सत्र में विधानसभा में गूंजेगी ‘अलग विंध्य’ की मांग की आवाज

 

 

विधायक नारायण त्रिपाठी ने  प्रधानमंत्री को पत्र लिख अलग विंध्य प्रदेश के पक्ष में दिया अटल-आडवाणी का हवाला

विंध्य, महाकौशल और बुंदेलखंड के पिछड़ेपन के लिए कमजोर नेतृत्व को ठहराया जिम्मेदार, पर अर्जुन सिंह और श्रीनिवास तिवारी को माना राष्ट्रीय नेतृत्व

हालांकि वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष गिरीश गौतम अलग विंध्य प्रदेश की मांग से इत्तेफाक़ नहीं रखते लेकिन भाजपा विधायक नारायण त्रिपाठी हैं कि अलग विंध्य प्रदेश की मांग से कम कुछ भी स्वीकार करने को तैयार नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर वह एक बार फिर चर्चा में हैं। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष स्वर्गीय श्रीयुत श्रीनिवास तिवारी का अलग विंध्य को लेकर केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजने का जिक्र कर उन्होंने शायद वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष के अलग विंध्य की मांग से असहमत होने पर निशाना साधा है। तिवारी व अर्जुन सिंह को राष्ट्रीय स्तर का नेता मानते हुए उन्होंने विंध्य के बाकी नेताओं पर निशाना साधा है। तो उन सभी वर्तमान  जनप्रतिनिधियों को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है, जो त्रिपाठी की विंध्य प्रदेश की मांग के सुर में अपना सुर नहीं मिला रहे हैं। मध्यप्रदेश विधानसभा सत्र के 9 अगस्त से शुरू हो रहे सत्र से पहले त्रिपाठी के इस पत्र ने यह जता दिया है कि अब वह विधानसभा में अलग ‘विंध्य प्रदेश’ की अपनी आवाज बुलंद करने से नहीं चूकेंगे।वह विंध्य की मांग के साथ जननायक बनने की अपनी कोशिश में भी रंग भरेंगे।

मैहर विधायक नारायण त्रिपाठी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 26 जुलाई 2021 को चिट्ठी लिखकर बताया है कि राज्यों के पुनर्गठन के समय 1956 में यह वादा किया गया था कि विंध्य क्षेत्र के खनिजों से और अन्य स्रोतों से  प्राप्त राजस्व को विंध्य के विकास में खर्च करेंगे। साथ ही रीवा को उपराजधानी बनाकर यहां प्रदेश स्तरीय कार्यालय खोले जाएंगे। पर सरकार इन वादों पर खरा नहीं उतरी। पत्र में एक तरफ वादा निभाने की मांग की गई तो दूसरी तरफ मजबूत नेतृत्व के अभाव में विंध्य का मूलभूत विकास न हो पाने का दर्द भी जाहिर किया गया है। साथ ही मजबूत क्षेत्रीय नेतृत्व के चलते चंबल-ग्वालियर, मालवा-निमाड और मध्य क्षेत्र के विकास की बात पत्र में उल्लेखित की गई है। उन्होंने लिखा है कि विकास न होने से विंध्य की आम जनता की मांग है कि अलग विंध्य प्रदेश बनाया जाए।

तर्कों को पुख्ता करने के लिए विधायक त्रिपाठी ने मोदी को याद दिलाया है कि पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी विकास के लिए छोटे राज्यों के समर्थक थे तो पूर्व उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी का भी विंध्य प्रदेश के गठन को लेकर आश्वासन लंबित है। उन्होंने याद दिलाया है कि विधानसभा अध्यक्ष रहते स्वर्गीय तिवारी ने अलग विंध्य प्रदेश के प्रस्ताव को विधानसभा में पारित कराकर केंद्र को भेजा था जो लंबित है। यह याद दिलाकर त्रिपाठी वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष को भी भावनात्मक तौर पर अलग विंध्य की मांग के प्रति अपना रवैया बदलने का दवाब बनाने की कोशिश जरूर करेंगे।

त्रिपाठी ने हवाला दिया है कि खनिजों के दोहन से प्रदेश को सर्वाधिक राजस्व विंध्य से मिलता है जो दूसरे क्षेत्रों के विकास पर खर्च होता है। तो दूसरी तरफ त्रिपाठी ने एक तरह से अपनी सरकार को न बख्शते हुए आरोप लगाया है कि विंध्य मूलभूत विकास बिजली, सड़क, सिंचाई,स्वास्थ्य व उच्च शिक्षा से वंचित है। यह आरोप 2018 के विधानसभा चुनाव परिणामों में विंध्य में भाजपा की प्रचंड जीत की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। अगर यही बदतर हालत थी विंध्य की तो वहां के मतदाताओं ने 15 साल की भाजपा सरकार को लगभग सभी सीटों पर जीत क्यों दिलाई थी? खुद नारायण त्रिपाठी भी भाजपा से जीते थे तो त्रिपाठी के मुताबिक राष्ट्रीय स्तर के नेता रहे स्वर्गीय अर्जुन सिंह के पुत्र नेता प्रतिपक्ष रहे अजय सिंह को भी हार का सामना करना पडा़ था। सही मायने में देखें तो शिवराज और पंद्रह साल की भाजपा सरकार का मजबूती से साथ विंध्य ने ही दिया था वरना पंद्रह महीने के अंतराल के बाद भी चौथी बार शिवराज के मुख्यमंत्री बनने और भाजपा के सरकार में आने की राह और कठिन हो जाती। या फिर सिंधिया भी यह मुमकिन कर पाने में सहयोगी न बन पाते, जिस तरह राजस्थान में पायलट की दुर्गति सबके सामने है।
खैर मांग को तर्कों की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता। त्रिपाठी ने विंध्य के साथ महाकौशल और बुंदेलखंड की दुर्दशा का जिक्र भी किया है। मतलब साफ है कि यदि विंध्य बनता है तो महाकौशल और बुंदेलखंड के अलग राज्य के दावों को भी दबाया नहीं जा सकेगा। खैर असीमित विकास के लिए अलग विंध्य प्रदेश की मांग से परहेज नहीं किया जा सकता। विकास की संभावनाएँ असीम हैं पर विकास न होने की शिकायत बिजली, सड़क, सिंचाईं सुविधाओं, स्वास्थ्य और उच्च शिक्षा के मापदंडों पर प्रदेश सरकार के विकास के दावों को झुठलाने का माद्दा नहीं ऱखती। खुद विंध्य क्षेत्र और मतदाताओं का भाजपा के प्रति रुख यह गवाही देने को राजी नहीं दिखता। पर यह तय है कि विधानसभा के मानसून सत्र में अलग विंध्य प्रदेश की मांग की आवाज जरूर गूंजेगी। यदि अलग विंध्य प्रदेश बना तो मध्यप्रदेश में मंत्री न बन पाने से हताश त्रिपाठी ही आम जनता की इस मांग के नाम पर भी जननायक बन विंध्य प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बनने का पुख्ता दावा जरूर कर सकेंगे।

कौशल किशोर चतुर्वेदी

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के जाने-माने पत्रकार हैं। इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया में लंबा अनुभव है।

 

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