भारत में रहता तो यह पुरस्कार नहीं जीत पाता:नोबेल विजेता बनर्जी

 

 

जयपुर. अर्थशास्त्र का नोबेल जीतने वाले अभिजीत बनर्जी रविवार को जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में पहुंचे। अभिजीत ने कहा कि अगर वे भारत में होते तो नोबेल पुरस्कार हासिल नहीं कर पाते। उन्होंने कहा कि भारत में टैलेंट की कमी नहीं है, लेकिन बेहतर सपोर्ट सिस्टम न होने की वजह से बहुत सारी कोशिशें कामयाब नहीं हो पाती हैं।

भारतीय-अमेरिकी अर्थशास्त्री बनर्जी ने कहा, “मैं भारत में रहता तो नोबेल पुरस्कार नहीं जीत पाता। इसका मतलब यह नहीं है कि देश में अच्छी प्रतिभाएं नहीं हैं, लेकिन एक व्यवस्थित सिस्टम का होना भी जरूरी है। अकेले व्यक्ति के लिए यह उपलब्धि हासिल करना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि जिस काम के लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला, उसमें दूसरे लोगों का भी बहुत बड़ा योगदान है।”

बनर्जी ने कहा- 2 महीनों से भारत की अर्थव्यवस्था में कुछ अच्छे संकेत दिखाई दे रहे हैं। मैं यह नहीं कह सकता कि यह कब तक जारी रहेंगे, क्योंकि नये आंकड़ों का आना निरंतर जारी है। ऐसा नहीं लगता कि हम जल्द इस समस्या से बाहर निकल पाएंगे। इसमें लंबा वक्त लगेगा। हमारे पास अभी इतने रुपए नहीं हैं, जिससे अर्थव्यवस्था सुधार सकें। हम बैंकिंग सेक्टर में पैसा लगा सकें। अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए धीरे-धीरे कई चीजों पर काम करने की जरूरत है।

– उन्होंने कहा, “भारत में पिछले 30 साल में गरीबी में उल्लेखनीय कमी आई है। 1990 में 40% लोग गरीब थे, जो अब घटकर 20% से कम रह गए हैं। जनसंख्या बढ़ने के लिहाज से यह गरीब लोगों की संख्या में बड़ी कमी है। जो बहुत गरीब हैं, उन्हें सब्सिडी देना कोई गलत बात नहीं है। कुछ सब्सिडी गरीबों के लिए हैं और कुछ औरों के लिए। इसमें भ्रम को कम करना जरूरी है।

– “विपक्ष किसी भी लोकतंत्र का दिल होता है। सत्ताधारी पार्टी को भी अच्छे विपक्ष की जरूरत होती है। अच्छा विपक्ष न हो तो सरकार पर प्रेशर नहीं होता। अभी विपक्ष बिखरा हुआ है। उसके बहुत सारे हिस्से हैं। पता नहीं, कौन सा हिस्सा कब और किसके साथ जुड़ जाए। एक स्थिर विपक्ष होने से जो दबाव सरकार पर बनना चाहिए, वह नहीं बन पाया है।

– अभिजीत ने कहा- मैं आरबीआई गर्वनर नहीं बन सकता। इसके लिए माइक्रो इकोनॉमिस्ट होना जरूरी है और मैं इससे दूर रहा हूं। ऐसा नहीं होता कि माइक्रो इकोनॉमिक्स न जानने वाले व्यक्ति को गर्वनर बनाया जाए।

– उत्तर प्रदेश में अपने एक कैंपेन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा- हमनें लोगों से धर्म और जाति के आधार पर वोट न डालने की अपील की थी। कैंपेन में हमारी कोशिश यह थी कि लोग विकास और दूसरे जरूरी मुद्दों को ध्यान में रखकर वोट डालें।

बच्चों की पढ़ाई से जुड़े एक सवाल पर नोबेल विजेता ने कहा- बच्चों को हर सब्जेक्ट समझ में नहीं आता। उन्हें वही सब्जेक्ट समझ में आता है, जिसमें उनका इंटरेस्ट होता है। ऐसे में उन्हें वही पढ़ाया जाना चाहिए। चौथी क्लास के बच्चे को सोशल स्टडी पढ़ा रहे हैं और बच्चे का इंटरेस्ट इतनी ज्यादा रीडिंग में नहीं है तो यह उसके लिए दूसरी भाषा की फिल्म देखने जैसा होगा।

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