भगवान के नाम अनेक है, पर ईश्वर एक है- मोरारी बापू

भोपाल। चैत्र नवरात्र की पावन बेला में लाल परेड स्थित मोतीलाल नेहरू स्टेडियम में राम कथा के दूसरे दिन बुधवार को अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त संत मोरारी बापू ने कहा कि इस कलिकाल में कोई तारनहार है, तो वह है हरि का नाम। इसे किसी भी रूप में जपो। भगवान के नाम अनेक है, पर ईश्वर है एक ही।
गुरू और भगवान का नाम ही तारनहार
उन्होंने भोज नगरी में अपनी व्यास पीठ से भगवान के अवतारों के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि भगवान विष्णु के अब तक नौ अवतार हुए हैं। उनकी मान्यता है कि विष्णु का दसवां अवतार सदगुरू के रूप में ही है। अब तक कई गुरू आ चुके हैं, आगे भी आते रहेंगे। पिछले हर अवतार में कोई न कोई कमी थी, पर सदगुरू में हर अवतार का समावेश है। संत बापू ने कहा कि कलिकाल में गुरू और भगवान का नाम ही तारनहार हैं।
खुश रहने के बताए सरल उपाय
भास्कर परिवार द्वारा आयोजित राम कथा का श्रवण करने दूसरे दिन भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। कथा का रसास्वादन करने वालों में महिलाओं व युवाओं की भी खासी संख्या थी। संतश्री बापू ने राम कथा के माध्यम से खुश रहते हुए जीवन को सार्थक बनाने के कई सरल उपाय बताए। उन्होंने कहा कि कल्कि अवतार पर वे कुछ नहीं कहेंगे, पर इतनी उनकी मान्यता और विश्वास है कि दसवां अवतार सद गुरू के रूप में हुआ यह माना जाना चाहिए। जगत को सत्य, प्रेम व करूणा का मार्ग दिखाने गुरू सामने आते रहे हैं, अभी हैं भी और आगे भी आते रहेंगे।
गुरु कभी बेवफा नहीं हो सकता
संत बापू ने कहा कि भगवान के पिछले मत्स्य, कच्छप, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण आदि अवतार हुए। इनमें कोई न कोई कमी अवश्य थी, लेकिन सदगुरू अवतार ही ऐसा है, जिसमें कोई कमी नहीं। इसमें भगवान के सभी अवतारों का समावेश है। उन्होंने कहा कि गुरू कभी बेवफा नहीं हो सकता। वह छल नहीं करता। गुरू पथ प्रदर्शक होकर हमारी जीवन की राहों को ज्ञान के प्रकाश से आलोकित करता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में हम रामचरित मानस को सदगुरू मान सकते हैं। सिख धर्म के लोगों ने अपने गुरुओं की वाणी को समाहित करने वाले ग्रंथ को गुरू ग्रंथ माना है। गुरू गगन से भी विशाल होता है।
पुरुषार्थ करें…
उन्होंने विष्णु को श्रमधर्मा बताते हुए कहा कि वे जगत पिता है। जगत के पालनहार के रूप में उन्हें अधिक श्रम करना होता है। श्रम अर्थात अपने कर्तव्य का अच्छी तरह निर्वहन करना धर्म पालन है। श्रम को जो अपना स्वभाव बना लेते है, वे नर से नारायण बनने की ओर बढ़ने लगते हैं। संत कबीर ने भी कहा है कि कुछ उद्यम कीजे। अर्थ साफ है कि पुरुषार्थ करें।
स्वयं को ऐसे भी कर सकते हैं पवित्र
उन्होंने श्रृद्धालुओं की शंका व जिज्ञासाओं का समाधान भी किया। उन्होंने एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि अगर कोई अस्वस्थता या किसी अन्य विवशता की वजह से स्नान नहीं कर सके, तो वह तुलसी की मिट्टी को अपने शीश से स्पर्श करा दे, तो वह स्वयं को पवित्र मान कर पूजा-पाठ या नाम जाप कर सकता है। उन्होंने कहा कि मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जो बात उनसे कहीं, वह उन्हें अच्छी लगी। वे पांच साल से छोटी कन्याओं के पांव जल से धोकर उस जल का स्वयं पर छिड़काव कर स्वयं को पवित्र कर लेते हैं।
बताई तीन युगों की परंपरा…
कथा के दौरान मोरारी बापू ने सतयुग, द्वापर और कलयुग की परंपराओं का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि, सतयुग में ध्यान और द्वापर में पूजा-अर्चना का विशेष महत्व होता था। इसी तरह कलयुग में भगवान के नामों का विशेष महत्व है। एक चौपाई के माध्यम से बापू ने बताया कि कलयुग में भगवान का नाम लेने भर से जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है।
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