सत्ता से बाहर होकर सबसे ज्यादा नुकसान में रहे अखिलेश !

लखनऊ, 11 मार्च । विधानसभा चुनाव के परिणाम के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रदेश मुख्यालय में जहां होली और दीवाली एक साथ मनायी गई। वहीं सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी (सपा) से लेकर उसके गठबन्धन के दल कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के कार्यालयों में सन्नाटा पसरा हुआ है। ये चुनाव जितना इन राजनैतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण था, उससे कहीं ज्यादा इस चुनाव की कमान संभालने वाले उनके नेताओं की प्रतिष्ठा दांव पर लगी थी। इनमें चुनावी महासमर में पार्टी की कमान संभालने वाले अखिलेश यादव की बात करें तो उन्हें बेहद बुरी तरह सत्ता से बेदखल होना पड़ा है। अखिलेश ने यह चुनाव अपने चेहरे, अपनी रणनीति और अपने काम के दम पर लड़ा था। पूरे चुनाव उनकी पार्टी की ओर से ‘काम बोलता है’ का प्रचार किया गया। अखिलेश अपने नये साथी राहुल गांधी से दोस्ती को भी न सिर्फ सही ठहराते बल्कि इसे दो कुनबों के बजाए दो युवाओं का साथ कहते रहे। उनकी ओर से हमेशा यही कहा गया कि सपा अकेले ही पूर्ण बहुमत की सरकार बना रही थी, लेकिन कांग्रेस के साथ आने से अब इस ताकत में और इजाफा होगा हालांकि 11 मार्च को परिणाम आने से पहले-पहले उन्हें अपने सिंहासन के डोलने का आभास हो गया था। शायद यही वजह थी कि उन्होंने बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में बसपा से हाथ मिलाने जैसा ससनसनीखेज बयान दे डाला। अखिलेश भाजपा को सत्ता में आने से रोकने से लिए किसी के भी साथ जाने को तैयार थे, लेकिन उसी भाजपा ने उन्हें ऐसा धक्का दिया है कि सत्ता पक्ष में बैठने वाली समाजवादी पार्टी अब विपक्ष की कुर्सियां पर भी गिनती की शक्ल में दिखायी देगी। जैसा ही पहले ही उम्मीद की जा रही कि इसके बाद अखिलेश यादव पर बाहर से कहीं ज्यादा अन्दर से हमले होंगे, वैसा होना शुरू भी हो गया है। उनके चाचा और पार्टी के वरिष्ठ नेता शिवपाल यादव ने कहा है कि यह समाजवादियों की हार नहीं, घमण्ड की हार है। उन्होंने कहा कि नेताजी को हटाया गया और हमारा अपमान किया गया। उन्होंने पार्टी की हारपर कहा कि यह जनता का निर्णय है, स्वीकार करना ही होगा। हार की समीक्षा की जायेगी। गौरतलब है कि सपा में अखिलेश राज के बाद से शिवपाल हाशिये पर चल रहे हैं। पहली बार ऐसा हुआ कि सपा सरकार रहते हुए शिवपाल को बिना लालबत्ती के भी रहना पड़ा और चुनाव में वह केवल अपनी विधानसभा तक सीमित रहे। यहां तक की टिकट वितरण में भी उनकी एक नहीं चली। वहीं अभी तक पार्टी संरक्षक मुलायम सिंह यादव का कोई बयान नहीं आया है। मुलायम खुद अखिलेश के सबसे बड़े आलोचक हो सकते हैं, क्योंकि वह शुरूआत से ही कहते रहे हैं कि गठबन्धन सपा के लिए नहीं कांग्रेस के लिए फायदेमन्द रहा है। राजनैतिक विश्लेषक हिन्दुस्थान समाचार से बातचीत में कहते हैं कि इसके अलावा टिकट कटने पर दूसरे दलों में जाने वाले पुराने सपाई भी अब अखिलेश यादव पर हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ेंगे। इतना ही नहीं प्रो. रामगोपाल सरीखे नेता भी इनके निशाने पर होंगे। वहीं अखिलेश यादव की बात करें तो उन्होंने पार्टी में मची महाभारत के दौरान यह बयान दिया कि वह केवल तीन महीने के लिए अधिकार मांग रहे हैं। इसके बाद वह सब कुछ वापस कर देंगे। ऐसे में अब सवाल उठा रहा है कि विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद क्या अखिलेश वास्तव में राष्ट्रीय अध्यक्ष पद अपने पिता मुलायम सिंह यादव को सौंप देंगे या फिर इस पर कब्जा जमाये रखेंगे। यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि बीते दिनों ही उनकी सौतेली मां साधना यादव ने बयान दिया था कि अखिलेश ने चुनाव के बाद नेताजी को सबकुछ लौटाने की बात कही थी। इसलिए उसे ऐसा करना चाहिए। वहीं अगर यूपी की सियासत पर नजर डालें तो यहां एक मुख्यमंत्री को लगातार दूसरा कार्यकाल मिलना सम्भव नहीं हो सका है। प्रदेश में अभी तक के मुख्यमंत्रियों की बात करें तो सबसे पहले गोविंद वल्लभ पन्त सूबे के सीएम बने। इसके बाद क्रमशः सम्पूर्णानन्द, चन्द्रभानु गुप्ता, सुचेता कृपलानी, चन्द्रभानु गुप्ता, चौधरी चरण सिंह, चन्द्रभानु गुप्ता, चौधरी चरण सिंह, त्रिभुवन नारायण सिंह, कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नन्दन बहुगुणा, नारायण दत्त तिवारी, राम नरेश यादव, बनारसी दास, विश्वनाथ प्रताप सिंह, श्रीपति मिश्र, नारायण दत्त तिवारी, वीर बहादुर सिंह, नारायण दत्त तिवारी, मुलायम सिंह यादव, कल्याण सिंह, मुलायम सिंह यादव, मायावती, राष्ट्रपति शासन, मायावती, कल्याण सिंह, रामप्रकाश गुप्त, राजनाथ सिंह, मायावती, मुलायम सिंह यादव, मायावती, अखिलेश यादव मुख्यमंत्री हुए। इस बार सपा की ओर से नया इतिहास रचने का दावा किया जा रहा था, लेकिन सूबे की जनता ने अपनी पुरानी आदत का ही पालन किया और भाजपा का सत्ता से वनवास खत्म करते हुए उसे सरकार बनाने का मौका दिया। 

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