हनी ट्रैपः जांच पर पर्दा डालने की तैयारी

प्रमोद भार्गव:
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल और आर्थिक राजधानी इंदौर से जुड़े हाई-प्रोफाइल हनी ट्रैप मामले में एक के बाद एक एसआईटी प्रमुख बदले जाने से यह आशंका बढ़ रही है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ की सरकार इस मामले पर पर्दा डालने की तैयारी में है। इस मामले में एनजीओ से जुड़ी पांच महिलाओं द्वारा ब्लैकमेलिंग के जरिए प्रभावशाली लोगों को फंसाने के मामले का पर्दाफाश हुआ था। इसमें फिलहाल पांच महिलाओं के साथ एक व्यक्ति की गिरफ्तारी हुई है। मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल का गठन सरकार द्वारा किया गया था। इसके प्रमुख श्रीनिवास वर्मा बनाए गए थे, लेकिन 24 घंटे के भीतर ही उनसे यह जिम्मेवारी वापस लेकर संजीव शामी को सौंप दी गई। वे ठीक से मामले को समझ पाते इससे पहले यह जांच आईपीएस राजेंद्र कुमार के सुपुर्द कर दी गई। बार-बार एसआईटी प्रमुख बदले जाने को लेकर इस मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग उठने लगी है। हाईकोर्ट की इंदौर शाखा ने नाराजगी जताते हुए मध्य-प्रदेश के गृह विभाग के प्रमुख सचिव को नोटिस देकर दो सप्ताह के भीतर शपथ-पत्र के मार्फत जानकारी मांगी है। साफ है, दाल में कुछ काला है।
दरअसल, इस मामले में भोपाल के सामाजिक कार्यकर्ता शिरीष मिश्रा ने अधिवक्ता निधि वोहरा के माध्यम से याचिका दायर कर मामले में कुछ बड़े नेताओं, अधिकारियों और रसूखदारों के शामिल होने और सबूतों के साथ छेड़छाड़ की शंका जताई है। इस मामले में कांग्रेस और भाजपा के कई मंत्रीस्तरीय नेता और बड़ी संख्या में आईएएस, आईपीएस व आईएफएस अधिकारी शामिल बताए जा रहे हैं। इन्हीं महिलाओं द्वारा इन लोगों के साथ बनाए गए कई अश्लील वीडियो कुछ समय से वायरल होकर असलियत तो सामने लाते रहे, लेकिन मामले में कानूनी कार्यवाही तब की गई, जब इंदौर नगर निगम के अभियंता हरभजन सिंह ने इन महिलाओं द्वारा ब्लैकमेलिंग किए जाने की रिपोर्ट दर्ज कराई। हरभजन से दो करोड़ रुपये मांगे जा रहे थे। गिरफ्तार लोगों के पास से 14.17 लाख रुपये नगद बरामद किए गए हैं। खबर तो यहां तक आ रही है कि हनी ट्रैप में लिप्त लड़कियां कमलनाथ सरकार को अस्थिर करने का षड्यंत्र भी रच रही थीं। एटीएस के सूत्र बताते हैं कि खुफिया तंत्र के पास ऐसी सूचनाएं थीं कि ये कांग्रेस के सात विधायकों को अपने रूप-जाल में फंसाकर सरकार गिराने की साजिश में लगी थीं। इनकी सरगना सागर की श्वेता विजय जैन है। जो एक पूर्व मुख्यमंत्री के इशारे पर काम कर रही थी। पूर्व मुख्यमंत्री का भी वीडियो वायरल हो चुका है। उनकी कुछ समय पहले मृत्यु हो चुकी है। हालांकि प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा है कि ‘किसी एक मामले की जांच में हफ्तेभर में तीन अधिकारियों का बदला जाना इस बात का संकेत है कि सरकार कुछ छिपाना चाहती है? सरकार जिसके भी नाम हैं, उजागर करे? इस रहस्य का पर्दाफाश हो जाने से संदेह खत्म हो जाएगा और जो वास्तविक दोषी हैं, उन पर कार्यवाही का रास्ता खुल जाएगा।’
कई राजनेता, आला अधिकारी और सरकारी सामग्री की आपूर्ति में लगे बड़े व्यापारी इन महिलाओं के भंवरजाल में गुंथे हुए हैं। बरामद वीडियो क्लीपिंग्स की शुरूआती जांच और महिलाओं से की गई पूछताछ से पता चला है कि इनके निशाने पर कई नेता, अधिकारी एवं कारोबारी थे। इनमें से 40 लोगों को हनी ट्रैप कर ब्लैकमेल किया जा चुका है। इनमें दो पूर्व मुख्यमंत्री, दो वर्तमान मंत्री, तीन पूर्व मंत्री, एक पूर्व सांसद, 15 आईएएस और आठ आईपीएस के साथ कुछ बड़े व्यापारी इस षड्यंत्र का हिस्सा हैं। खुलासे से पता चलता है कि सत्ता में बैठे लोगों के चरित्र का किस हद तक पतन हो चुका है। हनी ट्रैप का मतलब है कि जैसे कोई मक्खी शहद के लालच में उसका रस चूसने बैठ तो जाती है, लेकिन शहद पीकर उड़ नहीं पाती है। इन काम-कन्याओं का भी यही हश्र हुआ है।
यदि किसी राज्य के मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक और उच्चाधिकारियों को कुछ लड़कियां अपने रूप-जाल में फंसा लें और फिर उनको ब्लैकमेल तो करें, अपने एनजीओ- संस्थान के लिए गैर-कानूनी तरीके से आर्थिक हित भी साध लें तो नीति व कानून की पालना कैसे होगी? लोकहित कैसे सधेंगे? यदि हनी ट्रैप के जरिये किसी निर्वाचित सरकार को विपक्ष ही षड्यंत्रपूर्वक गिराने की तरकीब मानने लग जाए, तो संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अर्थ ही क्या रह जाएगा? लिहाजा अब जरूरी हो गया है कि व्यक्ति की अकादमिक योग्यता के साथ-साथ उसके चरित्र का परीक्षण भी जरूरी किया जाए। यदि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के चारित्रिक पतन का कोई मामला सामने आता है तो उस पर कठोर दंडात्मक कार्यवाही होनी चाहिए। इसीलिए प्राचीन भारत में धन से कहीं ज्यादा महत्व चरित्रवान व्यक्ति और आदर्श मूल्यों का था। देश की आजादी की लड़ाई लड़ने वाले अनेक लोगों ने स्वतंत्रता के लिए अपनी पूरी संपत्ति दान कर दी थी।
इस मामले के सामने आने के बाद आरोपी महिलाओं के एनजीओ के साथ प्रदेश के सभी एनजीओ की जांच होनी चाहिए। मध्यप्रदेश में 87,000 पंजीकृत एनजीओ हैं। इनमें से 27,000 ही क्रियाशील हैं। इनमें से कई के दस्तावेजों में पते गलत हैं। ऐसे वे एनजीओ हैं, जो शैक्षिक छात्रवृत्तियों से जुड़े हैं। कई संगठनों ने नियमानुसार रजिस्ट्रार फार्म एंड सोसायटी दफ्तर में ऑडिट रिपोर्ट भी जमा नहीं कराई है। 13 मई 2015 को मध्यप्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त ने प्रदेश के मुख्य सचिव को निर्देश दिए थे कि जिन एनजीओ को शासन से अनुदान मिलता है, उनकी जानकारी विभाग की वेबसाइट पर प्रसारित की जाए। 50 हजार रुपये से ज्यादा की सहायता मिलने वाले एनजीओ को सूचना के अधिकार के दायरे में भी अनिवार्य रूप से लाया जाए। लेकिन इस पर अमल नहीं हुआ। हकीकत तो यह है कि एनजीओ के नाम पर पूरे देश में धन की बर्बादी हो रही है। इनका काम जनसेवा का आवरण ओढ़कर व्यक्तिगत आर्थिक लालसाओं की पूर्ति करना है। एनजीओ के संचालक इस संगठन का उपयोग एक ऐसे सेतु के रूप में करते हैं, जिसके जरिये नेताओं और अधिकारियों से संपर्क साधकर सरकारी योजनाओं का आर्थिक दोहन आसानी से कर लिया जाए। कई आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अधिकारियों की पत्नियां भी एनजीओ की मालिक बनी बैठी हैं। इसीलिए एनजीओ के मनमाने ढंग पर नीतिगत अंकुश लगाना मुश्किल हो रहा है। सेवानिवृत्ति के बाद आला अफसर भी इन्हीं एनजीओ की गतिविधियों से जुड़ जाते हैं। विडंबना है कि एनजीओ किसी बुनियादी काम की बजाय सर्वेक्षण, कौशल प्रशिक्षण और कथित जागरूकता अभियानों से जुड़े होते हैं। इनका कोई बुनियादी महत्व नहीं है। यही वे लोग हैं, जो मामले पर पर्दा डाले रखना चाहते हैं।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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