स्थानीय मुद्दों से भटककर हारी भाजपा

सतीश एलिया:

जो एग्जिट पोल्स बता रहे थे, करीब-करीब वही नतीजे ईवीएम से बाहर आए। आम आदमी पार्टी जिस ईवीएम को सर्वाधिक लांछित करती रही है, उसी ईवीएम ने एकबार उसे दिल्ली की सत्ता का प्रमाणपत्र दे दिया। लगातार दो लोकसभा चुनावों में दिल्ली की सभी सातों सीटें जीतने वाली भाजपा को राज्य का चुनाव, देश के चुनाव की तरह लड़ने का खामियाजा एक दफा फिर भुगताना पड़ा। अब पांच साल पहले के नतीजों से बेहतर रहे मौजूदा प्रदर्शन से भाजपा संतोष करे या अपनी गलतियों से सबक लेकर देश के बाकी राज्यों में विधानसभा चुनाव में इसे न दोहराये। इसमें एक प्रमुख सबक यह भी है कि चेहरा विहीनता भाजपा को नुकसान पहुंचाती है। कांग्रेस के लिए यह चुनाव पांच साल में शून्य से चलकर शून्य पर बने रहने का है। देश के दिल दिल्ली में जहां 2015 तक उसकी लगातार पंद्रह साल तक सरकार थी, ऐसे हालात गहरे आत्मचिंतन की मांग करते हैं।

आप की वास्तविक स्थापना का सर्टिफिकेट
दिल्ली चुनाव के नतीजे जो आए हैं, उसे लेकर न केवल दिल्ली बल्कि देश के अन्य राज्यों के लोग भी मानकर चल रहे थे कि केजरीवाल सरकार दोबारा आ सकती है, सिवाय राष्ट्रवाद को अचूक मानने वाले भाजपा नेताओं के। इसकी वजह केजरीवाल सरकार के कामकाज और उसके आधार पर चुनाव लड़ने की मंशा को माना जा रहा था। भाजपा ने इस चुनाव को गंभीरता से लेने में खासी देर की और इसके बाद उसने शाहीन बाग के बहाने इसे राष्ट्रवाद की शान पर चढ़ाने का प्रयास किया। हालांकि वह यह न करती तो शायद भाजपा दिल्ली के इस चुनाव में भी 2015 के हालात में पहुंच सकती थी।

मुफ्त बनाम शाहीन बाग
केजरीवाल सरकार की इस जीत में उसकी पांच साल की सरकार के आखिरी साल में मुफ्त योजनाओं का सर्वाधिक प्रभाव नजर आता है। इस देश में विधानसभा चुनावों में मुफ्त वाली और कर्ज माफीवाली घोषणाएं दलों को सीधा लाभ पहुंचाती रही हैं। इसमें दक्षिण में तमिलनाडु से लेकर तेलंगाना तक के चुनावों को देख लीजिए या फिर 2018 में मप्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के किसानों के कर्जमाफी के एलान से कांग्रेस के पक्ष में आए नतीजे देख लीजिए। देखना यह होगा कि कर्जमाफी लागू करने और मुफ्त योजनाओं ने उन राज्य सरकारों के बजट और अर्थशास्त्र को किस तरह प्रभावित किया है। केजरीवाल सरकार की मुफ्त योजनाएं कितने दिन तक और कैसे चलेंगी, उससे राज्य की माली हालत पर क्या असर होगा और केंद्र राज्य के बीच क्या टकराव होंगे? यह देखना दिलचस्प होगा।

भाजपा का वोटबैंक लौटता दिख रहा
इसे शाहीन बाग का असर कहिए या भाजपा के राष्ट्रवाद के प्रचार का कि दिल्ली में भाजपा का वोटबैंक इस चुनाव में 2015 के मुकाबले करीब आठ फीसदी बढ़ा है। यानी भाजपा का कोर वोटबैंक की घर वापसी हुई है। दूसरी तरफ कांग्रेस का वोटबैंक आम आदमी पार्टी में जाकर पांच साल बाद भी तनिक भी नहीं लौटा। यानी दिल्ली में एक तरह से एकबार फिर दो दलीय राजनीति की स्थापना हो गई है।

सेक्युलर का नैरेटिव बदलने का मौका गंवाया
आम आदमी की भारी जीत और केजरीवाल के फिर मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ होने के बावजूद यह चुनाव सेक्युलर की सियासी परिभाषा को पटरी पर लाने का चुनाव नहीं बन सका, अलबत्ता बन सकता था। भाजपा केजरीवाल को लगातार शाहीन बाग पर दो टूक बोलने के लिए खींचती रही लेकिन वे नहीं गए। अलबत्ता उनके डिप्टी मनीष सिसौदिया ने शाहीन बाग आंदोलन का समर्थन करने की बात कही थी। इस देश में सेक्युलर होने का सियासी रूप से मतलब यही होता रहा है कि सेक्युलर मतलब प्रो- मुस्लिम। केजरीवाल इससे बचते रहे लेकिन आखिर में वे हनुमान चालीसा पढ़कर भाजपा के आरोप को नकारने उतर आए। असल में भाजपा ने इसी लाइन पर कांग्रेस और उनके नेताओं को मंदिर-मंदिर भटकने और जनेऊ दिखाने पर मजबूर कर दिया था। केजरीवाल और उनकी पार्टी भी न केवल हनुमान चालीसा पाठ पर आ गई बल्कि वह नतीजे को भी मंगलवार और लंका आदि से जोड़कर खुशी जता रहे हैं। केजरीवाल केवल काम के आधार पर ही जीतने के लिए अड़े रहते तब भी जीत जाते लेकिन वे इसे भटक गए, यह भाजपा के लिए संतोष का विषय हो सकता है।
(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।)

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