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दिल्ली हाईकोर्ट ने आयकर विभाग को फटकारते हुए – समय में पीछे जाने के सिद्धांत को अवैध ठहराया

 

*सीए अनिल अग्रवाल :

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के आशीष अग्रवाल केस के निर्णय की व्याख्या करते हुए आयकर विभाग द्वारा जारी निर्देश क्र १/२०२२ दिनांक ११/०५/२२ को ग़लत ठहराते हुए कहा कि समय में पीछे जाना सैध्दांतिक दृष्टिकोण से अवैध है.

विभिन्न रिट याचिकाओं पर फैसला देते हुए माननीय दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि जब सरकार ने संसद में कानून पारित करते हुए कह दिया कि कोई भी आयकर केस ३ वर्ष से पुराना नहीं खोला जा सकता और सिर्फ और सिर्फ यदि करदाता द्वारा आय ५० लाख रुपए या उससे ज्यादा से कम बताई गई है तो फिर पिछले १० वर्ष तक केस खोला जा सकता है. तो फिर इसका पालन हर वर्ष पर लागू होगा.

आयकर विभाग द्वारा उपरोक्त निर्देश दिनांक ११/०५/२२ के आधार पर ०१/०४/२१ के बाद भी हजारों नोटिस धारा १४८ के अंतर्गत पुराने सालों के याने कि ३ वर्षों से भी अधिक पहले के जारी किए गए हैं जो कि पूर्णतः गलत एवं असंवैधानिक है. समय में पीछे यात्रा करने जैसा कोई सिद्धांत नहीं होता और विभाग का निर्देश ११/०५/२२ इस माफत गलत और अवैध है.

इस निर्णय से करदाता को जबरन होने वाली परेशानी से राहत तो मिलेगी साथ ही विभाग को भी सोचना होगा कि करदाता चोर नहीं, देश के हितधारकों में से एक है.

 

*उपरोक्त निर्णय माननीय दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा दिनांक १०/११/२३ को रिट याचिका WP(C) 11527/2022 & CM APPL 34097/2022 गणेश दास खन्ना वि. आईटीओ में पारित किया गया है. आइए एक बार पुनः इस फैसले के कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को समझे:*

१. फैसले के मुताबिक अब इनकम टैक्स ऐसे ही कभी भी आपके इनकम टैक्स असेसमेंट के मामले को नहीं खंगाल सकता है।

२. 10 साल पुराने मामलों को इनकम टैक्स तभी खंगाल सकता है जब टैक्सपेयर की इनकम 50 लाख या उससे ज्यादा हो।

३. बजट 2021-22 के दौरान री-असेसमेंट को लेकर नया IT कानून बनाया गया था। जिसमें 6 साल से री-असेसमेंट समयसीमा को घटाकर 3 साल कर दिया गया था।

४. 50 लाख से ज्यादा और सीरीयस फ्रॉड में 10 साल तक री-असेसमेंट हो सकती है।

५. इनकम टैक्स विभाग के अधिकारी कभी भी लोगों को पुराने मामले खोलकर नोटिस भेज देते थे।

६. ऐसे में ये उनलोगों के लिए राहत भरी खबर है जिनको इनकम टैक्स विभाग से नोटिस मिल जाता था।

७. दिल्ली हाई कोर्ट ने इनकम टैक्स विभाग की ओर से नोटिस भेजने की समय सीमा को ध्यान में रखते हुए धारा 148 के तहत फैसला सुनाया है। जिससे वह समय के भीतर ही मामलों को फिर से खोलने के लिए नोटिस जारी कर सकता है।

८. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि ऐसे मामलों में जहां आय (टैक्स असेसमेंट से छूट गई आय) 50 लाख रुपये से कम है, धारा 149 (1) के खंड (ए) में तय तीन साल की सीमा की अवधि लागू होनी चाहिए।

९. 10 साल की विस्तारित सीमा अवधि केवल तभी लागू होगी जब आय 50 लाख रुपये से अधिक हो।

१०. दूसरी ओर, आयकर अधिकारियों ने तर्क दिया कि आशीष अग्रवाल (मई, 2022) के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले और बाद में केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड द्वारा जारी एक सर्कुलर को देखते हुए ऐसे नोटिस वैलिड हैं।

११. दिल्ली हाई कोर्ट ने माना है कि सीबीडीटी के निर्देश में निहित ‘ट्रैवल बैक इन टाइम’ सिद्धांत कानून की दृष्टि से गलत है।

१२. यह एक स्वागत योग्य निर्णय है, जो उन टैक्सपेयर्स की मदद करेगा जो री-असेसमेंट कार्रवाई का सामना कर रहे हैं।

१३. यह उन टैक्सपेयर्स के लिए भी फायदेमंद होगा जिन्होंने रिट याचिका दायर नहीं की थी।

१४. दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि वित्त मंत्री के भाषण और वित्त विधेयक, 2021 के प्रावधानों की व्याख्या दोनों के अनुसार, ईज ऑफ डुइंग बिजनेस के लिए री-असेसमेंट की समय सीमा छह से घटाकर तीन साल कर दी गई थी।

*उपरोक्त निर्णय और तथ्यों से साफ है कि यदि सही मायनों में इज आफ डुइंग बिजनेस लागू करना है तो कानून को करदाता और हितधारकों के दृष्टिकोण से पढ़ना होगा और समझना होगा तभी कानूनों का अनुपालन सही दिशा में हो सकेगा.*

 

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