राइट टू प्राइवेसी पूर्ण अधिकार नहीं, इस पर कंट्रोल किया जा सकता है-सुप्रीम कोर्ट

 

नई दिल्ली. प्राइवेसी को फंडामेंटल राइट माना जाना चाहिए या नहीं, इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच ने सुनवाई शुरू कर दी है। बेंच ने बुधवार को कहा कि राइट टू प्राइवेसी ऐब्सलूट राइट (पूर्ण अधिकार) नहीं है। राज्य वाजिब वजह होने पर इसको कंट्रोल कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि बच्चे को जन्म देना तो राइट टू प्राइवेसी के दायरे में रखा जा सकता है, लेकिन पैरेंट्स ये नहीं कह सकते कि सरकार ये तय नहीं कर सकती कि बच्चा स्कूल जाएगा या नहीं। कोर्ट ने कहा कि राइट टू प्राइवेसी का मतलब ये नहीं है कि इसमें ऐब्सलूट राइट है। इसमें डाटा प्रोटेक्शन और राइट टू प्राइवेसी के इश्यू शामिल हैं। कोर्ट के मुताबिक- राइट टू प्राइवेसी का मतलब हर केस में अलग होता है। इस मामले में सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी।
चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने केंद्र से कहा कि हमें ये जानने में मदद करें कि राइट टू प्राइवेसी की ऐसी कौन सी रूपरेखा और परखने का दायरा है, जिसके आधार पर राइट टू प्राइवेसी की सीमाओं और उसके उल्लंघन को सरकार ने परखा हो।
कोर्ट ने कहा, “हम डाटा के युग में रह रहे हैं और राज्य को ये अधिकार है कि क्राइम के खिलाफ कानून, टैक्सेशन और दूसरे कामों के लिए इस डाटा का इस्तेमाल कर सके।’
बता दें कि सरकार की योजनाओं को आधार से जोड़ने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 22 पीटीशंस दायर हैं। चुनौती का ग्राउंड प्राइवेसी के हक को खत्म किया जाना है।
सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की कॉन्स्टीट्यूशनल बेंच ने इन पर सुनवाई के दौरान जानना चाहा कि प्राइवेसी फंडामेंटल राइट है या नहीं। यह तय करने के लिए 9 जजों की कॉन्स्टीट्यूशनल बेंच बनाई गई है। मामले की सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी।

राइट टू प्राइवेसी को पूर्ण ना मानने की वजह क्या?
कोर्ट ने कहा- राइट टू प्राइवेसी को इसलिए पूर्ण नहीं माना जा सकता क्योंकि अगर ऐसा हो जाता है तो राज्य कानून भी नहीं बना सकेगा और इसे रेग्युलेट नहीं कर सकेगा। अगर कोई बैंक से लोन मांगता तो वो वहां ये नहीं कह सकता कि वो जानकारी नहीं देगा क्योंकि ये जानकारी उसके निजता के अधिकार का उल्लंघन होगी।
कोर्ट ने कहा- बेडरूम आपके प्राइवेसी के दायरे में हो सकता है लेकिन बच्चा किस स्कूल में जाएगा? ये तो आपकी च्वॉइस का मामला हुआ।
सीनियर वकील गोपाल सुब्रमण्यम एक पिटीशनर की तरफ से कोर्ट में पेश हुए। उन्होंने कहा- राइट टू प्राइवेसी समानता और स्वतंत्रता का मामला है और ये सबसे महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार है। ये नैचुरल राइट भी है, इसकी इजाजत हमें संविधान भी देता है। इसमें राज्य दखल नहीं दे सकता। स्वतंत्रता के बिना समानता का अनुभव कोई कैसे कर सकता है?

सरकार की दलील- प्राइवेसी का हक फंडामेंटल राइट नहीं

सीनियर एडवोकेट गोपाल सुब्रमण्यम ने सुनवाई की शुरुआत की। उन्होंने चीफ जस्टिस जेएस खेहर की अगुआई वाली बेंच से कहा कि जिंदगी और आजादी का हक पहले से ही नेचुरल राइट्स में शामिल हैं।
नो जजाें की इस बेंच में चीफ जस्टिस के अलावा जस्टिस जे. चेलामेश्वर, एसए बोबडे, आरके अग्रवाल, आरएफ नरीमन, एएम सप्रे, डीवाय चंद्रचूड़, संजय किशन कौल और एसए नजीर शामिल हैं।
बता दें कि चीफ जस्टिस की अगुआई वाली पांच जजों की कॉन्स्टीट्यूशनल बेंच ने मंगलवार को करीब एक घंटे सभी पक्षों की दलीलें सुनीं। इसके बाद तय किया कि आधार से जुड़े प्राइवेसी के मामले पर पहले सुनवाई होनी चाहिए।
दरअसल, आधार के लिए बायोमेट्रिक रिकॉर्ड लिए जाने को पिटीशनर प्राइवेसी के लिए खतरा बता रहे हैं। उधर, सरकार की दलील है कि प्राइवेसी का हक फंडामेंटल राइट है ही नहीं।

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