आज का सबसे बड़ा संकट युद्ध नहीं है, हर छोटी बात पर हमारा तुरंत भड़क जाना है।
कोई कुछ कह दे — हम आहत।
कोई नजरअंदाज़ कर दे — हम क्रोधित।
कोई हमारी राय न माने — हम भीतर-ही-भीतर जलने लगते हैं।
दिन भर में कितनी बार हम उबलते हैं। पर शाम तक याद भी नहीं रहता कि क्यों उबले थे। फिर भी उस क्षण में हम शब्द ऐसे बोल देते हैं, जो रिश्तों पर स्थायी निशान छोड़ देते हैं।
समस्या घटना नहीं है, समस्या हमारी ‘तुरंत प्रतिक्रिया’ है। हम प्रतिक्रिया देते हैं, क्योंकि हम अपने अहं को बचाना चाहते हैं।
हम उत्तर नहीं देते, क्योंकि उत्तर देने के लिए ठहराव चाहिए और ठहराव के लिए आत्मबल।
जब श्रीराम को वनवास मिला, पूरी अयोध्या स्तब्ध थी। कोई भी सामान्य व्यक्ति होता तो क्रोध करता, प्रश्न करता, विद्रोह करता।पर राम ने क्या किया? वे उबले नहीं, वे ठहरे। उस ठहराव में ही उनका उत्तर छिपा था। उन्होंने परिस्थिति को नहीं, अपनी प्रतिक्रिया को नियंत्रित किया।
राम का महान होना उनके तीर-धनुष में नहीं, उनके मन के संतुलन में था।
हम क्यों उबलते हैं? क्योंकि हमें लगता है —“मुझे तुरंत सही साबित करना है।” “मुझे अभी जवाब देना है।” “मैं चुप रहा तो मैं हार गया।”
पर सच्चाई यह है — तुरंत बोला गया शब्द अक्सर हमारी कमजोरी होता है और ठहरकर बोला गया वाक्य हमारी ताकत।
रावण के पास ज्ञान था, शक्ति थी, वैभव था। पर संयम नहीं था। राम के पास संयम था और वही उन्हें “मर्यादा” देता है।
इसीलिए “प्रतिक्रिया नहीं, उत्तर दीजिए”
जब भी मन उबले —10 सेकंड रुकिए। एक गहरी साँस लीजिए। खुद से पूछिए- “मैं इस क्षण का दास हूँ या स्वामी?”
फिर बोलिए—कम शब्द, स्पष्ट शब्द, शांत शब्द। क्योंकि परिपक्वता का अर्थ यह नहीं कि आप कुछ महसूस नहीं करते, परिपक्वता का अर्थ है —आप महसूस करते हैं, पर बहते नहीं हैं।
हर युद्ध बाहर नहीं लड़ा जाता,सबसे बड़ा युद्ध भीतर लड़ा जाता है।
जो अपने मन की आग को धैर्य की रोशनी में बदल दे, वही सच्चा विजेता है।
हर बार उबलना आसान है, हर बार ठहरना साधना है। और यही साधना एक सामान्य मनुष्य को “राम के मार्ग” पर ले जाती है।
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