दुर्गासप्तशती ( आध्यात्मिक विवेचना ) भाग – 02

दुर्गासप्तशती ( आध्यात्मिक विवेचना ) भाग – 02

 

( धूम्रलोचन प्रसंग )

भाग – 02

 

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यह क्रम पितृसत्तात्मक शक्ति-संरचनाओं से भयावह सटीकता से मेल खाता है। शुम्भ पुरुष-प्रधान संप्रभुता का प्रतीक है, जो स्त्री-शक्ति को अपनी क्षेत्राधिकार से बाहर कल्पना ही नहीं कर सकता। उसकी इच्छा केवल कामुक नहीं, ontological है। उसे प्रभु न मानने वाली किसी भी शक्ति का अस्तित्व उसे असह्य है। प्रलोभन विफल होने पर बल का सहारा। एकाकी नारी पर, जो केवल अपनी स्वायत्तता का दावा कर रही है, सैन्य-बल का प्रयोग hierarchical power systems में संरचनात्मक misogyny का प्रतिपादक है।

 

धूम्रलोचन इस आक्रामक आदेश का क्रियान्वयक है। वह स्वायत्त नहीं है, प्रवर्तक है । पितृसत्तात्मक प्राधिकार से उधार ली गई हिंसा का संचालक। यह उसे महिषासुर जैसे महासुरों से पृथक करता है, जो स्वकीय राक्षसी महत्वाकांक्षा से कार्य करता है।

 

धूम्रलोचन का अधर्म bureaucratic complicity का अधर्म है — अनैतिक आज्ञा का निष्पादक, बिना नैतिक चिंतन के। इस प्रकाश में उसका त्वरित विनाश इस सहभागिता की प्रकृति पर टीप है। टीप यह कि अन्यायपूर्ण व्यवस्थाओं की हिंसा को कार्यरूप देने वाले भले ही व्यक्तिगत द्वेष रहित हों तब भी उतने ही उत्तरदायी हैं तथा उसके परिणामों के उतने ही पात्र। नौकरशाह का पद जनसेवा और धर्म के प्रति समर्पित होता है, न कि किसी व्यक्तिगत मालिक के प्रति। अनैतिक आदेशों का धूम्रलोचन द्वारा अंधा पालन जनता के प्रति विश्वासघात है और पद को व्यक्तिगत या पक्षपातपूर्ण स्वार्थ का साधन बना देता है। अंधी आज्ञाकारिता करके यह आसुरी नौकरशाह अपनी विवेक और नैतिक निर्णय शक्ति को त्याग देता है। वह एक स्वतंत्र चिंतनशील मानव से मात्र एक अंधा औजार बन जाता है, जिसकी नैतिक गरिमा नष्ट हो चुकी है। वह अन्याय का सक्रिय सहयोगी बन जाता है। शुंभ की सत्ता के सामने सत्य बोलने के बजाय अंधा अनुसरण करके वह अपनी नैतिक कायरता ही बताता है। गलत होने पर भी चुप रहकर अपनी नौकरी और आराम को सिद्धांतों से ऊपर रखता तो वह भी गलत था पर यहां तो वह शुंभ का सक्रिय अनुपालन कर रहा है। सबसे पहले कर रहा है। इतिहास गवाह है कि कई बड़े अन्याय, मानवाधिकार उल्लंघन और अत्याचार “मैं तो बस आदेश मान रहा था” कहकर किए गए। नैतिक और कानूनी रूप से यह बचाव अस्वीकार्य है।

 

यह प्रसंग पौराणिक pattern में भागी है: असुर-समुदाय को सैन्य पदानुक्रम, युद्ध-परिषद् तथा command chain युक्त राजनैतिक इकाई के रूप में चित्रित करना मानवीय (विशेषतः राजकीय) संगठन का प्रतिबिंब है। असुर chaos नहीं, अपितु cosmic political order का काला दर्पण हैं: राज्य के समान संरचित, शक्ति-प्रभुत्व के समान लक्ष्यों को समान साधनों से, केवल दिव्य व्यवस्था के विरुद्ध। धूम्रलोचन इस अर्थ में demonic feudal general है: सक्षम, आज्ञाकारी, तथा संस्था से अमिश्रित।

 

इसमें सोचने, योजना बनाने या अस्त्र की आवश्यकता नहीं; उसका सबसे सहज, biological कृत्य — श्वास-त्याग — सेनापति एवं सेना का संहार पर्याप्त है।

 

यह असाधारण theological कथन है। धूम्रलोचन का विनाश प्रयासपूर्ण हिंसा नहीं; अज्ञान एवं शुद्ध दिव्य जागृति की निकटता का स्वाभाविक परिणाम है।

 

अद्वैत वेदांत एवं शाक्त दर्शन दोनों में अविद्या सच्ची जागृति के समक्ष पल भर टिक नहीं सकती। चेतना के आक्रमण से नहीं, अपितु परिभाषानुसार तम की प्रवृत्ति होने से। प्रकाश आते ही अंधकार लड़ता-हारता नहीं; विलीन हो जाता है। देवी का ‘हूं’ पारंपरिक अस्त्र नहीं; अवास्तविकता के समक्ष वास्तविकता का स्वाभाविक उद्घोष है।

 

राक्षसी शक्ति का अंतिम ontological स्थान क्या है? देवी माहात्म्य स्वयं घोषित करता है कि देवी अपनी शक्ति से समस्त ब्रह्मांड को धारण करती है। राक्षस भी उसके अनुमोदन एवं पोषण से ही विद्यमान हैं। ‘हूं’ द्वारा धूम्रलोचन का संहार बाह्य देवी द्वारा बाह्य शत्रु-हत्या नहीं है। धूम्रलोचन पर्याप्त समय तक विद्यमान रहता है — हिंसा का नौकरशाह है वह।

 

सांख्य के हिसाब से धूम्रलोचन प्रक्रृति के तामसिक ध्रुव का चरम है। भारी, अंधकारमय, सात्त्विक (स्पष्टता एवं सद्गुण) प्रभाव के प्रति प्रतिरोधी। ध्वनि द्वारा उसका संहार होता है जो सांख्य में आकाश (ether/space) तत्त्व में निनादित है। पंचमहाभूतों में यह सबसे सात्त्विक है। सूक्ष्मतम तत्व की स्थूलतम पर विजय का प्रतीक है।चेतना-परिपूर्ण vibration का पदार्थ-प्रधान प्रतिरोध पर प्रतिपादन है।

 

तांत्रिक दार्शनिक परंपरा एक अन्य स्तर जोड़ती है: ‘हूं’ बीज में कुंडलिनी के रूप में शक्ति का संक्षिप्त रूप समाहित है — यौगिक physiology में मेरुदंड के मूल में कुंडित सर्प-शक्ति, जो चक्रों द्वारा आरोहण कर शीर्ष पर शिव से संनादति। ‘हूं’ इस ऊर्ध्वगामी अग्नि-ऊर्जा से संबद्ध है। धूम्रलोचन देवी के कुंडलिनी बल के संपर्क में टिकने के योग्य नहीं। वह नष्ट नहीं होता। वह उस ontological frequency द्वारा, जिसे वह धारण करने के अक्षम है, वाष्पित हो जाता है।

 

धूम्रलोचन प्रसंग की सबसे आकर्षक साहित्यिक-दार्शनिक विशेषताओं में से एक इसकी चरम संक्षिप्तता है। एक ऐसे ग्रंथ में, जो ब्रह्मांडीय युद्धों के विस्तृत वर्णनों के लिए प्रसिद्ध है — जिसमें सौ भुजावाली देवियाँ आकाशीय अस्त्रों का प्रक्षेपण करती हैं, राक्षस अपने रक्तबिंदुओं से पुनर्जनन करते हैं, और पृथ्वी दैवीय संग्राम की शक्ति से काँपती है — धूम्रलोचन का निपटारा मात्र कुछ श्लोकों में हो जाता है। वह आता है, वह धमकाता है, वह नष्ट हो जाता है। कोई नाटकीय युद्ध नहीं, कोई विस्तृत संवाद नहीं, कोई राक्षसी अहंकार को लंबी कथात्मक सजा का क्षण नहीं।

 

यह कथात्मक संक्षिप्तता स्वयं एक धार्मिक कथन है। यह महत्व के एक पदानुक्रम को संकेतित करती है। जितना विस्तृत युद्ध, उतना ही योग्य शत्रु, उतनी ही जटिल समस्या जो वह प्रतिनिधित्व करता है। महिषासुर को संपूर्ण देवताओं की सृजनात्मक और संहारात्मक शक्ति तथा विस्तृत ब्रह्मांडीय युद्ध की आवश्यकता इसलिए पड़ती है क्योंकि वह अहंकार-प्रतिरोध के सबसे गहराई से जड़े रूपों का प्रतिनिधित्व करता है। धूम्रलोचन को मात्र एक अक्षर की आवश्यकता इसलिए पड़ती है क्योंकि, उसके द्वारा नियंत्रित सामाजिक और संस्थागत शक्ति के बावजूद, वह सिद्धांत जो वह मूर्त करता है — दूसरों की अवैध इच्छा की सेवा में बलपूर्वक एजेंसी — दार्शनिक रूप से पातल है, आसानी से भेदा जा सकता है, आसानी से विलीन हो जाता है।

 

यहाँ सच्ची शक्ति बनाम प्रतीतशील शक्ति की प्रकृति के बारे में एक शिक्षा है। धूम्रलोचन की शक्ति पूर्णतः व्युत्पन्न है: शुम्भ से उधार ली गई, सैन्य पदानुक्रम के माध्यम से व्यक्त, शारीरिक बलपूर्वक कार्यान्वित। उसके पास कोई आंतरिक संप्रभुता नहीं; वह केंद्र से खोखला है। जब देवी हूं का उच्चारण करती हैं, तो ध्वनि के लिए संघर्ष करने को कुछ शेष नहीं रहता — उसकी शक्ति की प्रतीतशील solidity भाप बनकर दफा हो जाती है क्योंकि उसमें कभी वास्तविक पदार्थ ही नहीं था।

 

इस प्रकार, कथात्मक संक्षिप्तता ही कथा का सबसे गहन पाठ है: वास्तविक आध्यात्मिक शक्ति उसके प्रयोग में व्यय की गई ऊर्जा के अनुपात में नहीं, बल्कि उसके उद्गम के स्थान की गहराई के अनुपात में होती है ll