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गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) या लेट फीस टैक्स (एलएफटी)

जुलाई-2017 से लागू हुआ जीएसटी को एलएफटी कहें तो ज्यादा न्यायोचित होगा.

कहने को तो इसे करीब साढ़े पांच वर्ष का समय बीत चुका है, पर अभी भी इसमें कुछ ऐसी विसंगतियां हैं जो करदाताओं को खासा परेशान किए हुए हैं।

कुछ ऐसी ही परेशानी लेट फीस के साथ-साथ ब्याज वसूली की जाने की है।

वैसे तो सरकार के साथ-साथ कर कानूनों की मंशा कभी भी जुर्माने से कर वसूलने की नहीं होती है, लेकिन जीएसटी में शुरू से ही यह देखा जा रहा है कि सरकार का कर वसूलने की अपेक्षा जुर्माना और ब्याज वसूलने पर अधिक है।

जीएसटी में करदाताओं से वसूली जा रही लेट फीस और ब्याज को लेकर भोपाल के आरटीआइ आवेदनकर्ता की ओर से लगाई गई आरटीआइ में खुलासा हुआ है कि पिछले साढ़े पांच वर्षों में देश भर के करदाताओं से लेट फीस के रूप में 7067.95 करोड़ तो ब्याज के रूप में 9453.98 करोड़ रुपए वसूले जा चुके हैं।

वहीं इस साल अप्रैल से सितंबर माह तक करदाता 440.62 करोड़ की लेट फीस तो 1148.37 करोड़ का ब्याज विभाग के समक्ष जमा कर चुके हैं।

वर्ष लेट फीस ब्याज

  1. जुलाई 2017 से मार्च 2018 – लेट फीस 366.74 करोड़ रुपये, ब्याज 386.26 करोड़ रुपये
  2. अप्रैल 2018 से मार्च 2019 – लेट फीस 2057.53 करोड़ रुपये, ब्याज 1836.09 करोड़ रुपये
  3. अप्रैल 2019 से मार्च 2020 – लेट फीस 2507.75 करोड़ रुपये, ब्याज 3278.57 करोड़ रुपये
  4. अप्रैल 2020 से मार्च 2021 – लेट फीस 1695.31 करोड़ रुपये, ब्याज 2804.69 करोड़ रुपये
  5. अप्रैल 2021 से सितंबर 2021- लेट फीस 440.62 करोड़ रुपये, ब्याज 1148.37 करोड़ रुपये

लेट फीस लगने के प्रमुख कारण:

  • जीएसटी रिटर्न के आखरी दिनों में जो चालान जमा किए जाते हैं वो कई बार दूसरे दिन अपडेट होते हैं।
  • कई बार जीएसटी विभाग का पोर्टल आखिरी के तीन-चार दिनों में ठीक से काम नहीं करता है। सर्वर भी स्लो हो जाता है। ये समस्या शुरूआत से अनवरत बनी हुई है।
  • सरकारी ठेके का काम करने वाले ठेकेदार बिल इश्यू करने की तारीख से उन्हें 6-6 माह बाद भुगतान प्राप्त होता है। ऐसे में इतने समय की लेट फीस ठेकेदारों के हिस्से आ जाती हैं।

कई करदाता टैक्स और रिटर्न इसलिए फाइल नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि उन पर ब्याज की काफी बड़ी लायबिलिटी आ जाती है।

जिस प्रकार सरकार लेट फीस को लेकर कई स्कीमें लेकर आई है उसी तरह से ब्याज की छूट को लेकर स्कीम लाई जानी चाहिए।

जीएसटी विभाग के पांच वर्ष के आंकड़े इस बात को साबित करते हैं कि करदाताओं से कितने अधिक ब्याज और लेट फीस की वसूली की गई है।

जीएसटी को देरी से जमा करने पर वैसे ही करदाता को लेट फीस देनी पड़ती है, उस पर भी प्रतिवर्ष 18 फीसदी की दर सेे ब्याज वसूला जाता है।

कई बार तो ब्याज की राशि कर की राशि से भी अधिक हो जाती है। ऐसे में करदाता को काफी नुकसान उठाना पड़ता है।

जीएसटी यदि एलएफटी बन जाएगा तो हम कैसे इसे गुड एंड सिम्पल टैक्स कह सकते हैं.

साधारण सी बात है कि जिस कानून में आम व्यापारी और जनता से इतनी अधिक मात्रा में ब्याज और लेट फीस वसूली जा रही है, वह संवैधानिक और कानूनी रूप से विसंगतियों से भरा है और ऐसे में इसे तर्कसंगत एवं करदाता का हितकारी बनाने की कोशिश होनी चाहिए.

कर अपवंचन या चोरी के केस को छोड़कर सभी को लेट फीस और ब्याज का क्रेडिट देना चाहिए ताकि वे भविष्य में अपनी जीएसटी की देनदारी इस इलेक्ट्रॉनिक क्रेडिट लेजर के माध्यम से दे सकें और सरकारी मंशा पर सवाल न उठाए.

सरकार को समझना होगा कि कोई भी व्यापारी जानबूझकर टैक्स देनदारी में देर नहीं करता और न ही व्यर्थ में लेट फीस और ब्याज देना चाहते हैं. कुछ प्रकरण को छोड़ दें तो हम पाएंगे कि कानून और पोर्टल की विसंगति इसके प्रमुख कारण है और यह मुद्दा जीएसटी काउंसिल की अगली मीटिंग में सभी राज्यों को जोर शोर से रखना पड़ेगा तभी व्यापारी को लगेगा कि सरकारें व्यापारिक वृद्धि और आय से राजस्व अर्जित करना चाहती है न कि लेट फीस या ब्याज से.

जीएसटी काउंसिल को अलग से एक मंत्री समूह की कमिटी को तुरंत गठित करना चाहिए जो इस बात को समझने और जानने की कोशिश करें कि लेट फीस और ब्याज के पीछे कानून और पोर्टल की क्या विसंगतियां है ताकि जल्द से जल्द इसमें सुधार कर एलएफटी से जीएसटी बना सकें.

लेखक एवं विचारक: सीए अनिल अग्रवाल

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