जीवन में क्या चाहिए पैसा, प्रतिष्ठा या संतोष ?

अभिषेक रंजन –

जीवन हम सब में विद्यमान सकारात्मक ऊर्जा है जो हमें अच्छाई के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए सदैव प्रेरित करती है ।प्रत्येक जीवन का एक मूल उद्देश्य होता है और क्योंकि हम सभी का जीवन काल निर्धारित है अतः हमें अपने जीवन के उद्देश्य को पहचान कर उसे पूर्ण करके अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहिए ।

परंतु आज के युग मे जीवन की परिभाषा ही बदल चुकी है । आज किसी को अपने मूल उद्देश्य का  ज्ञान  ही नहीं है ।आज का मानव जीवन को केवल पैसा और प्रतिष्ठा कमाने में नष्ट कर रहा है । वह पैसा और प्रतिष्ठा कमाने में सफल भी हो रहा है किंतु वह शांति पाने में असमर्थ है । आज वह अपने जीवन के मूल उद्देश्य से से कोसो दूर है और उसे इस विफलता का  ज्ञान   भी नहीं है । उसने अपने जीवन को पैसा और प्रतिष्ठा कमाने तक सीमित कर दिया है जिसके कारण समाज में हिंसा, चोरी, धोखाधड़ी बढते ही जा रहे हैं । आज स्थिति यह है कि एक मनुष्य दूसरे पर भरोसा नहीं कर पा रहा है । आज केवल ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने की होड़ लगी है जिसके लिए मनुष्य किसी भी मार्ग पर चलने को तैयार है । आज उसके पास पैसा तो बहुत है पर संतोष तनिक भी नहीं । उसके पास उसकी नौकरों की फौज है किंतु वह स्वयं अपने मन का नौकर है । आज कहने के लिए वह आजाद है , वह जो चाहे कर सकता है किंतु वह अपने लालच का गुलाम है । मनुष्य एक पल भी शांत नहीं है क्योंकि वह हर पल केवल पैसा ,धन, फायदा,,प्रतिष्ठा के मोह में स्वयं को भूल चुका है । उसके पास अपने परिवार के लिए भी समय नहीं है । मनुष्य केवल यह सोचता है कि जितना हो सके उतना धन अर्जित कर ले । इसी होड़ मे मनुष्य     स्वयं को जीवन के आनंद से वंचित रखता है ।   वह चाह कर भी आराम नहीं कर पा रहा , उसका मन एक पल भी शांत नहीं रहता और इसके दुष्परिणाम यह है कि आज अनेकों रोगों ने मनुष्य जाति को जकड़ लिया है ।
हमारी संस्कृति हमें संतोष सिखाती है, दूसरों को दान देना सिखाती है परंतु आज विकास के नाम पर हमने अपनी संस्कृति का भी त्याग कर दिया है जो निश्चित ही हमारी हार है । हम यह भूल चुके हैं कि संतोष का त्याग कर के हम कभी खुश नहीं रह सकते , हम सुखी

जीवन नहीं व्यतीत कर सकते हैं । संतोष एक  अमूल्य गुण है  जो हमें असिमीत ऊर्जा प्रदान करती है । संतोष से हमें शांति की प्राप्ति होती है । संतुष्ट व्यक्ति ही केवल अपने जीवन को सार्थक बनाने की शक्ति रखता है । अगर हम अपने इतिहास को देखें तो पाएँगे कि कई व्यक्ति ऐसे थे जिनके पास धन तो नहीं था किंतु फिर भी उन्होंने अपने जीवन को सार्थक बनाया । उदाहरण के लिए स्वामी विवेकानंद , महात्मा गाँधी , ए पी जे अब्दुल कलाम आदि । आज की पीढ़ी संतोष की शक्ति से अपरिचित है । मनुष्य को यह खबर ही नहीं कि अगर सब कुछ पा कर भी वह संतुष्ट नहीं है तो उसने कुछ नहीं पाया । जबकि अगर वह  थोड़े से भी संतुष्ट है तो उसने सब कुछ पा लिया ।और जब तक यह बात उसके समक्ष में आती है तब तक वह अपनी अधिकतर जिंदगी बर्बाद कर चुका होता है ।   हमें संतोष से ही असली सुख की प्राप्ति होती है जो किसी वस्तु विशेष से परे होती है । हम संतोष से ही अपने मन को शांत रख सकते हैं और साथ ही साथ अपने जीवन के असली उद्देश्य को पहचान पाएँगे फिर उसे पूर्ण करके के लिए प्रयत्न करेंगे । इस तरह हम संतोष को अपनाकर अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं ।
“वह समृद्ध है जो संतुष्ट है” ।

-थॉमस फुलर

 

 

अभिषेक रंजन –

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