एक्जिट पोल से भाजपा को राहत, सपा-बसपा और कांग्रेस आहत

: सियाराम पांडेय ‘शांत’:-

एक्जिट पोल चुनाव परिणाम नहीं होते। वास्तविक जनादेश नहीं होते लेकिन यह एक अनुमान तो है ही। संभावनाओं का विज्ञापन तो है ही। उसे एक झटके में नकारा नहीं जा सकता। एक्जिट पोल कई तरीके से मीडिया चैनल और सर्वेक्षण एजेंसियों के स्तर पर किए जाते हैं और इसके बाद ही किसी खास मुकाम पर पहुंचा जाता है। यह सच है कि चुनाव पूर्व के आकलन की विश्वसनीयता पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं और आज भी कुछ उसी तरह के हालात हैं। फिर भी पहले कुछ एक्जिट पोल विश्वसनीयता की कसौटी पर खरे उतरे हैं। वैसे तो 11 मार्च के चुनाव नतीजे ही इस बात की तस्दीक करेंगे कि पांच राज्यों में किस दल की सरकार बनेगी। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर थी। कुछ उसी तरह की लहर इस बार भी देखी जा रही है। यह अलग बात है कि इस बार के अंडर करंट को समझ पाने में सपा, बसपा और कांग्रेस सफल नहीं हो पाई है। पंजाब को अपवाद मानें तो मणिपुर, गोवा, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनती नजर आ रही है। भाजपा के पक्ष में नतीजे आने की संभावना मात्र से विपक्ष के कसबल ढीले पड़ गए हैं। उन्हें लगने लगा है कि भाजपा अगर सत्ता में आई तो उनका राजनीतिक भविष्य खतरे में पड़ जाएगा। उनकी योजना किसी भी कीमत पर भाजपा को रोकने की रही है लेकिन उनका समवेत प्रयास भी लगता नहीं कि सफल हुआ है। अखिलेश के बसपा से गठबंधन वाले संभावना राग को कमोवेश इसी रूप में देखा जा सकता है। गौरतलब तो यह भी है कि कुछ चैनल ही ऐसे हैं जो उत्तर प्रदेश में भाजपा की स्पष्ट बहुमत की सरकार बनती बता रहे हैं। बाकी सर्वेक्षण संस्थान और मीडिया चैनल भाजपा को उत्तर प्रदेश में भाजपा को स्पष्ट बहुमत के आंकड़े से दूर बता रहे हैं। कुछ ने तो इस आधार पर भाजपा और बसपा के प्रवक्ताओं से सवाल पूछने भी शुरू कर दिए हैं कि अगर उत्तर प्रदेश में भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता तो क्या वह बसपा से फिर राखी बंधवाएगी। बसपा प्रवक्ता से भी कुछ इसी से मिलते-जुलते सवाल पूछे गए। सपा नेताओं से भी यह जानने की कोशिश हुई कि त्रिशंकु विधानसभा के गठन के हालात में उनका रुख क्या होगा। वे भाजपा को रोकने के लिए क्या बसपा को समर्थन देंगे या बसपा का समर्थन लेंगे। यह सब सवाल तब किए जा रहे हैं जब भाजपा, बसपा और सपा सभी अपने दम पर सरकार बनाने की बात कर रही हैं। सभी को लग रहा है कि एक्जिट पोल और चुनाव नतीजों के बीच चमत्कारी परिवर्तन नजर आएगा और उनका दल ही सरकार बनाएगा। निश्चित रूप से चुनाव पूर्व किए गए ये सर्वेक्षण बेहद उलझाऊ और भ्रम पैदा करने वाले हैं। फिर वही सवाल उठता है कि आकलन की कसौटी पर सभी एक्जिट पोल एकमत नहीं हैं। ऐसे में जनता किसे सही मानें और किसे गलत लेकिन इतना तो तय है कि कहीं न कहीं जनता के रुख को भांपने में चुनाव सर्वेक्षकों से चूक जरूर हुई है। भाजपा के रणनीतिकार पहले ही उत्तर प्रदेश में 260 से अधिक सीटों पर अपनी जीत का दावा कर चुके हैं। सपा के रणनीतिकार घबराए हुए हैं। अखिलेश यादव, आजम खान और रविदास मेहरोत्रा के बयान तो कमोवेश इसी ओर इशारा करते हैं। सपा प्रमुख अखिलेश यादव तो यहां तक कह रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में कोई नहीं चाहेगा कि यहां राष्ट्रपति शासन लगे और भाजपा रिमोट से सरकार चलाए। मतलब उनका इशारा साफ था कि अगर जरूरत पड़ी तो वे बसपा से गठबंधन कर सकते हैं। पहली बात तो उत्तर प्रदेश में भाजपा का कमल अच्छे से खिल रहा है। सपाइयों को भी लगता है कि कांग्रेस से गठबंधन सपा के लिए नुकसानदेह साबित हुआ है। अगर यह कहा जाए कि केदारनाथ मंदिर से विश्वनाथ मंदिर तक हर-हर मोदी वाले हालात रहे हैं और हर जगह भाजपा का कमल प्रमुखता से खिल रहा है , तो गलत नहीं होगा। पांच राज्यों के एक्जिट पोल में मणिपुर, गोवा और उत्तराखंड में भाजपा की क्लियरकट सरकार बनती बताई जा रही है। पंजाब में ऐसा माना जा रहा है कि वहां शिरोमणि अकाली दल और भाजपा गठबंधन की सरकार नहीं बनने जा रही है। पंजाब में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर बताई जा रही है। वैसे भी भाजपा और कांग्रेस कभी नहीं चाहेंगी कि पंजाब में आप सरकार बने। दिल्ली में ही अराजकता का संकट क्या कम है जो पंजाब का भी सिरदर्द झेला जाए। हालिया समीकरण कांग्रेस के पक्ष में बताए जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में दो एक चैनलों को अपवाद मानें तो बाकी सभी भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी तो मान रहे हैं लेकिन बहुत से थोड़ा दूर बता रहे हैं। उनकी मानें तो उत्तर प्रदेश में गठबंधन की सरकार बनेगी। वहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए बुआ और बबुआ एक हो सकते हैं। वैसे लगता नहीं कि बसपा को जितनी सीटें मिलती दिखाई जा रही है, बसपा उतना खराब प्रदर्शन करेगी और अगर ऐसा होता है तो क्या यह माना जाएगा कि बसपा का दलित-मुस्लिम गठजोड़ अपना असर नहीं दिखा पाया है। क्या उत्तर प्रदेश की जनता ने अखिलेश सरकार की खराब विधि-व्यवस्था को स्वीकार कर लिया है और वह यथास्थितिवादी हो गई है। उसने स्थितियों से समझौता करना सीख लिया है। कुछ चैनल तो भाजपा को उत्तर प्रदेश में 270 और 285 सीटें तक दे रहे हैं। खुद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पहले दो चरणों में अपना संघर्ष बसपा से बताते रहे और इसके बाद उन्होंने सपा को अपना मुख्य प्रतिद्वंद्वी मान लिया। बुंदेलखंड और पूर्वांचल दोनों ही जगह बसपा के अपने जबर्दस्त परंपरागत वोट हैं। दोनों ही को अलग राज्य बनाने का मायावती ने राग भी आलापा था लेकिन इसके बाद भी सर्वेक्षण में बसपा की खराब हालत सोचने को विवश तो करती ही है। यह अलग बात है कि इस बार भाजपा ने अति दलितों और अति पिछड़ों को साधने का पूरा प्रयास किया है और इसका लाभ उसे मिल सकता है। गोवा में भाजपा पर जनता दोबारा विश्वास करती नजर आ रही है। गोवा में अरविंद केजरीवाल और राहुल गांधी का जादू चल नहीं पा रहा है तो क्या गोवा में भाजपा के लिए शुभ संकेत की वजह यह तो नहीं है कि भाजपा की ओर से केंद्रीय रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर को गोवा की राजनीति में वापस करने का आश्वासन दिया गया था। रही बात पंजाब की तो वहां भाजपा-अकाली गठबंधन केवल सात से नौ सीटों तक ही सिमट जाएगी, इस पर विश्वास करना जरा मुश्किल है। आम आदमी पार्टी के नेता उत्साहित हैं कि चुनाव नतीजे पंजाब में भी दिल्ली जैसा ही चमत्कार पैदा कर सकते हैं लेकिन जनता इतना तो जानती ही है कि जो पार्टी दिल्ली में कोई काम नहीं कर सकी, वह पंजाब को किस हाल में ले जाएगी। उत्तराखंड में कांग्रेस को जबर्दस्त झटका लगता नजर आ रहा है। भाजपा वहां स्पष्ट बहुमत की सरकार बनाती नजर आ रही है। उत्तराखंड में बसपा के लिए करने को वैसे भी कुछ खास नहीं होता। वह वहां एक दो-सीटों पर ही चमत्कार करती रही है। भाजपा को स्पष्ट बहुमत न मिले, यह उम्मीद तो सपा, बसपा और कांग्रेस सभी कर रहे हैं और स्पष्ट बहुमत न मिलने के आधार पर सभी एकजुट भी होंगे। नानुकर और बात है तथा सत्ता का मोह और कार्रवाई से बचने की अभिलाषा एक बात। हालांकि जैसे कि संकेत मिल रहे हैं, उसके मुताबिक 11 मार्च को उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में भाजपा का कमल खिलना तय है और यह उत्तर प्रदेश के लिए बड़ी उपलब्धि होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की यह बड़ी सफलता होगी। अखिलेश यादव जिस तरह बयानबाजी कर रहे हैं, उसे राजनीतिक परिपक्वता तो नहीं ही कहा जाएगा। सपा और कांग्रेस का गठबंधन कितना टिकाऊ होगा, इसके आसार अभी से नजर आने लगे हैं। चुनाव जीतने के बाद भाजपा को चार राज्यों में एक और परीक्षा देनी है। उसे मुख्यमंत्री का चेहरा तय करना है और इसके लिए लामबंदी अभी से शुरू हो गई है। भाजपा के नेताओं की संघ परिक्रमा शुरू हो गई है। ऐसे में अपने मिजाज का सीएम चेहरा तय करना भाजपा के लिए थोड़ा परेशानी भरा प्रयास तो होगा। इससे उसे आंतरिक असंतोष भी झेलना पड़ सकता है लेकिन भाजपा जल्द ही इस अग्नि परीक्षा को पास कर ले जाएगी, यह उम्मीद तो की ही जानी चाहिए।

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