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भारत रत्न आडवाणी

 

यदि राम मंदिर हिन्दुत्व के पुनर्जागरण का प्रतीक है तो लाल कृष्ण आडवाणी उस प्रतीक की संकल्पना को सामान्य जनमानस के मस्तिष्क में स्थापित करने वाले मानव हैं। राम मंदिर यदि हिन्दुओं की सामूहिकता का चरमबिन्दु है तो लाल कृष्ण आडवाणी उसका बीज बोने वाले नर हैं जिनके आह्वान पर भारतीय हिन्दू एक हारी हुई सभ्यता के बाह्यावरण को चीर कर ‘गर्व से कहो हम हिन्दू हैं’ का उद्घोष करने लगा।

राम मंदिर हमारी आस्था का उत्थान है, लाल कृष्ण आडवाणी उस आस्था की समिधा को प्रज्वलित करने वाले व्यक्ति हैं। राम मंदिर यदि आज भव्य और विराट रूप ले रहा है तो आडवाणी उसकी नींव में रखी हुई प्रथम ईंटों में से एक है। राम मंदिर यदि आज लाखों श्रद्धालुओं का स्वागत कर रहा है तो आडवाणी वह विभूति हैं जिन्होंने फटी तिरपाल में विराजमान राम लला को उचित स्थान दिलाने हेतु लाखों श्रद्धालुओं को आहुति देने हेचु उद्यत कर दिया था।

भारत रत्न लाल कृष्ण आडवाणी की नियति थी, यह उनका प्रारब्ध था। जब राम मंदिर स्थापित हो गया तब तो लाल कृष्ण आडवाणी को स्थापित होना ही था। बिना आडवाणी के, राम मंदिर की परिकल्पना संभवतः अधूरी है। रथयात्रा निकली, वामपंथियों के प्रपंच हुए, घोटालेबाजों ने तुष्टीकरण हेतु उस रथ के रोका, जिहादियों के दलों ने यूनिफ़ॉर्म पहन कर सैकड़ों कारसेवकों की हत्या की, लेकिन कुछ हिन्दू शेर आगे बढ़ते रहे और उबड़-खाबड़ भूमि को समतल कर ही दिया।

वह समतलीकरण केवल भौतिक नहीं था बल्कि वस्तुतः उसी हारी हुई सभ्यता के झुके हुए कंधों मे शक्ति फूँक कर री-बूट करने जैसा था जिसे हमने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सत्ता समर्थित हीन भावना के धीमे ज़हर में रत्ती-रत्ती गँवा दिया था। आडवाणी समेत कई विभूतियों ने हमें अपना गौरव, अपना अतीत, अपनी पहचान वापस दिलाई। भारत रत्न यूँ तो उस येगदान के समक्ष कुछ भी नहीं, पर एक कृतज्ञ राष्ट्र के पास इससे बड़ा देने के लिए कुछ है भी नहीं।