बाल यौन शोषण पर कानूनी निष्क्रियता

रामकृष्ण जायसवाल:
मानो ऐसा लग रहा है जैसे देश बाल यौन दुर्व्यवहार में अपना नाम शीर्ष पर पहुंचाना चाह रहा हो। ऐसा लगता है कि असामाजिक कृत्यों में राज्यों में अग्रणी बनने की होड़-सी लग गयी हो। न कानून का डर, न मौत का भय। कानूनी रास्ते इस अत्याचार को रोकने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। इसका खामियाजा बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। इस मसले पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी चिंता जाहिर करते हुए टिप्पणी की है कि लगता है, अपराधियों में कानून का डर नहीं रहा। जिसके कारण भयावह तस्वीर सामने आ रही है। वर्ष 2016 में लगभग 16,863 मामले दर्ज किए गए हैं, साथ ही इस साल छह महीने में ही 24,212 एफआईआर दर्ज हो चुकी है।
बाल शोषण आधुनिक समाज का विकृत और खौफनाक सच्चाई बन चुका है। दरअसल बच्चों का समूह समाज का सबसे असुरक्षित तबका बन गया है। उनका लालन-पालन ऐसे माहौल में होता है जहां वे अपने आसपास के लोगों पर, जिन्हें वे घर और स्कूल में देखते हैं, भरोसा करने लगते हैं। विश्वास का यही रिश्ता यौन अनाचार करने वालों के लिए रास्ते खोल देता है और मासूम बच्चे इसका शिकार होते हैं। अपराधियों में कानून का डर भी नहीं होता। इसकी मुख्य वजह कानूनी प्रक्रिया का लम्बा खिंचना है। इसीलिए अपराधी भी चिंतामुक्त होकर ऐसे घिनौने अपराध करते रहते हैं। सरकार इस मामले में कमर कस रही है लेकिन कोई खास सुधार नजर नहीं आ रहा है। त्वरित न्याय के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाया गया लेकिन हालात में कोई सुधार नहीं हो सका। यहां तक कि रिपोर्ट के इतर भी बच्चे शिकार होते है जो वे बताते नहीं इसलिए मात्र रिपोर्ट की संख्या देखकर ही अनुमान लगाना सही नहीं है। नेशनल एकेडमी ऑफ साइकोलॉजी की 2013 की रपट कहती है कि लगभग 70 फीसदी बच्चे यौन शोषण की जानकारी नहीं देते तथा 93 फीसदी यौन शोषित बच्चियां ग्रामीण इलाकों की है। साथ ही 20 फीसदी बच्चे गंभीर यौन उत्पीड़न के शिकार होते हैं।
वहीं राज्य स्तरीय विश्लेषण के तौर पर देखा जाए तो नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की 2016 की रपट के अनुसार बाल यौन शोषण में उत्तर प्रदेश सबसे अग्रणी है, वहीं दूसरे स्थान पर महाराष्ट्र है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक 65 प्रतिशत बच्चे स्कूलों में यौन शोषण के शिकार होते हैं। बारह से कम आयु के 41.7 प्रतिशत बच्चे यौन उत्पीड़न से जूझ रहे हैं। सरकार ने बच्चों से यौन अपराध करने वालों के लिए अब फांसी की सजा का कानून बना दिया है, जिसमें पोर्नोग्राफी, बाल पोर्नोग्राफी पर प्रतिबंध लगाने के प्रावधान किए गए हैं। यौन उत्पीड़न के मामलों में सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का निर्माण करने की जल्द से जल्द मंजूरी दे दी गई है, जिसमें पाक्सो कानून से संबंधित मामले की सुनवाई होगी।
गौर करने वाली बात यह है कि क्या न्यायिक निष्क्रियता के होते हुए अपराधों पर लगाम लगाई जा सकती है? क्योंकि न्याय की लगातार धीमी रफ्तार देखी गई है। न्याय में देरी का प्रमुख कारण अदालतों में जजों, अधिकारियों और पुलिस की संख्या में भारी कमी के रूप में देखी जाती है। संयुक्त राष्ट्र के मानक के मुताबिक जहां 454 लोगों पर एक पुलिस अधिकारी होना चाहिए, वहीं 514 लोगों पर एक ही पुलिस अधिकारी है। भारत के गृह मंत्रालय में 2016 के आंकड़े के मुताबिक 10 लाख लोगों में लिए 19 जज हैं। जबकि संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक ये संख्या 50 होनी चाहिए। अतः सर्वप्रथम न्यायिक सक्रियता बनाए रखने के लिए समस्त खाली पड़े पदों पर अधिकारियों को मुस्तैद करना पड़ेगा। निश्चित ही सरकार अपने स्तर पर प्रयास कर रही है लेकिन यह प्रयास जन मानस में दिखना भी जरूरी है।
साथ ही समाज भी इस अपराध का जिम्मेदार है क्योंकि समाज का प्रथम कर्तव्य यह है कि वह बच्चों को ऐसी शिक्षा दे जिससे वे अपनी मनोदशा और अच्छे-बुरे पहलुओं के बारे में घर-परिवार को बता सके। उन्हें शिक्षित करना पड़ेगा कि गुड टच और बैड टच क्या है। इतना कार्य तो समाज को करना ही चाहिए। अन्यथा बच्चे यौनाचार के शिकार होंगे लेकिन उसे घर-परिवार में बताएंगे नहीं और अपराधी समाज में निडर होकर घिनौने अपराध को अंजाम देता रहेगा। इसलिए अपने बच्चों को इतना जागरूक करना माता-पिता का धर्म है कि वे अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकें।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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