अब जागे तो क्या जागे, जब चिड़िया चुग गई खेत

 

 

आज जीएसटी काउंसिल की मीटिंग में कोरोना संबंधित दवाईयों पर से जीएसटी कम की गई या हटाई गई.

निर्णय स्वागतयोग्य है लेकिन निर्णय लेने में इतनी देरी क्यों, जब मध्यम और निम्न वर्ग का व्यक्ति इस कोरोना की दूसरी लहर में दवाईयों और अस्पताल के खर्च में पीसा जा चुका है और आज जब इसका प्रकोप कम हो चुका है, तब ये निर्णय.

शायद तीसरी लहर की तैयारी हो रही है, और आम आदमी इस उम्मीद में है कि शायद सरकार के प्रयासों से तीसरी लहर न आवें.

निर्णय समय का मोहताज होता है और यदि राहत सही समय पर मिलें तो उसकी उपयोगिता सफल होती है, नहीं तो सिर्फ दिखावटी

आज आम जनता और छोटा व्यापारी राहत का इंतजार कर रहा है कि शायद सरकार को तरस आ जाए और अपनी झोली ब्याज सब्सिडी के रूप में या फिर कोविड इलाज के खर्चे के रुप में या फिर पेट्रोल डीजल के दाम कम करके, जीएसटी दरों को तर्कसंगत बनाकर, शिक्षा और स्वास्थ्य खर्च में कटौती कर, इत्यादि कदम पर निर्णय ले l

जब व्यक्ति टूट जाएगा या उसका व्यापार बंद हो जाएगा, और यदि बेरोजगारी और मंहगाई में कमी न आई, तो आखिर कब सरकार लेगी राहत का फैसला?

कहीं ऐसा न हो, सब कुछ लुटने के बाद राहत मिलें तो फिर राहत कैसी?

कहना साफ है कि केन्द्र सरकार की निर्णय क्षमता कमजोर है, जिसके कारण अर्थव्यवस्था कमजोर है- फिर चाहे वो निर्णय नोटबंदी का हो, चाहे जीएसटी के गलत स्वरूप को लागू करना हो, चाहे लाकडाउन नीति हो या फिर वेक्सीशन या ही फिर नये इनकम टैक्स पोर्टल बनाने की बात हो, विदेश नीति में कमजोरी, दिवालिया और अन्य कानून की असफलता जो बैंकिंग क्षेत्र मजबूत करने की दृष्टि से लाए गए थे, स्वास्थ्य संरचना का कमजोर होना और कोविड के नियमों की चुनावी रैलियों में धज्जियाँ उड़ाना l

सही समय पर निर्णय न लेना या फिर उसे टालना, इस सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी है और शायद इसीलिए कहते हैं- देर आए, पर दुरस्त नहीं आए l(यह लेख में लेखक के स्वयं के विचार है मध्य उदय किसी भी प्रकार से जिम्मेदार नहीं है)

लेखक एवं विचारक: सीए अनिल अग्रवाल जबलपुर

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