‘हिंदुत्व जीने का तरीका’ वाला फैसला गलत, पलटने की जरूरत: मनमोहन सिंह

सुप्रीम कोर्ट के दिवंगत जज, जस्टिस जे.एस. वर्मा द्वारा 1990 के दशक में दिए गए फैसले ‘हिंदुत्व जीने का तरीका’ को दोषयुक्त बताते हुए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मंगलवार को कहा कि एक संस्थान के रूप में न्यायपालिका को, संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना की हिफाजत करने के प्राथमिक कर्तव्य की अपनी दृष्टि नहीं खोनी चाहिए.

दिवंगत कम्युनिस्ट नेता ए.बी. बर्धन स्मृति व्याख्यान में पूर्व पीएम मनमोहन सिंह ने कहा कि यह काम पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है, क्योंकि राजनीतिक विवादों और चुनावी लड़ाइयों को धार्मिक रंगों, प्रतीकों, मित्थकों और पूर्वाग्रहों के साथ व्यापक रूप से घालमेल किया जा रहा है.

पूर्व प्रधानमंत्री ने यह कहते हुए न्यायमूर्ति वर्मा के फैसले की आलोचना की कि इसने एक तरह से एक प्रकार की संवैधानिक पवित्रता को नुकसान पहुंचाया, जो देश की राजनीतिक बातचीत में बोम्मई फैसले के जरिए बहाल हुई थी, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय की नौ सदस्यीय पीठ ने यह व्यवस्था दी थी कि धर्मनिरपेक्षता, संविधान का एक बुनियादी ढांचा है.

मनमोहन ने कहा कि जस्टिस वर्मा के फैसले का गणराज्य में धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों एवं प्रथाओं के बारे में राजनीतिक दलों के बीच जारी बहस पर एक निर्णायक असर डाला है.

सिंह ने कहा, इस फैसले ने हमारी राजनीतिक बातचीत को कुछ असंतुलित कर दिया, और कई लोग मानते हैं कि निस्संदेह इस फैसले को पलटने की जरूरत है.

उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों की सजगता और बौद्धिक क्षमताओं के बावजूद कोई भी संवैधानिक व्यवस्था सिर्फ न्यायपालिका द्वारा संरक्षित नहीं की जा सकती है. अंतिम तौर पर संविधान और इसकी धर्मनिरपेक्ष प्रतिबद्धताओं के संरक्षण की जिम्मेदारी राजनीतिक नेतृत्व, नागरिक समाज, धार्मिक नेताओं और प्रबुद्ध वर्ग की है.

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