क्यों जरूरी है महिला सशक्तिकरण?

 

पल्लवी बरगौंहाईं:-

आज के समय में लगभग हर जगह चाहे वह गाँव हो या शहर हर जगह महिला सशक्तिकरण पर चर्चा हो रही है, लेकिन इसके वास्तविक मायने कितने लोग समझ पाते हैं यह कहना मुश्किल है। हमारे भारतीय समाज में इसकी कितनी मान्यता मिल रही है, यह अनुसंधान करना बेहद कठिन है, हालांकि हमारे भारतीय समाज में महिलाओं की अवस्था में काफी सुधार हुआ है लेकिन जिस तरह स्वस्थ रूप से सुधार की कल्पना की जाती है, सुधार हो सकता था वैसा सुधार नही हुआ है, आने वाले समय में महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए इस दिशा में अभी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। पहले की अपेक्षा महिलाओं की दशा पर सुधार तो हुआ है लेकिन अभी भी देश की आधी आबादी अपने अनेक अधिकारों से वंचित है।

आज भी हमारे सामने पीड़ित महिलाओं के उदाहरणों में कमी नही है। अख़बार, समाचार चैनल, वेब चैनल रेप, दहेज़ के लिए हत्या, भ्रूण हत्या की घटनाओं से भरे पड़े मिलते हैं, इन आंकड़ों में दिन व दिन बढ़ोतरी हो रही है। महिलाओं से होने वाली हिंसा और शोषण की घटनाएं खत्म होने का नाम नही ले रही।

आज हर क्षेत्र में पुरुष के साथ ही महिलाएं भी तमाम चुनौतियों से लड़ रही हैं, सामना कर रही हैं, कई क्षेत्रों में तो महिलाएं पुरुषों से आगे हैं। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि समाज के कुछ पुरुष प्रधान मानसिकता वाले तत्व यह मानने के लिए तैयार नही हैं कि महिलाएं भी उनकी बराबरी करें, ऐसे लोग महिलाओं की खुले विचार वाली कार्य शैली को बर्दास्त नही कर पा पाते हैं। शायद इसलिए कभी तस्लीमा नसरीन जी चर्चित हुई तो कभी दीपा मेहता। आज भी हमारे समाज में महिला केंद्रित आलेख और सिनेमा आसानी से स्वीकार नही किये जाते हैं, कहीं न कहीं उनका विरोध शुरू हो जाता है। क्या महिलाओं को अधिकार नही है कि वे खुलकर अपने विचारों को समाज के सामने रखें।
सवाल पुरुष और महिलाओं के अलग होने का नही है, न ही महिलाओं को कमतर आंकने का, सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर देश की आधी आबादी का यूँ ही अनदेखा किया जायेगा, उनका शोषण किया जायेगा, ऐसे में उनके बिना समाज का विकास कैसे संभव है। जबकि महिला और पुरुष दोनों हो समाज की धुरी हैं, एक को कमजोर करके संतुलित विकास हो ही नही सकता। जब तक देश की आधी आबादी सशक्त नही होगी हम विकास की कल्पना भी नही कर सकते। समय की मांग है और समाज की जरूरत भी कि महिलाओं को भी पुरुषों के सामान अधिकार मिले, उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलें।
क्या है यह महिला सशक्तिकरण ? उस पर विचार करने और एक स्वस्थ व बृहद चर्चा करने की जरूरत है, लेकिन विचार व चर्चा करने से पहले हमें चिंतन करना होगा कि महिला सशक्तिकरण का सही अर्थ क्या है? सशक्तिकरण के साथ यह भी जानकारी होना चाहिए कि हम कहीं सशक्तिकरण के नाम पर अराजकता तो नही फैला रहे हैं। कहीं हम समाज में प्रचलित रीति-रिवाज और प्रथाओं का उलंघन तो नही कर रहे। हम नारी स्वतंत्रता का गलत फायदा तो नही उठा रहे। कहीं हमे गलती फहमी तो नही हैं कि सशक्त होने का मतलब ही मन-मर्जी से जीना और सामाजिक रीतियों को तोड़कर अपनी अच्छी-बुरी हर ख्वाहिशों को पुरा करने की कोशिश कर रहे हैं। अब समय आ गया है हम इसकी वास्तविक परिभाषा को समझें और सशक्त बने।

सरल शब्दों में परिभाषित करें तो हम यह कह सकते हैं कि महिलाओं को अपनी जिंदगी के हर छोटे-बड़े हर काम का खुद निर्णय लेने की क्षमता होना ही सशक्तिकरण है। अपनी निजी स्वतंत्रता और खुद फैसले लेने के लिए महिलाओं को अधिकार देना ही महिला सशक्तिकरण है। अब सवाल यह उठता है कि क्या महिला सशक्तिकरण सम्भव है, तो इसके लिए यही जबाव है कि जब तक महिलाएं खुद अपने-आप के दैहिक, मानसिक और शारीरिक हर तरह से खुद को पुरुषों से ऊपर समझे और उनकी निर्भरता की सोच से बाहर आये। खासकर हमारे पारंपरिक ग्रामीण समाज की महिलाएं जो अपनी इच्छा शक्ति, स्वतंत्रता और स्वाभिमान को दबाकर जीने के लिए मजबूर हैं। प्रचीन काल से आज तक अपनी सभ्यता, संस्कृति व परम्परा हर तरह से हमारे समाज में पुरुषों को ही प्राथमिकता दी गई। अब सवाल यही है कि ऐसे समाज में नारी का सशक्त होना कितना आसान है और कितना कठिन? कहने को तो बेटी घर की लक्ष्मी होती है लेकिन घर के बाहर हर जगह वह तर्क-कुतर्क और विकृत मानसिक लोगो की शिकार होती है, हिंसा की शिकार होती है, लांछित होती है।
एक समय था महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखा जाता था, मुख्यधारा से नही जुड़ने दिया जाता था और न ही कोई रोजगार करने दिया जाता था, उन्हें सिर्फ घर की चार दिवारी में कैद करके रखकर कभी मंगलसूत्र के बन्धन में तो कहीं ममता के मोह में बांधकर, कहीं पत्नी के रूप में तो कहीं मां के रूप में चार दिवारी के भीतर कैद रखा गया। यह सच है कि अब हालात पहले जैसे नही हैं महिलाएं, शिक्षित होने लगीं हैं, हर क्षेत्र में आगे बढ़ने लगी हैं, लेकिन फिर भी सवाल वहीं की वही है कि क्या महिलाओं का शोषण बन्द हो गया है? क्या महिलाओं पर होने वाली हिंसा रुक गई है? यह वह सवाल हैं जो दशकों से समाज पर प्रश्न चिन्ह लगाये हुए हैं, समाज में कालिख की तरह पुते हुए हैं। चर्चा तो होती है लेकिन चिंतन नही होता, प्रयास तो होते हैं लेकिन सुधार नही होता। आखिर क्यों? ऐसा क्यों? शायद हम इस ओर पूरी इच्छा शक्ति और ईमानदारी से चर्चा और प्रयास नही कर रहे। जन्म से पहले कन्या भ्रूण हत्या किया जा रहा है, दहेज़ के लिए आये दिन महिलाओं की हत्या हो रही है, रेप की घटनाओं के बढ़ते आंकड़े देखे तो मन विचलित होता है। भारतीय संविधान ने महिला व पुरुष को समानता का अधिकार दिया है, साथ ही हमारी सरकारों ने भी महिलाओं के लिए अनेक योजनाएं चालू की हैं, इसके बावजूद समाज में महिला-पुरुष को लेकर अनेक तरह के भेद-भाव बना दिए गये हैं और हर जगह महिलाओं को कमतर आंकने की कोशिश की गई है, यह महिलाओं के साथ अन्याय नही है तो और क्या है। संविधान, सरकार से लेकर सामाजिक संगठन तक में महिला सशक्तिकरण की बात तो होती है लेकिन महिला सशक्त नही हो पाई है। यह सत्य है कि महिला सशक्तिकरण तब तक संभव नही जब तक हमारे समाज के पुरुष प्रधान  रवैये की में यह सोच पैदा न हो जाये कि महिला भी पुरुष से कम नही है साथ ही महिलाओं को भी अपने अधिकारों के लिए आगे आना होगा और अपनी कार्यक्षमता से अपनी शक्ति का, खुद के सशक्त होने का परिचय देना होगा। महिलाओं को दिखाना होगा की नारी सिर्फ भोग की वस्तु नही है बल्कि वह भी समाज का अहम हिस्सा है।  महिलाओं को जागना होगा और दिखाना होगा की वह लाचार नही है उसे लाचार बनाया गया है। अब जागरूकता की परम आवश्यकता है, नारी को खुद को पहचानने की, अपने-आप को जानने की जरूरत है। अपने विकास, उन्नति, प्रगति समृद्धि और अधिकारों के लिए नारी हर पल चौकन्ना रहें, जागरूक बने और दूसरी नारी सशक्ति को भी प्रेरित करें। समाज का संतुलित विकास नारी के सशक्त होने पर ही सम्भव है।
इस बात से भी हम इंकार नही कर सकते कि हमारी नारी शक्ति ऐसी व्यवस्था में रह रही हैं जहाँ महिलाओं को सशक्त बनाना आसान नही फिर भी महिलाओं को हर तरह से प्रयास करना होगा, क्योंकि यह कार्य मुश्किल जरूर है लेकिन न मुमकिन नही, इसलिए महिलाओं को शिक्षा तथा सोच से हर तरह से अपने-आप को सशक्त करने का समय आ गया है। महिलाओं को मानसिक रूप से मजबूत होकर खुद को अपने-आप को प्रस्तुत कर हर जगह शिखर पर स्थापित करना होगा, साथ ही सशक्त होने के लिए पुरुषों की सोच को भी बदलना होगा कि हम नारी आपसे कम नही हैं। परिवर्तन लाना जरूरी हैं क्योंकि नारी शक्ति को मुख्य धारा से जोड़े बिना विकास सम्भव नही है, इसलिए हर महिला को खुद से अपने घर से शुरुआत करनी होगी खुद को सशक्त बनाने की और अपने आस-पास की महिलाओं को भी जागरूक करना होगा, जागरूकता का माध्यम जो भी हो लेकिन खुद को सशक्त बनाने हेतु जागरूकता जरूर लाएं, साथ ही अपने अंदर निर्णय लेने की, नेतृत्व करने की क्षमता पैदा करें, साहसी बने, दृण निश्चयी बने, आत्म विश्वाशी बनें, क्योंकि नारी सशक्त होगी तभी हम देश और समाज के उज्ज्वल भविष्य की कल्पना कर सकते हैं, एक सशक्त नारी के कन्धों पर ही संतुलित, स्वस्थ, विकसित समाज की नींव रख सकतें हैं। वर्षों से महिलाओं को चार दिवारी के अंदर कैद रखने और उसे शोषित करने की जो धारणा है, जो सोच है उसे पूरी तरह से दफन कर जागरूकता की ज्योति जलाकर एक नए सुन्दर समाज की स्थापना करना है।
एक तरफ देवियों की पूजा अर्चना की जाती है तो दूसरी तरफ महिलाओं से दोयम दर्जे का व्यवहार कर भेदभाव किया जाता है। क्या यही महिला सशक्तिकरण है। नही, बिल्कुल नही यह सिर्फ व्
छल है इस छल से बाहर आना होगा, महिलाओं को अपने-आप को खुद की शक्तियों को पहचानना होगा और आगे बढ़ना होगा। देश को उन्नत शील बनाना है, एक सुदृण समाज की परिकल्पना को साकार करना है, इसलिए मैं समस्त नारी सशक्ति से आह्वाहन करती हूँ उठो, जागो आगे बढ़ो अपने अधिकारों के लिए तुम्हे ही लड़ना होगा, आगे बढ़ना होगा। इस पुरुष प्रधान समाज में पुरुषों की सोच भी तुम्हे गई बदलना है, खुद को स्थापित करना है और साबित करना है कि हम भी पुरुषों से कम नही, बल्कि हम एक कदम आगे हैं। यह दिखाना होगा करके दिखाना होगा, अपना लोहा खुद मनवाना होगा, इसलिए जागों, जागरूक बनो, मजबूत बनो, आगे बढ़ो, सशक्त बनो। तभी सही मायने में महिला सशक्तिकरण का चिंतन साकार होगा, प्रयास पूरा होगा और एक नए भारत व स्वस्थ-संतुलित समाज का निर्माण होगा।

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