MP:कागज पर बढ़ते पौधे, जमीन पर घटते जंगल

भोपाल। मप्र में पौधारोपण कारिंदों की कमाई का ऐसा जरिया बन गया है जो हींग लगे ना फिटकरी फिर भी रंग चोखा होय की कहावत को चरितार्थ कर रहा है। प्रदेश में इस वित्तीय वर्ष में 6 करोड़ से अधिक पौधे रोपे जाने के बाद एक बार फिर से 8 करोड़ रूपए रोपने की तैयारी की जा रही है। लेकिन पिछले रोपित पौधों की जमीनी हकीकत बता रही है कि प्रदेश में कागजों पर तो खुब हरियाली है, लेकिन धरती सूनी पड़ी हुई है। 5 माह पहले जिन भू-खंड़ों पर हजारों-लाखों पौधे रोपने का दावा किया गया था वे आज खाली हैं। यह इस बात का संकेत है कि यहां अधिकांश क्षेत्रों में कागजों पर पौधारोपण किया गया है।
पौधारोपण की हकीकत की दूसरी कड़ी में समय जगत ने जब जबलपुर, ग्वालियर, सागर, शहडोल और रीवा संभाग के जिलों की पड़ताल की तो यहां कई चौकाने वाले तथ्य सामने आए। वन विभाग और स्थानीय जिला प्रशासन ने पौधारोपण को केवल कमाई का जरिया बना रखा है।
कागज पर बढ़ते पौधे, जमीन पर घटते जंगल
मप्र में हरियाली महोत्सव के माध्यम से प्रतिवर्ष करोड़ों पौधे लगाने का किया जाता है। विगत 8 जुलाई को प्रदेशभर में सघन पौधारोपण किया गया। हर जिलों पौधारोपण के बड़े-बड़े दावे किए गए, लेकिन हकीकत में वन क्षेत्र लगातार घटते जा रहे हैं। पिछले 10 वर्षो में जितनी जमीन पर जितनी संख्या में पौधारोपण करना बताया गया यदि हकीगत में ऐसा हुआ होता तो मध्यप्रदेश का बड़ा भू-भाग सघन वन क्षेत्र में बदल सकता था लेकिन कागज के आंकडों की जमीन पर सच्चाई अलग ही है। पौधारोपण के ज्यादातर पौधे कभी पेड़ नहीं बन पाते और जो पेड़ है उनकी कटाई लगातार हो रही है।
10 लाख पौधों का रोपण, जमीन पर आधे भी नहीं
सबसे पहले बात करते हैं सागर संभाग की। प्रदेश के अति पिछड़े क्षेत्र बुंदेलखंड के छह जिलों सागर, दमोह, पन्ना, छतरपुर, टीकमगढ़ के अधिकारियों द्वारा करीब 10,38,651 पौधे रोपित करने का दावा किया गया, लेकिन हकीकत में जमीन पर आधे पौधे भी रोपित नहीं किए गए। छतरपुर जिला पंचायत ने पौधों को खरीदकर भले ही ग्राम पंचायतों को दे दिए और ग्राम पंचायतों ने इनका रोपण करा दिया, लेकिन देखभाल के अभाव में कहीं पौधे सूख गए, तो कहीं गायब ही हो गए।
प्राकृतिक सम्पदा की चादर ओढ़े बुंदेलखंड में वन सम्पदा नष्ट होने के कगार पर है। पौधा रोपड़ पर कुल्हाड़ी का वार भारी पड़ रहा है तो वहीं वन माफिया जंगल को दीमक की तरह खोखला कर रहे हैं। इधर शासन प्रशासन द्वारा करोड़ोंं रुपये पौधारोपण के लिए खर्च करने के बाद भी बुंदेलखंड में हरियाली नहीं आ पाई। अलबत्ता पिछले पांच वर्षों में हजारों भारी भरकम पेड़ों को वन विभाग ने खुद कटवा दिया विकास के नाम पर। राष्ट्रीय वन नीति के मुताबिक़ हर जनपद में कम से कम 33 प्रतिशत वन क्षेत्र होना चाहिए लेकिन बुन्देलखण्ड में इस मानक के विपरीत मात्र 7 प्रतिशत ही वन क्षेत्र बचा है।
पौधारोपण स्थलों का दोबारा सर्वे नहीं 
जबलपुर संभाग की बात करें तो इस संभाग के सात जिलों जबलपुर, कटनी, नरसिंहपुर, छिन्दवाड़ा, सिवनी, मंडला, बालाघाट में करीब 62,58,157 पौधे रोपित करने का दावा किया गया था, लेकिन उसके बाद पौधारोपण स्थलों का दोबारा सर्वे नहीं कराया गया। हकीकत यह है कि नर्मदा किनारे हुए पौधों को मारकर दबंगों ने फसल की बोवनी कर दी है। ऐसा एक जगह नहीं बल्कि कई जगह किया गया है। जबकि जुलाई 2017 में हुए पौधारोपण के लिए सभी विभागों की जिम्मेदारी तय की गई थी। लेकिन किसी भी विभाग ने अपनी रिपोर्ट पौधारोपण के बाद तैयार नहीं की। गर्मी के सीजन में पौधों के मर जाने की पुष्टी भी विभागों ने नहीं की है।
कटनी जिले में पौधारोपण कार्य में सरकार द्वारा लाखों रुपए खर्च किए गए थे, लेकिन जिले में मेट, सचिव व सरपंचों की लापरवाही के चलते वृक्षारोपण की सुरक्षा व रख-रखाव की कहानी अधर में लटक कर रह गई। कई स्थानों पर तो सिर्फ कागजों में ही पौधरोपण हो गया है। नर्सरियों में एक भी पौधा देखने को नहीं मिल रहे है। ऐसा ही एक मामला रीठी जनपद क्षेत्र के ग्राम पंचायत कैना का सामने आया है, जहां पर 6 लाख से अधिक रुपए में पौधरोपण हुआ है, लेकिन पौधे का नामो-निशान तक नहीं है। शासन द्वारा वृक्षारोपण के प्रति ग्राम पंचायत में चौकीदार रखने का प्रावधान था, लेकिन न तो वृक्षारोपण की सुरक्षा करते चौकीदार दिखे और न ही सचिव, सरपंचों ने अपनी कर्तव्यपरायणता दिखाई। सरपंच सचिवों की लापरवाही के चलते सरकार का स्वच्छ पर्यावरण का सपना बिखर कर रह गया तो वहीं प्रशानिक अधिकारियों ने भी अपनी नजरअंदाजी का प्रमाण देकर भ्रष्टाचार को सरंक्षण देने में भूमिका निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
आंकड़ों में हरियाली, जमीन पर गड्ढ़े
ग्वालियर संभाग प्रदेश के पांच जिलों ग्वालियर, शिवपुरी, गुना, अशोकनगर, दतिया में 7,57,168 पौधे रोपे गए। लेकिन जब इन जिलों की पड़ताल की गई तो जमीन पर केवल गड्ढ़े ही नजर आ रहे हैं। इस संभाग में तेजी से हरियाली कम हो रही है। अकेले ग्वालियर में पिछले 30 सालों के सरकारी आंकड़े बताते हैं कि शहर में करीब 10 करोड़ से अधिक कीमत के पौधे रोपे जा चुके हैं। इनमें से अधिकतर पौधे शहर की मिट्टी के स्वभाव और पर्यावरणीय जरूरतों के विपरीत रोपे गए। सूत्र बताते हैं कि अधिकतर पौधे महंगी कीमतों पर दूसरे शहरों से खरीदे गए। लेकिन शहर अब भी ठंंडी छांव के लिए तरस रहा है। खास बात यह है कि पौधरोपण और उद्यान विकास में लगे विभाग को इसका पता तक नहीं है कि वैज्ञानिकों ने ग्वालियर शहर के लिए 30 प्रकार के पौधे/वृक्ष अनुशंसित किए हैं, जिनके रोपने से आबोहवा संतुलित बनेगी।
कागजों में सिमटा पौधारोपण
सरकार भले ही करोड़ों रुपए खर्च कर पौधरोपण कराने का ढिंढोरा पीटे लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि रीवा संभाग के जिलों रीवा, सिंगरौली, सीधी और सतना में पौधारोपण कागजों में ही सिमटा हुआ है। संभाग में सरकारी दावों के अनुसार, 8,77,461 पौधे रोपे गए, लेकिन लाखों की संख्या में पौधारोपण करने के बाद भी न तो जंगलों में और न ही शहरों में सरकार द्वारा लगाए गए पौधारोपण के नतीजे कहीं नजर नहीं आते। ऐसे में यह माना जा रहा है कि हर वर्ष करोड़ों रुपए खर्च कर लगाए जाने वाले पौधे सुरक्षा न होने के चलते गायब हो जाते हैं या फिर यह पौधे कागजों में रोपे जाते हैं। यदि किसी निष्पक्ष एजेंसी से रीवा, सीधी, सतना, सिंगरौली में पिछले वर्षों में किए गए पौधारोपण का हिसाब किताब लिया जाए तो करोड़ों का घोटाला सामने आएगा। सूत्रों की मानें तो रीवा, सीधी, सतना एवं सिंगरौली में लगाए जाने वाले पौधों में कुछ जगह जमकर भ्रष्टाचार किया गया है। बताया गया है कि वन विभाग द्वारा पौधारोपण की जिम्मेदारी निभा रहे मैदानी कर्मचारी मौके पर पौधारोपण तो नहीं किए अलबत्ता कागजों में पौधारोपण कर उसकी राशि डकार गए। यह कोई एक जिले का मामला नहीं है, इस तरह के भ्रष्टाचार रीवा, सीधी, सतना एवं सिंगरौली में कई स्थानों पर किए गए हैं। पौधारोपण मेंं किए गए भ्रष्टाचार की अगर बारीकी से जांच की जाए तो अरबों रुपए का घोटाला उजागर होगा।

पौधे लगाकर भूल गए, दोबारा पलटकर नहीं देखा

शहडोल संभाग के चार जिलों शहडोल, उमरिया, डिंडोरी, अनूपपुर में 22,42,302 पौधे रोपे गए। पौधों का रोपण करने वाले विभागों ने 2 जुलाई के बाद पौधों को दोबारा नहीं देखा। पहले दिन तो बाकायदा गड्ढों से लेकर पौधों तक को गिना गया और कागज में रिपोर्ट भी बनी। उसके बाद पांच महीना गुजर गया, लेकिन दोबारा मॉनीटरिंग नहीं हुई। ऐसे में प्रदेश में वन क्षेत्र बढ़ाने का यह अभियान कागजों पर ही सिमट कर रह गया है।

 

 

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