
( धूम्रलोचन प्रसंग )
*भगा – 01*
धूम्रलोचन – जिसकी आँखों में धुँआ हो या जो स्वयं आँखों में धुँए की तरह हो। लिथुआनियाई भाषा में Akis apdumti शब्द चलता है जिसका शाब्दिक अर्थ है आँखों में धुँआ करना मतलब धोखा देना। यानी वही अर्थ जो हमारे यहाँ आँखों में धूल झोंकने से है।इतालवी में Gettare fumo negli occh नामक अभिव्यक्ति भी कुछ ऐसी है – आँखों में धुँआ झोंकना या सिर्फ़ fumo negli occhi यानी आँखों में धुँआ। मतलब वही छल करना, सत्य को छुपाना। एक अन्य इतालवी अभिव्यक्ति है: essere come il fumo negli occhi यानी कोई बदमजा चीज़, घृणित या परेशान करने वाली। बाइबिल की कहावत 10:26 में भी smoke in the eyes की बात किसी बहुत परेशान करने वाले, संतापजनक, क्षोभ पैदा करने वाले के अर्थ में कही गई है। दुनिया की अधिकतर भाषाओं में उसे discomfort या annoyance से समीकृत किया गया है। उससे संभ्रम का भी कई जगह अर्थ लिया गया है।
धूम्रलोचन कथा संस्कृत पुराण साहित्य की सबसे संक्षिप्त किंतु आध्यात्मिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। महासुर शुम्भ द्वारा देवी को पकड़ लाने हेतु भेजे गए राक्षस सेनापति धूम्रलोचन का देवी के एकमात्र ‘हूं’ बीज मंत्र के उद्गार मात्र से तत्काल विनाश हो जाता है। इस विशाल युद्ध-कथा में यह प्रसंग केवल एक संक्रमणकालीन झड़प नहीं, बल्कि एक संक्षिप्त दार्शनिक टीप है: दिव्य वाक् की प्रकृति, अधर्म की ontolgy, पितृसत्तात्मक आक्रामकता की समाजशास्त्रीयता, अहंकार-विनाश का मनोविज्ञान, तथा ध्वनि की आदि-सृष्टिकर्ता एवं संहारक शक्ति की आध्यात्मिकता पर।
धूम्रलोचन का नाम ही उसकी ontological स्थिति को उजागर करता है — ‘धूम्र’ (धुएँ जैसा) तथा ‘लोचन’ (नेत्र) से युक्त, अर्थात् ‘धुएँ के नेत्रों वाला’। यह राक्षस अधर्म की दृश्यता-रहित, मायावी प्रकृति का प्रतीक है।
पौराणिक संदर्भों में धुआँ अज्ञान (अविद्या) का रूपक है, जो वास्तविकता को अस्पष्ट कर देता है। शुम्भ-निशुम्भ जैसे असुरों की पितृसत्तात्मक सेना का यह सेनापति पितृसत्ता की आक्रामक दृष्टि का प्रतिनिधित्व करता है — जो स्त्री-शक्ति को अधीन करने को उद्यत है। वह अहंकार (ego) का अवतार है, जो अपनी मायावी शक्ति के अभिमान में देवी को चुनौती देता है।
देवी माहात्म्य (अध्याय 3, श्लोक 27-32) में उसका वर्णन उसके विशालकाय रूप, सिंह-यान तथा भयंकर गर्जन से होता है, जो patriarchal aggression की sociology को चित्रित करता है: पुरुष-प्रधान शक्ति का स्त्री पर आक्रमण।
यह अद्वैत का प्रतिपादन है — देवी की वाक् सर्वव्यापी है, असुर की माया क्षणभंगुर। psychology में, धूम्रलोचन का विनाश ego-death का प्रतीक है: mindfulness में ‘हूं’ breathwork अज्ञान को भस्म करता है।
यह patriarchal structures पर स्त्री-शक्ति की विजय है — आधुनिक फेमिनिस्ट व्याख्या में शुम्भ (इच्छा) का दूत स्त्री स्वायत्तता को चुनौती देता है, किंतु देवी की ध्वनि उसे नेत्रहीन कर देती है।
वैदिक एवं तांत्रिक परंपराओं में वाक् (वाणी, दिव्य शब्द) भौतिक प्रक्रियाओं से उद्भूत द्वितीयक घटना नहीं, अपितु प्राथमिक ontological वास्तविकता है। शब्दब्रह्म की अवधारणा — कि परम ब्रह्म दिव्य ध्वनि के समान है — ब्रह्मांड को vibration, primordial creative syllable से उद्भूत soundscape मानती है। ऋग्वेद घोषित करता है कि वाक् देवताओं की माता है; योग-सूत्र शब्द एवं उसके अर्थ के संबंध को मूल दार्शनिक समस्या मानते हैं; तंत्र इसे पवित्र एकाक्षर की सम्पूर्ण metaphysics में विस्तारित करता ll
धूम्रलोचन प्रसंग नवरात्रि-पूजा में ‘हूं’ जप की परंपरा को बल देता है, जिससे साधक के भीतर की आसुरी ताकतें ध्वस्त होती हैं। इस प्रसंग का सर्वाधिक धार्मिक महत्व धूम्रलोचन की मृत्यु नहीं, अपितु उसके मृत्यु-साधन में निहित है: देवी के उद्गार ‘हूं’ एकाक्षर में इस क्षण का पूर्ण महत्त्व ग्रहण करने हेतु तांत्रिक एवं वैदिक थियोफोनी से पहचान जरूरी है। ‘बीजाक्षर’ दिव्य शक्ति का एकाक्षरीय संक्षेप है। बीज के भीतर वृक्ष की की भांति यह देवता या cosmic principle की पूर्ण शक्ति को समाहित करता है। ‘हूं’ (दीर्घ रूप में हूँ) इनमें सर्वाधिक शक्तिशाली है। तांत्रिक परंपरा में यह बहुआयामी है: भैरव एवं क्रोध-स्वरूपा देवी का बीज। अग्नि एवं negativity के forceful expulsion से संबद्ध है यह। संरक्षा , बाधाच्छेदन, तथा दिव्य व्यवस्था के शत्रुओं के संहार से। ‘हूं’ बीज संस्कृत तंत्र-शास्त्र का सर्वोच्च संहार-बीज है। यह न केवल ध्वनि है, अपितु primordial vibration — शब्द-ब्रह्म का संक्षिप्त रूप। वेदांत में ‘हूं’ शिव-शक्ति का संयोजन है: ‘ह’ शिव (चेतना), ‘ऊ’ शक्ति (ऊर्जा), तथा बिंदु (ं) माया-विलय। देवी exhale मात्र से धूम्रलोचन को विदीर्ण कर देती हैं — उसके शरीर को चूर-चूर कर आकाश में बिखेर देता है। यह दृश्य metaphysics of sound को प्रमाणित करता है: नाद-ब्रह्म सृष्टि रचता है (ॐ से), संहार करता है (हूं से)। तुलना के लिए, उपनिषदों में ‘भूर्भुवः स्वः’ मंत्र सृष्टि को बुनता है, किंतु ‘हूं’ विनाशकारी है — evil की ontology को ध्वस्त करने वाली।
यह प्रसंग साधना का सूत्र है: गुरु-दीक्षा में ‘हूं’ जप अहंकार-विनाश करता है। शक्तिपीठ तंत्रों में यह काली-मंत्र का मूल है। ‘हूं’ nasal stop है, forward-driving aspirate सह resonant anusvāra (नासिका में गूंजता ‘म’ ध्वनि) से समाप्त। यौगिक physiology में यह आज्ञा चक्र (कपाल के इच्छा-प्रज्ञा केंद्र) को सक्रिय कर प्राण-विस्फोट उत्पन्न करता है, जो विरोधी को ध्वस्त करता है। देवी केवल उच्चार नहीं करती — वह exhale करती है, जो deliberate construction से नहीं, अपितु divine breath के स्वाभाविक उद्गार से उत्पन्न दर्शाता है।
देवीमाहात्म्य के प्रमुख टीकाकार — जिनमें भास्करराय मखिन (18वीं शताब्दी) शामिल हैं, जिनकी गुप्तवती इस ग्रंथ पर सबसे प्रामाणिक शाक्त टीका मानी गई है — इस प्रसंग में बीज ‘हूं’ के महत्व को सावधानीपूर्वक समझाते हैं। भास्करराय इस अक्षर को पंचदशी मंत्र (पंद्रह-अक्षरों वाली श्रीविद्या मंत्र) के ढांचे में रखते हैं और हूं को कामकला का संकेंद्रित रूप मानते हैं — देवी की दिव्य कामुक-सृजनात्मक शक्ति, जिसे सभी सृष्टि और संहार का स्रोत समझा जाता है। इस अक्षर के माध्यम से धूम्रलोचन का संहार करके, देवी यह प्रदर्शित करती हैं कि वही शक्ति जो ब्रह्मांड की सृष्टि करती है — देवी की अपनी सृजनात्मक ध्वनि — वही शक्ति है जो ब्रह्मांड के भीतर उसके स्रोत में लौटने के विरोध करने वाली किसी भी चीज को विलीन कर देती है।
बाद के तान्त्रिक टीकाकार, तंत्रसार और संबंधित ग्रंथों पर आधारित होकर, इस पद्य में हूं को क्रोधबीज (दिव्य क्रोध का बीजाक्षर) से जोड़ते हैं और देवी की क्रिया को क्रोधभैरवी — देवी के उग्र रूपों में से एक, जो तीव्र, अवरोधरहित प्रतिकारात्मक न्याय से जुड़ा है — की अभिव्यक्ति के रूप में व्याख्या करते हैं। इस व्याख्या में, धूम्रलोचन का संहार आकस्मिक या मात्र रक्षात्मक नहीं है; यह ब्रह्मांडीय ऋत (उचित क्रम) का स्वयं को देवी के माध्यम से पुनर्स्थापित करने की अभिव्यक्ति है। जब दैवीय शक्ति को राक्षसी प्राधिकार के अधीन करने के प्रयास से वस्तुओं का प्राकृतिक क्रम भंग होता है, तब ऋत स्वतः ही पुनः स्थापित हो जाता है — एक सांस मात्र से।
शुम्भ प्रथम देवी की कामना करता है तथा दूत भेजकर उससे अपने रत्नों की ढेरी बनने का प्रस्ताव रखता है। देवी के इनकार पर शुम्भ आक्रामकता बढ़ाता है। वह धूम्रलोचन को वार्ता हेतु नहीं, अपहरण हेतु भेजता है: आज्ञा स्पष्ट है — केश खींचकर लाओ, अन्यथा मार डालो।
क्रमशः …..
*भगवद्गीता समूह