चुनाव परिणाम के बाद छिन सकता है बसपा से राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा

लखनऊ, 11 मार्च । उत्तर प्रदेश में आए चुनाव परिणाम ने बसपा के लिए एक नई मुसीबत पैदा कर दी है। ऐसे परिणामों से उनकी पार्टी का राष्ट्रीय दर्जा भी छिन सकता है। पार्टी 2014 से लगातार निर्वाचन आयोग से राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा न छिनने की मोहलत मांगती रही है लेकिन वोट प्रतिशत में आई कमी ने बसपा की चिन्ता बढ़ा दी है। बसपा को 1997 में निर्वाचन आयोग की तरफ से राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला था। उस समय यूपी के अलावा उत्तराखंड, बिहार और दिल्ली में भी पार्टी के वोट प्रतिशत में बढ़ोत्तरी दर्ज हुई थी। 2012 में सत्ता विरोधी लहर के चलते सत्ता से बेदखल हुई मायावती से उनकी बची-खुची जमीन 2014 के लोकसभा चुनावों ने छीन ली। लोकसभा चुनाव में खाता न खोलने वाली बसपा को हरियाणा और महाराष्ट्र, दिल्ली व बिहार आदि प्रदेशों में हुए विधानसभ चुनाव में भी एक भी सीट नहीं मिली। लगातार हार का सामना कर रही बसपा के लिए इस बार देश के तीन राज्यों यूपी, उत्तराखंड और पंजाब से काफी उम्मींद थी। लेकिन 2017 के आए परिणाम ने इसमें पानी फेर दिया है। एक समय राज्य की 117 सदस्यीय विधानसभा में बसपा के 9 विधायक हुआ करते थे लेकिन 1997 में जहां पार्टी के वोट शेयर में कमी दर्ज हुई वहीं पार्टी के खाते में सिर्फ एक सीट ही आई। इसके बाद से बसपा का कोई सदस्य विधानसभा नहीं पहुंच पाया। पंजाब में पार्टी के पास कोई तेजतर्रार नेता न होने की वजह से यहां पर लगातार कमजोर हुई है। पंजाब में बसपा 64 सीटों पर चुनावी मैदान में है। वहीं उत्तराखंड में वैसे चुनावों में प्राप्त वोटों के प्रतिशत के लिहाज से बसपा राज्य में हमेशा ही तीसरी ताकत के रूप में अपनी मौजूदगी दर्ज कराती रही है। एक समय तो राज्य की 70 सदस्यीय विधानसभा में उसके 8 विधायक हुआ करते थे लेकिन पिछले चुनावों में महज 3 विधायक चुने जाने की वजह से इस बार यहां पर भी बसपा के लिए कुछ खास नहीं दिख रहा है। चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे के लिए किसी भी पार्टी को चार प्रदेशों में कम से कम छह फीसदी वोट या तीन चौथाई लोकसभा सीटों पर कम से कम दो फीसदी वोट मिलने चाहिए। इसके अलावा चार राज्यों में राज्य पार्टी के तौर पर उसकी मान्यता होनी चाहिए। बिहार चुनाव में बीएसपी को राष्ट्रीय पार्टी बने रहने के लिए आठ फीसदी वोटों की दरकार थी, जबकि उसे दो फीसदी के आस-पास ही वोट मिले। तीन राज्यों के नतीजे अपेक्षित न आने के बाद सिंबल्स आर्डर 1968 के तहत अगर बीएसपी का राष्ट्रीय पार्टी होने का दर्जा छिनता है तो पूरे देश में एक ही सिंबल पर चुनाव लडने का अधिकार भी नहीं रहेगा। ऐसे में बीएसपी उन राज्यों में ही हाथी सिंबल पर चुनाव लड़ पाएगी जहां उसकी मान्यता राज्य की पार्टी के रूप में होगी।

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