प्रधानमंत्री जी जिद छोड़िये और देश को संभालिये

प्रधानमंत्री जी जिद छोड़िये और देश को संभालिये

श्रीगोपाल गुप्ता:

दुनिया का बड़े से बड़ा डाॅक्टर, वैध या हकीम गंभीर से गंभीर रोग से त्रस्त उस मरीज को ठीक नहीं कर सकता जो खुद को मरीज ही न मानते हो! ठीक भी है जब आप बीमार होते हुये भी खुद को बीमार ही नहीं मानते तो इलाज किस बीमारी का किया जाय? यही स्थिति वर्तमान दौर में देश की आर्थिक स्थिति की है! तमाम एजेंसीज देश की जीडीपी के लगातार गिरने की और भविष्य में और गिरने की घोषड़ाएं कर रही हैं! समूचा विपक्ष और काॅपरेट यूनियन व घराने सरकार को देश को तेजी से जकड़ती जा रही आर्थिक मंदी से चेताना का काम कर रहे हैं! देश की लगातार छठवीं तिमाही के आंकड़े देश की आर्थिक मंदी की बदहाली की कहानी जुबानी दे रहे हैं! मगर सरकार है कि मानने के लिए तैयार ही नहीं है कि देश आहिस्ता-आहिस्ता आर्थिक मंदी के जाल में गहराई से फंसता जा रहा है! हालात यह हैं कि सरकार को चेताने और कटघरे में खड़ा करने वाले तमाम स्त्रोतों को नकारते हुये हाॅसिये पर डालने का काम सरकार के ही मंत्री बड़ी सफाई और चतुराई से कर रहे हैं! आज से दो महिने पूर्व जब देश के आॅटो मोबाइल्स सेक्टर के धड़ाम होने की और जब विपक्ष और देश के तमाम अर्थशास्त्रियों ने सरकार का ध्यान खींचा तो वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आॅटो मोबाइल्स सेक्टर की मंदी और गिरती हुई स्थिति को यह कहकर खारीज कर दिया कि लोगों ने उबर टैक्सियों का इस्तेमाल ज्यादा कर दिया है इसलिए वाहनों की बिक्री में कमी आई है! हालांकि उन्होने अपने कुतुर्कों में मालवाहक वाहनों की बिक्री में तेजी से आई गिरावट कुछ बोलने से परहेज किया! देश के कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने तो दो कदम आगे बढ़ते हुये फिल्म का ही उदाहरण सामने रख मंदी का मजाक ही उड़ा दिया! उनका कहना था कि मुंबई में लाॅंच हुई एक हिन्दी फिल्म ने 120 करोड़ कमा लिये, कहां हैं मंदी? इन मंत्रियों को पहले यूपीऐ -2 के कांग्रेस मंत्रियों के बयानों को भी परखने लेना चाहिए! जब बढ़ती मॅंहगाई पर तात्कालिन वित्त मंत्री पी चिंदबरम कह रहे थे कि रोज देश में लाखों लोग 20 रुपये की पानी की बोतल खरीदकर पी रहे हैं तो कहां है मॅंहगाई है? और कांग्रेस सांसद राज बब्बर दलील दे रहे थे कि मुंबई में मात्र 10 रुपये में लोग भरपेट खाना खा रहे हैं! आज चिंदबरम तिहाड़ जेल में हैं और राज बब्बर जी तब से अब तक कोई चुनाव नहीं जीत पाये! राजनीतिकों और देश के सियासत दानों को यह याद रखना चाहिए कि जनता की वैचारिकता पर कसा गया गया कोई भी फितरा उन्हें गुमनामी के अंधेरे में धकेल सकता है!

अभी तक विपक्ष और अर्थशास्त्री ही सरकार को घेरने और चेताने का काम कर रहे थे! मगर शनिवार को देश के ग्रहमंत्री, रेल मंत्री व वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण के समक्ष ही एक कार्यक्रम में देश के ख्यातिप्राप्त उधोगपति राहुल बजाज ने आर्थिक संकट पर यह कहकर सरकार पर बंम फोड़ दिया कि इस समय उधोग जगत को सरकार के खिलाफ कुछ भी बोलने में डर लगता है! सरकार समझ लेना चाहिए कि ये केवल बजाज का ही दर्द बयां करना नहीं है, जबकि ये देश के सकल उधोग जगत दर्द है और यही कारण है कि बायोकाॅन की चेयरपर्सन किरण मजूमदार शा ने भी बजाज के समर्थन में ट्यूट कर सरकार को अंधेरे से बाहर आने की सलाह दे दी! हालांकि बजाज के बयान के बाद सन्नाटे में आये सरकार मंत्रियों में ग्रहमंत्री अमित शाह ने मामलों को समाप्त करने के उद्देश्य से बजाज और देश के उधोगपतियों को न डरने की सलाह देते हुये बेहिचक अपनी बात कहने की सलाह दी और यह भी कहा कि सरकार अपनी आलोचनाओं से सबक लेगी और डर के माहोल को सुधारने के लिए कदम उठायेगी! मगर कई मर्तबा फिसली श्रीमती निर्मला सीतारमण ने बजाज के बयान यह कह कहते हुये उनके और व्यापार जगत के डर को बढ़ा दिया कि खुद की सोच के प्रचार से राष्ट्रीय हित का नुकसान हो सकता है? यह कर उन्होने बजाज की समस्या का समाधान तो अपृतु नहीं किया बल्कि सरकार के खिलाफ कुछ भी बोलने के डर को जरुर परभाषित कर दिया! अब यह सच होता दिख रहा है कि कि देश की लड़खड़ा रही जीडीपी धरा पर आने के लिए पर आने के लिए बैचेन है लगातार छह तिमाही के आंकड़े इसके गवाह हैं! लगातार देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने वाले लगभग सभी सेक्टर बीमारी की और अग्रसर हैं, बैरोजगारी, बाजारों में खरीददारी पिछले कई दशकों के आंकड़ों का धवस्त कर नये रिकाॅर्ड बनाने को आतुर हैं! लगातार छंटनी के कारण जाती नोकरी और नये रोजगार सृजन न होने और पाकेट में से लगातार घटते रुपयों के कारण भारतीयों के हाथ से बाजार छूटते जा रहे हैं! ऐसे में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चाहिए कि हकीकत को स्वीकार कर जिद छोड़ देनी चाहिए और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के प्रयास करने चाहिये! यह मान लेने से कि मैं बीमार हूं या मेरा देश बीमार है तो इलाज संभव है! प्रधानमंत्री को चाहिये कि वे भारतीय लोकतंत्र की उस खूबसूरती का उपयोग करें जिसका समय-समय पर उनके पूर्वर्तियों ने किया था! देश के संकट के समय पंडित नेहरु लोहिया जैसे अपने कट्टर आलोचक तो इंदिरा जी माननीय अटल जी तो अटल जी भी विरोधी दल की नेता सोनिया गांधी को बुलाकर और उनके साथ बैठकर गंभीथ से गंभीर समस्या हल करते थे! आज विश्व विख्यात अर्थ शास्त्री व पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, अर्थशास्त्री एंव भाजपा के ही सांसद सुब्रह्मण्य स्वामी सहित कई उच्च कोटी और विख्यात अर्थशास्त्री देश में मौजूद हैं, उन्हें बुलाकर इस आर्थिक मंदी का हल निकाला जा सकता है! मगर इसकी एकमात्र शर्त यह है कि प्रधानमंत्री जिद छोड़ें और यह मान लें की देश आर्थिक मंदी की बीमारी से बीमार है !

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