्‍त्री अपराध इस्‍लाम की नजर में उनके शरिया कानून में अपराध है तो लव जिहाद जैसा अपराध स्‍त्री के साथ किया गया धोखा, अत्‍याचार फिर अपराध की श्रेणी में क्‍यों नहीं आता और वे उसका इसी तरह से अब तक सड़क पर आकर विरोध करने की हिम्‍मत क्‍यों नहीं जुटा पाए हैं?

 

लव-जिहाद के नाम पर दर्ज मामलों में अक्सर देखा जाता है कि समुदाय विशेष (मुसलमान) इस्‍लाम को माननेवाले अधिकांश लोग अपने आरोपितों का बचाव करते हैं या मुद्दे को साम्प्रदायिक बहस में बदल देते हैं। लेकिन इस गोहरगंज मामले में जिस तरह मुस्लिम समाज ने आरोपी से खुद को अलग रखा, उसे दरिंदा बताया, इस्लाम की शिक्षाओं के खिलाफ बताया और संविधान के तहत फाँसी की मांग की, वह यह स्पष्ट करता है कि अपराध की पहचान अपराधी के मजहब से नहीं, उसके कृत्य से होनी चाहिए। अत: यह रुख उन तमाम मामलों पर भी लागू होना चाहिए जहाँ युवतियों ने आरोप लगाया कि उन्हें प्रेम, विवाह या भविष्य का सपना दिखाकर फँसाया गया, धर्म छिपाकर संबंध बनाए गए या वीडियो बनाकर ब्लैकमेल किया गया। कहना होगा कि यदि ऐसी परिस्थितियों में भी समाज स्वयं आगे आए और अपराधी को मजहब के नाम पर बचाने के बजाय कानून के हवाले करने की मांग करे, तो ऐसे अपराधों की रोकथाम कहीं अधिक प्रभावी होगी।

 

समग्र रूप से देखें तो इस घटना ने हमें दो बातें सिखाई हैं; एक- मध्य प्रदेश में छलपूर्वक संबंधों, जबरन या झूठे बहाने से बनाए गए रिश्तों और धर्मांतरण जैसे मामलों को लेकर कानून भले सख्त हो चुका है, किंतु न्याय की प्रक्रिया को और अधिक विश्वसनीय बनाने की आवश्यकता है; और दो- यह कि यदि समाज स्वयं अपराधी का मजहब देखकर नहीं, उसके अपराध को देखकर अपना रुख तय करे, तो न केवल अपराध कम होंगे, बल्कि समाजों के बीच अविश्वास भी घटेगा।