आखिर शिक्षा माफियाओं की क्यों ना बढ़े पूछपरख

 

 

*सरकारी पर भरोसा नही,और आस लगाए बैठे सरकार की,आखिर शिक्षा माफियाओं की क्यों ना बढ़े पूछपरख

 

अमित त्रिवेदी पत्रकार:

*मप्र में पालकों ने कोरोना काल के बाद निजी स्कूलों की बेवजह वसूली को लेकर तमाम पालको ने जंग छेड़ रखी है। उनका कहना है कि जब शिक्षण सत्र पूरा हुआ ही नही,बच्चो ने स्कूलों का मुंह देखा ही नही तो आखिर शिक्षा माफियाओ द्वारा लगाए गए अलग अलग शुल्क पालक क्यों वहन करे। इसे लेकर मप्र के तमाम पालकों ने मप्र मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान से आस लगा रखी है कि वह शिक्षा माफिया और पालको के बीच चल रही इस लड़ाई में हस्तक्षेप करे और पालकों की उक्त मांग को लेकर ठोस कदम उठाए। लेकिन शिक्षा माफिया और पालकों की इस जंग में सबसे अहम मुद्दा तो सभी भूल गए। क्योंकि जब पालकों को कान्वेन्ट स्कूलों में ही अपने बच्चों को पढ़ाना है। तो इन हालातों में शिक्षा माफियाओ का गुरुर सर चढ़कर क्यों नही बोलेगा। उनके हौसले बुंलद क्यों नही बढेंगे। क्योंकि पालकों को सरकार की आस तो है लेकिन सरकारी स्कूलों पर नही। क्यों ना यही पालक अपने बच्चो को उचित शिक्षा दिलवाने के लिए मप्र में स्थापित सैकड़ो सरकारी स्कूलों के उद्धार के लिए यही पालक मुख्यमंत्री सहित अन्य मप्र के जिम्मेदारों की जान नही खाते। आप सभी दिल्ली के वर्तमान सरकारी स्कूलों की सुधरी हालात और व्यवस्थाओं के बारे में जानकारी क्यों नही लेते है। क्योंकि वहां के पालको ने जिस तरह सरकार और सरकारी पर विश्वास जताया है। उसे देखते हुए दिल्ली सरकार ने भी सरकारी स्कूलों की बुरी गत पूरी तरह सुधार दी है। लिहाजा क्या मप्र में भी यही पालक शिक्षा माफियाओ के हौसले बुलंद करने की बजाय सरकार पर भरोसा जताते हुए सरकारी स्कूलों के हालात सुधारने पर ही क्यों ना एक बड़ी जंग छेड़ दे। ताकि इसका लाभ यह होगा कि कम से कम शिक्षण शुल्क में मप्र के भविष्य कहे जाने वाले बच्चो को उचित और बेहतर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके। यही पालक केंद्र सरकार द्वारा संचालित सेंट्रल स्कूलों की संख्या बढ़ाने की मांग को भी पुरजोर तरीके से उठा सकते है। ताकि सरकार द्वारा खर्च किये जा रहे करोड़ो रूपये का सभी सही तरीके से लाभ ले सके।*

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