कोरोना ने पलटी मारी, चूक पड़ रही भारी..

 

 

संजय सक्सेना:
कोरोना ने एक बार फिर से पलटी मारी है। पहले खबरें आ रही थीं कि अमरीका, ब्रिटेन, इटली और फ्रांस में कोरोना की दूसरी लहर चल रही है, लेकिन इससे भारत की सरकार सहित यहां के लोग तनिक भी सावधान नहीं हुए। उलटे बिहार में विधानसभा चुनाव सहित कई राज्यों में उपचुनाव भी करा दिए गए। रैलियों पर लगा प्रतिबंध हटा दिया। अचानक फिर से कोरोना बम फट गया। थोड़ी राहत की बात यह कही जा सकती है कि रिकवरी रेट अच्छा है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हम एकदम लापरवाह हो जाएं।
दिल्ली में कोरोना फिर से भीषण रूप ले चुका है। केरल और महाराष्ट्र भी खतरनाक हो चले हैं। बारी मध्यप्रदेश की है। भोपाल में बमुश्किल सौ से आंकड़ा नीचे आया, लेकिन फिर दो सौ और अब तो तीन सौ से ऊपर पहुंच गया। एक दिन चार सौ पच्चीस संक्रमित मिलने की खबर आई। यह सब उपचुनाव और दीवाली के दौरान बरती गई भीषण लापरवाही का परिणाम ही है। अभी और स्थिति बिगड़ सकती है। चुनाव हो गए, तो सरकार ने भी जागने का उपक्रम करना शुरू कर दिया। मुख्यमंत्री ने कोरोना पर बैठक बुलाई, फैसला किया कि प्रदेश में लॉकडाउन नहीं लगेगा, लेकिन 5 शहरों में नाइट कफ्र्यू और पाबंदियां लागू की जाएंगी। इनमें इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, रतलाम और विदिशा शामिल हैं, जहां अचानक मरीज बढऩे लगे हैं। यहां आज से रोजाना रात 10 से सुबह 6 बजे तक नाइट कफ्र्यू रहेगा।
राज्य में 8वीं तक के स्कूल 31 दिसंबर तक बंद रखने का फैसला लिया गया है, जबकि 22 मार्च को पहले लॉकडाउन से ही स्कूल बंद चल रहे हैं। जनवरी में भी स्कूल खुलते हैं या नहीं इस पर निर्णय बाद में होगा। हालांकि 9वीं से 12वीं तक अब भी स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा गाइड लाइन के अनुसार ही चलेंगी। पालक बच्चों को स्कूल भेजने का मन बना ही रहे थे कि अचानक कोरोना वापस तेज हो गया। सो अब बड़े बच्चों को भी स्कूल भेजना मुश्किल ही लग रहा है।
हरियाणा के एक स्कूल में छह दर्जन से अधिक बच्चों के एक साथ संक्रमित होने की खबर ने उन्हें हिला दिया है। सही भी है। जब बड़ी उम्र के लोग ही सावधानी नहीं बरत पा रहे हैं, संक्रमित हो रहेे हैं, तो बच्चों पर बहुत ज्यादा सख्ती कैसे बरती जा सकती है। वेसे प्रदेश में शासकीय और प्राइवेट स्कूल 21 सितंबर से सिर्फ आंशिक रूप से खुलने लगे हैं, हालांकि कक्षाएं नहीं लगाई जा रही हैं। कंटेनमेंट जोन में विद्यालय खोलने की अनुमति नहीं है। साथ ही कंटेनमेंट जोन में निवासरत विद्यार्थियों, शिक्षकों और कर्मचारियों को स्कूल में आने की अनुमति नहीं होगी। बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश पर पूरी तरह से रोक रहेगी। लेकिन अब अभिभावकों का मन बदलने लगा है। परीक्षा हो या न हो, नंबर कितने आते हैँ, यह सोचने के लिए तैयार नहीं।
बाकी मामलों पर नजर डालें तो बाजारों में जिस तरह से भीड़ उमड़ती रही, अब उस पर नियंत्रण जरूरी हो गया है। सरकार के निर्णय के बाद भोपाल के अधिकांश बाजार रात को आठ बजे बंद करने के लिए तैयार हो गए हैं। अब इनमें किसे छूट रहेगी, यह बाद में पता चलेगा। लोग लापरवाही न बरतें, इसलिए मास्क न लगाने पर सख्ती की जा रही है, जुर्माने का प्रावधान तो है, अब वसूला जा रहा है। देखा जाए तो यह सब आम जनता के साथ ही राजनेताओं की भी लापरवाही का परिणाम है। चुनाव के कारण सरकारों ने खूब ढील दे दी। भीड़ भरी सभाओं और रैलियों का आयोजन किया गया। पोलिंग बूथ पर लाइनों में कोई सावधानी नहीं बरती गई। इस बीच पहले दशहरा और फिर दीवाली आ गई। बाजारो में बेतरतीब भीड़ उमड़ पड़ी। जो संगठन अब बाजार बंद करने का निर्णय ले रहे हैं, उन्हीं की शह पर बाजारों में अस्थाई दुकानों का तामझाम बढ़ गया। निकलने तक की जगह नहीं बची। डिस्टेंसिंग का तो मुद्दा पूरी तरह से तहसनहस हो गया। कोरोना को फैलने का मौका मिल गया, जबकि उसका संक्रमण काफी कमजोर पड़ चुका है। हम चीन को गालियां दे रहे हैं, लेकिन उसने चुपचाप वैक्सीन बना भी ली और दस लाख से अधिक लोगों को लगा भी दी। इसमें उसका अनुसरण करने की आवश्यकता है, लेकिन हम लापरवाही की हदें पार करने में लगे हुए हैं। कोरोना किसी को नहीं देख रहा और न किसी का लिहाज कर रहा। रिकवरी रेट अच्छा है, तो मौतों का आंकड़ा भी साथ चल रहा है। अच्छी खासी सेहत वाले लोग काल के गाल में समा रहे हैं। इसलिए, बिना हिचक, सावधानी बरतें और जितना हो सकता है, बचाव करें। किसी भी पैथी की प्रतिरोधक दवाओं का सेवन करें, प्राकृतिक हो तो और बेहतर। बचाव में ही सुरक्षा है।

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