प्रक्षेपण सफल होने तक अटकी रहीं पूरी टीम की सांसें : डॉ. राव

भोपाल, 04 मार्च । एक ही रॉकेट से एक बार में 104 उपग्रह प्रक्षेपित करने में मिली सफलता इसरो की टीम की कुछ नया और अलग करने की चाहत का परिणाम थी। लेकिन जब तक यह महत्वाकांक्षी अभियान सफल नहीं हो गया, तब तक इससे जुड़ी पूरी टीम की सांसें अटकी रहीं। यह बात भोपाल में इसरो के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एसवीसी कामेश्वर राव ने कही। भोपाल विज्ञान मेले के शुभारंभ के अवसर पर शुक्रवार को राजधानी आए डॉ. कामेश्वर राव ने एक बार में 104 सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजने के अभियान की सफलता की कहानी मीडिया से साझा की। डॉ. राव ने कहा कि चार साल पहले तक पीएसएलवी रॉकेट क्षमता अधिक नहीं थी और इससे सीमित वजन के उपग्रह ही अंतरिक्ष में ले जाए जा सकते थे। इसके चलते प्रक्षेपण अभियानों की लागत अधिक आती थी। इसे लेकर जब भी इसरो की बोर्ड मीटिंग होती थी, वैज्ञानिकों पर कुछ नया और अलग करने का प्रेशर होता था। बोर्ड हम लोगों से कुछ ऐसा करने की उम्मीद करता था, जिसकी धमक सारी दुनिया में महसूस की जाए। हम सभी ने बोर्ड की बात को गंभीरता से लेते हुए कुछ अलग करने की ठानी। बस, नया और अलग करने की इसी चाहत और उम्मीदों के दबाव ने हमें इस अभियान में सफलता दिला दी। डॉ. राव ने बताया कि इस अभियान के दौरान उपग्रहों का वजन कम रखना एक चुनौती था, लेकिन वैज्ञानिकों की टीम ने नैनो सैटेलाइट बनाकर इसमें सफलता हासिल की। उन्होंने बताया कि पहले अंतरिक्ष में उपग्रह भेजना काफी खर्चीला होता था, इसलिए अनुसंधानों की गति धीमी रही। अब हम जैसे-जैसे तकनीकी रूप से मजबूत हो रहे हैं, लागत घटती जा रही है। मंगलयान अभियान का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि इस अभियान पर करीब छह रुपये प्रति किलोमीटर खर्च आया था। अब वैज्ञानिक इस खर्च को आधा यानी तीन रुपये प्रति किलोमीटर करने पर काम कर रही है।

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