दिल्ली हिंसाः सबक और संदेश

 

चंद्रप्रकाश:

शर्म की बात है कि देश की राजधानी का उत्तरी पूर्वी इलाका तीन दिनों तक घोर अराजकता का शिकार रहा। वह भी ऐसे वक्त में जब महत्वपूर्ण विदेशी मेहमान राजधानी में मौजूद था। नागरिक होने के नाते सोचिए कि घरेलू मुद्दे को लेकर राजधानी की सड़कों पर खुला तांडव चल रहा हो तो विश्व बिरादरी में आपकी क्या साख बन रही होगी। किसी के घर अतिथि पधारे हों, उस वक्त यदि पड़ोसी किसी बात को लेकर हंगामा शुरू कर दे तो आपके ऊपर क्या बीतेगी। मेहमान भी क्या सोचेगा और आपकी कैसी छवि लेकर जाएगा।

भारत एक लोकतांत्रिक देश है। भारत के महापुरुषों और क्रांतिवीरों ने बलिदान देकर देश को इसलिए नहीं आजाद कराया कि इस देश को तमाशा बनाया जाए। आजादी का मकसद सबका सर्वांगीण विकास था। स्वतंत्रता लोगों को मुक्त हवा में सांस लेने का अवसर दिलाने की थी। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक ऐसे देश की परिकल्पना की थी, जिसके नागरिक सिर उठाकर गर्व से जी सकें। जहां किसी के मन-मस्तिष्क में कोई भय न हो। सब जीवन का संपूर्ण आनंद ले सकें। जीवन का विकास कर सकें। निर्धारित लक्ष्य को बिना किसी बाधा के प्राप्त कर सकें। लेकिन आजादी के सात दशक बीतने के बाद भी लगता है कि लोग इसके मायने को समझ नहीं पाए हैं या फिर समझना ही नहीं चाहते। देश की स्वतंत्रता यहां के लोगों के लिए स्वछंदता न बन जाए इसलिए भारत को गणतांत्रिक देश घोषित किया गया। विधि-विधान और नियम-कानून बने।

ऐसा लगता है कि देश के नागरिक वर्तमान में भी पुरानी जड़ता से ऊपर नहीं उठ पाए हैं। देश में समय-समय पर हुए दंगे-फसाद इस बात की गवाही दे रहे हैं कि कहीं न कहीं स्वतंत्रता के ऊपर स्वछंदता हावी है। यही वजह है कि आजाद देश में आजादी की मांग की जाती है, नारे लगाए जाते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि कहीं न कहीं इस मांग के पार्श्व में स्वछंदता अंगड़ाई ले रही है, जो देश को नीचा दिखाने की मंशा पाले हुए है। विचारकों का भी कहना है कि लोकतंत्र एक शिक्षित और सभ्य समाज में ही फलीभूत हो सकता है, वरना वह देश और समाज का ही बेड़ा गर्क करेगा। इसके साथ यह भी सत्य है कि यदि आप प्राप्त सुअवसर का सदुपयोग नहीं कर सके तो भविष्य में पछतावे के सिवा कुछ हाथ लगने वाला नहीं है। अपनी विफलता का ठीकरा किसी अन्य पर फोड़ने से भी कुछ नहीं होगा।

लोकतंत्र देश के नागरिकों को स्वयं के अनुरूप जीवन जीने का एक अवसर देता है। इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि हमारे ऊपर कोई नहीं है या हमारी मनमर्जी चलेगी।

जरा सोचिए कि जब देश का हर व्यक्ति रक्त पिपासु हो गया तो परिणाम क्या होगा। शायद तमाम नस्लें ही समाप्त हो जाएंगी। इसलिए देश के नागरिकों को चाहिए कि वे थोड़ा सब्र और संयम बरतें। दंगे-फसाद भड़का कर दूसरों के जीवन को तबाह करना या कठिन परिश्रम से अर्जित सम्पतियों को क्षति पहुंचाना या  बेवजह की बातों को मुद्दा बनाकर देश में आग लगाने से बाज आना चाहिए। यदि कोई देश का वैध नागरिक है तो कौन उसे देश से बाहर निकाल सकता है। बिना जाने या सोचे-समझे बहकावे में आकर देश की व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने का दुष्प्रयास हरगिज नहीं करना चाहिए। आग लगाना आसान होता है लेकिन उसकी तपिश से बचता कोई नहीं है। इसलिए विनाश के खेल को बंद करिए। यदि देश और समाज का हित नहीं कर सकते तो कम से कम अहित मत करिए। अगर इतना ही कर लें तो आने वाली पीढ़ियों को भी स्वस्थ माहौल में जीवन के विकास का अवसर मिलेगा।

(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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