धूप को बांधने चले तुगलक”


-प्रियदर्शन, संपादक NDTV…
जो लोग अरसे से ‘दैनिक भास्कर’ पढ़ते रहे हैं, वे पिछले कुछ महीनों से भास्कर में आए बदलावों को लेकर कुछ चकित थे. यह साफ़ नज़र आ रहा था कि ‘दैनिक भास्कर’ पत्रकारिता के धर्म के मुताबिक लगातार वे ख़बरें खोज और दे रहा है जिसे देने से दूसरे बच रहे थे. कोविड के दूसरे दौर में गंगा के पाट पर बनी क़ब्रों की तस्वीर बिल्कुल दहलाने वाली थी. पिछले दिनों उसने टीकाकरण की सुस्त रफ़्तार पर भी विस्तार से रिपोर्टिंग की. ऐसा नहीं कि वह सारी ख़बरें केंद्र सरकार या बीजेपी को निशाना बनाकर कर रहा था. जयपुर में होने के नाते उसने राजस्थान की गहलोत सरकार के ख़िलाफ़ भी लगातार ख़बरें कीं.

उसी की ख़बर से यह बात खुली थी कि राजस्थान में बहुत सारे टीके बिना इस्तेमाल फेंक दिए गए हैं. सरकार ने इसका खंडन भी किया, लेकिन भास्कर लगातार इस बात के प्रमाण देता रहा कि उसकी ख़बर सही है.

ऐसा नहीं है कि दैनिक भास्कर कोई क्रांतिकारी अख़बार है. वह शुद्ध व्यावसायिक अख़बार ही है जिससे मेरी शिकायतें कमोबेश वही रही हैं जो हिंदी के दूसरे अख़बारों से रही हैं. कई बार उसमें पेशेवर तराश कम नजर आती है, व्यावसायिक दबाव ज़्यादा दिखता है. उसकी भाषा नीति मेरे लिए हमेशा आपत्ति का विषय रही. वहां काम करने वाले मित्र अपने-अपने ढंग से कई शिकायत रखते रहे हैं. इसके बावजूद पिछले कई दिनों से यह अख़बार लगातार भरोसा दिलाता रहा कि इसकी अपनी स्वतंत्र नीति है और समाचार-विचार के लिए वह किसी सरकार या थिंक टैंक की दी हुई स्क्रिप्ट पर नहीं चल रहा.

जाहिर है, जब कोई अखबार इस नीति पर चलेगा तो वह सरकार की आंखों में गड़ेगा- ख़ासकर उस सरकार की आंखों में जो कई मोर्चों पर लगातार विफल रही हो और जिसे प्रचार सबसे ज़्यादा प्रिय हो.

तो जब अप्रैल और मई के महीनों में कोविड की दूसरी लहर अपने चरम पर थी और सरकार सोई हुई थी या बंगाल चुनाव में खोई हुई थी, तब जो गिने-चुने अखबार और टीवी चैनल कोविड के क़हर की ख़बर दे रहे थे, उनमें भास्कर भी था. अप्रैल के उस महीने में प्रधानमंत्री की सक्रियता का एक दिलचस्प आकलन न्यूज़ लॉन्ड्री की वेबसाइट पर पत्रकार अतुल चौरसिया ने किया था. उन्होंने बताया कि एक से सत्रह अप्रैल के बीच जब कोरोना के मामले बढ़ रहे थे, तब प्रधानमंत्री ने सैकड़ों ट्वीट किए, लेकिन उनमें बस तीन ट्वीट कोरोना को लेकर थे. वे बताते हैं कि 12 अप्रैल को, जब देश में कोरोना के 1.61 लाख मामले आए, तब प्रधानमंत्री ने बंगाल चुनाव से जुड़े 16 वीडियो ट्वीट किए. 13 अप्रैल को जब देश में 1.84 लाख कोविड केस थे, तब वे ट्विटर पर सबको त्योहारों की बधाई दे रहे थे.

17 अप्रैल को जब कोविड के 2.61 लाख मामले आए, उस दिन प्रधानमंत्री ने बंगाल में अपनी रैली में उमड़ी भीड़ पर प्रसन्नता जताई और कहा कि जनता ममता को उखाड़ फेंकने के लिए निकली है. न्यूज़ लॉन्ड्री की रिपोर्ट आगे बताती है कि जब 23 तारीख़ को 3.46 लाख कोविड केस आ चुके थे, तब प्रधानमंत्री ने वर्चुअल रैली की. आख़िर 27 अप्रैल को पहली बार प्रधानमंत्री ऑक्सीजन की कमी पर हाई लेवेल मीटिंग करते हैं.

जबकि यही वह समय था जब दिल्ली और देश में कोविड के बढ़ते मामलों के बीच लोग अस्पताल खोज रहे थे, ऑक्सीजन सिलिंडर मांग रहे थे और उनमें से कई सड़क पर दम तोड़ जा रहे थे. नौबत यहां तक आ गई कि लोग पुलों से शव फेंककर जाने लगे, नदियों के किनारे क़ब्रें बन गईं. ये सारी ख़बरें इतनी प्रत्यक्ष थीं कि कोई भी संस्थान इनसे आंख चुरा नहीं सकता था. हर जगह ये ख़बरें आ रही थीं. तब भी सरकार इन ख़बरों का उसी तरह खंडन करती रही जैसे दो दिन पहले उसने संसद में बताया कि उसके पास ऑक्सीजन की कमी से किसी की मौत की ख़बर नहीं है.

ऐसे में भास्कर ने यूपी के 27 ज़िलों से ख़बर मंगाई और बताया कि गंगा किनारे 1140 किलोमीटर के दायरे में 2000 से ज़्यादा शव पड़े हुए हैं. इसके साथ एक बड़ी तस्वीर छापी जिसमें नदी के पाट पर पड़े शव भयावह ढंग से दिख रहे थे. यह पत्रकारिता का आदर्श रूप था. लेकिन गुरुवार को इस अख़बार के कई ठिकानों पर एक साथ छापे पड़ते रहे.

दिलचस्प यह है कि भास्कर के मुताबिक छापा मारने आए अधिकारियों ने कहा कि छापे के बारे में जो भी ख़बर छपेगी, वह उनको दिखाकर ही छपेगी. इस निर्देश का क्या मतलब था? छापा मारने वाले आयकर विभाग के अधिकारियों को दैनिक भास्कर की आय का हिसाब देखना था या उनकी संपादकीय नीति तय करनी थी? यह भी बताया जा रहा है कि आयकर अधिकारियों ने भास्कर की संपादकीय टीम के लोगों को भी रोका और उनके मोबाइल फोन क़ब्ज़े में ले लिए. साफ है कि उन्हें अख़बार समूह के आर्थिक पक्ष से जितनी शिकायत नहीं थी, उससे ज्यादा उसके संपादकीय पक्ष से थी.

बहरहाल, भास्कर जिस तरह बदला हुआ दिख रहा था, तभी से यह संदेह हो रहा था कि उसके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई न हो. यह अंदेशा सही साबित हुआ. दरअसल इस संदेह के पीछे मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान का वह अतीत है जिसमें उसने सच बोलने वालों को हमेशा कुचलने और प्रताड़ित करने की कोशिश की है. इस सरकारी दबाव की वजह से सोशल मीडिया पर सरकार विरोधी टिप्पणियां लिखने वाले पत्रकारों की नौकरी गई है, प्रधानमंत्री के दावे पर सवाल उठाने वाले ऐंकर्स को जाने-माने संस्थानों को छोड़ कर जाना पड़ा है, कई पत्रकारों को मुक़दमे झेलने पड़े हैं और उन संस्थानों पर छापे पड़े हैं जिन्होंने अपनी स्वतंत्र नीति बनाए रखी है.

लेकिन जब भी ऐसे छापे पड़ते हैं जो चीज़ सबसे ज्यादा उभर कर आती है, वह पत्रकारिता की स्वतंत्रता की ज़रूरत और उसे बनाए रखने की चुनौती है. इस तरह से कह सकते हैं कि ये छापे हमें एक तरह से हमारी भूमिका की याद दिलाते हैं. यह बताते हैं कि इस भूमिका पर अमल की चुनौती लगातार कड़ी होती जा रही है. लेकिन यह सिर्फ पत्रकारिता की चुनौती नहीं है- यह इस देश के उस लोकतंत्र की चुनौती है जिसने एक लंबे संघर्ष के बाद आज़ादी हासिल की है और उसी से यह मूल्य भी हासिल किया है कि बोलने की आज़ादी सर्वोच्च है.

निश्चय ही इस आज़ादी से जुड़ी शर्तें भी हैं. एक शर्त अपनी ज़िम्मेदार नागरिकता के संवहन की भी है. बहुत सारे लोग यह शिकायत करते पाए जाते हैं कि मीडिया बहुत ताकतवर है और इसलिए उस पर कोई कार्रवाई नहीं होती. कार्रवाई होती है तो वह अपनी आज़ादी छिनने का शोर मचाता है. कई लोग इसी वजह से सख़्त मीडिया क़ानूनों की वकालत भी करते हैं.

लेकिन सच्चाई क्या है? यह सच है कि मीडिया किसी छूट का हक़दार नहीं है. लेकिन ज्यादा बड़ा सच यह है कि ऐसी कोई छूट उसे मिलती भी नहीं. अगर वह मिलती है तो तभी मिलती है जब वह अपनी मीडिया वाली भूमिका छोड़ कर सत्ता के साथ आलिंगनबद्ध हो, उसके एक बाजू की तरह काम करे. ऐसे सत्ता-मुखापेक्षी मीडिया और पत्रकारों को भी कभी-कभी भ्रम हो जाता है कि वे बहुत ताकतवर हैं. लेकिन यह भ्रम टूटने में देर नहीं लगती. जब भी मीडिया अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व अर्जित करता है, जब भी वह अपनी खोई हुई आवाज़ हासिल करता है, जब भी वह सच बोलने निकलता है, वह अपने दरवाज़े पर आयकर विभाग या प्रत्यर्पण निदेशालय की किसी टीम को खड़ा पाता है.

भास्कर के साथ यही हो रहा है. लेकिन यह छापामारी बस भास्कर का मुंह बंद करने के लिए नहीं, लोकतंत्र में आस्था रखने वाले उन तमाम लोगों को चेतावनी देने के लिए भी की जा रही है जो अब भी सच बोलने का साहस बचाए हुए हैं. ऐसे मौक़ों पर मुझे अक्सर कई दशक पहले बिहार के प्रस्तावित काले प्रेस बिल के ख़िलाफ़ लिखी गई सूर्यभानु गुप्त की एक क्षणिका याद आती है-

‘करते हैं कमाल फ़ैसले तुगलक / बांधना था तो बांधते दरिया / धूप को बांधने चले तुगलक.’

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