भ्रष्टाचार को लेकर सामने क्यों नहीं आ रहा  सरकार का पारदर्शी चरित्र

 

 

 

भोपाल 08 सितम्बर । प्रदेश कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता श्री के.के. मिश्रा प्रदेश में भाजपा शासन के 13 साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भ्रष्टाचार को लेकर मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह के माथे पर दिखाई दे रहीं चिंता की लकीरें और अधिकारी, कर्मचारियों को इसे लेकर ‘उल्टा टांगने’ जैसी अमर्यादित शब्दावली को अनुसंधान का विषय बताते हुए कहा है कि आखिरकार क्या कारण है कि भ्रष्टाचार को लेकर सरकार और उसके मुखिया का पारदर्शी चरित्र सामने क्यों नहीं आ पा रहा है? यही नहीं छोटी मछलियों को जाल में जकड़ने पर वाहवाही लूटने वाली सरकार महाभ्रष्टाचार करने वाले बड़े मगरमच्छों पर मेहरबान क्यों है? मुख्यमंत्री को उनके द्वारा बार-बार उपयोग में लाये जा रहे ‘उल्टा टांगने’ के मंतव्य को भी परिभाषित करना चाहिए।

श्री मिश्रा ने कहा है कि विडम्बना है कि शिवराज सरकार कांग्रेस पार्टी के सहयोग से बहुप्रचारित ‘‘भ्रष्टाचार विरोधी अधिनियम-2011’’ पारित करवा पायी थी, जिसे अध्यादेश के रूप में ग्रहित किया गया, क्या मुख्यमंत्री जी बतायेंगे कि इस अध्यादेश के लागू होने के बाद प्रदेश में घोटालों, घपलों और भ्रष्टाचार मंे कितनी कमी आई, कितने बड़े मगरमच्छ इस अध्यादेश की जद में आये, कितनों को सजा हुई, इस अध्यादेश के बाद एनसीआरबी की रिपोर्ट में मप्र भ्रष्टाचार को लेकर दूसरे अव्वल दर्जे पर स्थापित कैसे और क्यों हुआ, भ्रष्टाचार को कानून से शासित करने वाली एजेंसी लोकायुक्त संगठन के तत्कालीन मुखिया श्री पी.पी. नावलेकर ने मुख्यमंत्री सहित 22 अन्य काबीना मंत्रियों के विरूद्व दर्ज प्राथमिकी को जांचांेपरांत क्लीनचिट कैसे दे दी, प्रदेश के बड़े प्रमुख महाघोटालों व्यापमं, सिंहस्थ, डीमेट, डम्पर, रेत, शौचालय निर्माण, मनरेगा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, एनआरएचएम, नकली खाद-बीज, गेहूं खरीदी, बांध निर्माण, बुंदेलखंड पैकेज, स्टाप डेम, माईक्रो इरिगेशन, फसल बीमा, वृक्षारोपण, बिजली खरीदी-बिक्री, प्याज, धान, तुअर दाल घोटालों सहित 157 अन्य घपलों-घोटालों को अंजाम देने वाले महत्वपूर्ण किरदारों को आज तक ‘उल्टा लटकाने’ की परिधि से परे रख संरक्षण किसने और क्यों दिया?

श्री मिश्रा ने प्रदेश में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ मुख्यमंत्री के प्रचारित ‘जीरो टालरेंस’ अभियान पर भी तंज कसते हुए कहा है कि राजधानी भोपाल में भाजपा शासित निगम परिषद के दौरान 200 करोड़ रूपयों के डीजल घोटाले को उजागर करने वाली तत्कालीन निगमायुक्त श्रीमती छवि भारद्वाज का स्थानांतरण क्यों, किसलिए और किसके दबाव में किया गया, जबकि विभागीय मंत्री श्रीमती मायासिंह उन्हें ईमानदार अधिकारी संबोधित कर रही हैं और नगरीय प्रशासन आयुक्त के कथनानुसार ‘‘हम चाहते थे कि छवि का स्थानांतरण नहीं हो’’, यह शासन का निर्णय है। लिहाजा, मुख्यमंत्री यह सार्वजनिक करें कि मंत्री और आयुक्त, नगरीय प्रशासन के स्पष्ट कथनों के बाद छवि के स्थानांतरण को लेकर सरकार की संदिग्ध व कलंकित हो रही छवि का जिम्मेदार कौन है, क्या भ्रष्टाचार को लेकर ‘जीरो टालरेंस’ में सरकार का यहीं चरित्र परिभाषित है? उन्होंने भ्रष्टाचार के मामले में ‘जीरो टालरेंस’ की नीति पर अमल करते हुए प्रदेश की जिलों की जाने वाली ग्रेडिंग को भी एक भद्दा मजाक बताते हुए कहा कि भ्रष्टाचार को लेकर जिस प्रदेश की ग्रेडिंवग पूरे देश में दूसरे नंबर पर हो वहां जिलों की ग्रेडिंग का मायना ही क्या है?

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