कौन खेलेगा होली, कौन कहेगा हो ली

सियाराम पांडेय ‘शांत’:-

भारत उत्सवधर्मी समाज है। वह प्रसन्न रहने का एक भी मौका अपने हाथ से जाने नहीं देता। होली तो वैसे सभी मनाते हैं और मनाना भी चाहिए लेकिन सुख के क्षणों में होली मनाने का मजा ही कुछ और है। उमंग और उल्लास का यह बेजोड़ त्यौहार है जिसमें सभी सबरंग हो जाते हैं। रंग में ऐसे सराबोर हो जाते हैं कि व्यक्ति की पहचान खो जाती है। व्यक्ति आनंदमय हो जाता है और आनंद व्यक्तिमय। आनंद जीवंत मूर्तिमान होकर नाचता है। पूरी प्रकृति ही आनंद से झूम उठती है। वातावरण में नवस्फूर्ति का संचार होे जाता है लेकिन इस बार की होली जरा अलग है। वह सामाजिक ही नहीं, राजनीतिक भी हो गई है। सामाजिक होली में हानि-लाभ गौण होता है जबकि राजनीतिक होली में ऐसा संभव नहीं है। होली चुनाव के ठीक बाद पड़ रही है। चुनाव नतीजे भी होली से दो दिन पहले ही आ रहे हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों और उनके समर्थकों पर चुनावी हार-जीत की भांग न चढ़े, ऐसा कैसे कहा जा सकता है। चुनाव नतीजों को लेकर राजनीतिक दल उत्साहित तो हैं ही लेकिन अनेक राजनीतिक दलों के उल्लास पर एक्जिट पोल ने पानी फेर दिया है। वे असमंजस में हैं। उन्हे इस बात का भय सताने लगा है कि अगर यह एक्जिट पोल सही हो जाता है तो वे होली कैसे मनाएंगे। किस मुंह से मनाएंगेे। उनकी तोे होली काली हो जाएगी। जो जीतेगा, उसकी बम-बम हो जाएगी। एक्जिट पोल मेें चार राज्यों उत्तर प्रदेश, गोवा, मणिपुर और उत्तराखंड में भाजपा की बम-बम हो गई है। भाजपाइयों नेे एक्जिट पोल के आधार पर इस बार शानदार केसरिया होली खेलने का मन बनाया हुआ है। भाजपाइयों की नजर ईवीएम के खुलने और मतगणना के नतीजे आनेे पर है। पुराने जमाने में भी शगुन मनाए जाते थे। माता कौशल्या ने भी मुंडेर पर बैठे कौए से भी मंगल सूचना लाने की कामना की थी। ‘ बैठी सगुन मनावति माता। कब अइहैं मोरे बाल कुंवर घर कहहुं काग फुरि बाता।’ इक्कीसवीं सदी के शहर भले ही अब इस तरह के टोटकों में यकीन नहीं करते हों लेकिन गांव-देहात में अभी भी इस तरह की चीजों को महत्व दिया जाता है। वहां लोग दिमाग से नहीं, दिल से सोचते हैं। चुनाव में ऐसे ही दिल वालों का अहम रोल होता है। इसमें संदेह नहीं कि होली का त्यौहार शुरू हो चुका है। रंगभरी एकादशी पर पूरे उत्तर प्रदेश में होली खेली गई। मंदिरों में तोे होली का मंजर दिखा ही, काशी के मणिकर्णिका घाट स्थित श्मशान मेें भी हुरियारों ने चिता भस्म के साथ होली खेली। असल होली तो 13 मार्च को है और चुनाव नतीजे 11 को आ रहे हैं। 11 शुभ अंक है। एकता का अंक हैं। शगुन का अंक है। नीति कहती है कि ‘दो एक एकादश हुए किसने नहीं देखे सुने। हां शून्य के भी योेग से हैं अंक होतेे दस गुने।’ भारत भूमि में तो शून्य भी सुख देता है। यह यहां की सकारात्मकता ही है जो हम भारतवासियों कोे मजबूती प्रदान करती है। इस लिहाज से देखा जाए तो 11 मार्च उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश के पांच राज्यों को नई दिशा देगा। होलिका दहन के बाद बसंतोत्सव बनाया जाता है। मतलब पुराने संवत्सर की विदाई औैर नए संवत्सर का स्वागत। 13 की होली भी नए नवसंवत्सर और नई सरकार के स्वागत में मनाई जाएगी, इसमेें रंचमात्र भी संदेह नहीं है। एक्जिट पोल ने राजनीतिक दलों को आईना दिखा दिया है लेकिन अभी वे मानने को तैयार नहीं है। राहुल गांधी ने भी कहा है कि बिहार की तर्ज पर ही एक्जिट पोल को आईना दिखाएगा उत्तर प्रदेश। सपा के प्रमुख रणनीतिकार रामगोपाल यादव को भी लगता है कि एक्जिट पोल चैनलोें के दबाव में बनाए गए हैं। उनकी पार्टी बेेहतर प्रदर्शन करेगी और आजम खान तो पूरे बावन हाथ के निकले। उनके मुताबिक उत्तर प्रदेश में 380 सीटें अकेले सपा जीतेगी। शेष सीटों पर अन्य दलों के बीच जीत-हार होगी। ‘खुश रहने को गालिब खयाल अच्छा है।’ अगर सपा के पक्ष मेें इतना ही बेहतर माहौल है तो अखिलेश यादव कांग्रेस के बाद अब सपा की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाने की ओर सोच ही कैसे रहे हैं। इसका मतलब साफ है कि भाजपा को रोकने के लिए अखिलेश कुछ भी कर सकते हैं। यह अलग बात है कि मायावती भी इस मसले पर कुछ खास बोेल पाने की स्थिति में नहीं हैं। उनका मानना है कि अभी वे नतीजों का इंतजार कर रही हैं। इसके बाद ही वे आगे की रणनीति पर विचार करेंगी। फौरी तौर पर देखा जाए तो एक्जिट पोल और रीयल पोल में फर्क होता है। एक्जिट पोल सच तो नहीं होते लेकिन उससे कुछ नजदीक, कुछ दूर जरूर होते हैं। छह में से तीन चैनलों का मानना है कि भाजपा की उत्तर प्रदेश में सरकार बन रही है। भाजपा के लोग भी कुछ ऐसे ही दावे कर रहे हैं। चुनाव की गहरी समझ रखने वालों और भाजपाइयों की मानें तो उत्तर काशी से काशी तक, केदारनाथ से विश्वनाथ तक हर-हर मोदी, घर-घर मोदी की ही गूंज सुनाई दे रही है। हर छोटे-छोटे मुद्दे पर प्रेस कांफ्रेंस करने वाली मायावती अगर एक्जिट पोल के मुद्दे पर मौन हैं, कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रही हैं तो इसका मतलब साफ है कि उन्हें तूफान पूर्व की शांति का अहसास हो गया है। उनका दलित-मुस्लिम समीकरण उतना कारगर नहीं रहा जितनी उन्हें अपेक्षा थी। अति दलितों के बीच सेंध लगाने में भाजपा बहुत हद तक कामयाब रही है। भाजपा के प्रति दलितों के रुझान की एक वजह यह भी रही है कि मुस्लिमों और दलितों के बीच भेदभाव की एक बड़ी लक्ष्मण रेखा है। बहुत सारे मुसलमान हैं जो दलितों को पसंद नहीं करते। मुसलमानों में जो दलित हैं, उनकी हालत तो और भी खराब है। ऐसे में दलितों का बसपा से बिदकना बहुत हद तक स्वाभाविक भी था। केर-बेर के संबंध ज्यादा तोे टिकते नहीं। कमोवेश यही हाल अति पिछड़ों का भी रहा है। नरेंद्र मोेदी और अमित शाह की स्ट्रैटजी का बहुत अहम हिस्सा रहे हैं अति पिछडे मतदाता। भासपा और अपना दल से गठबंधन कर भाजपा ने अति पिछड़ों को जोड़ने को जो काम किया है, एक्जिट पोल उसका असर दिखाते नजर आ रहे हैं। मुस्लिम मत भी सपा और बसपा के बीच बंट गए हैं जबकि संभव है कि तीन तलाक पर समर्थन का स्टैंड भाजपा के लिए कुछ हद तक लाभकारी साबित हुआ हो। मुस्लिम महिलाओं की सहानुभूति का लाभ भाजपा को मिल सकता है। मुलायम परिवार की अंतर्कलह से इस बार यादव मतदाताओं का भी आत्मविश्वास डिगा हुआ है। उन्होंने अखिलेश यादव का तो साथ दिया है लेकिन जिन सीटों पर सपा प्रत्याशी कमजोर स्थिति में था, वहां यादव मतदाता भाजपा की ओर गया है क्योंकि मायावती की नजर में यादवों की स्थिति आज भी गंुडोें से अधिक नहीं है। इसका लाभ भी भाजपा को मिलना तय है। इतने सारे कारणों को जान-समझकर भी अगर सभी राजनीतिक दल खुद को जीता मान रहे हैं तो इसे उनकी खुशफहमी नहीं तो और क्या कहा जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में हुई ताबड़तोड़ रैलियों से भी भाजपा के पक्ष में माहौल बना है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि दो दिन के लड़कों ने प्रधानमंत्री को गली-गली दौड़ा दिया। यह उनकी अपनी सोच हो सकती है। लेकिन प्रधानमंत्री की प्रथम प्रतिबद्धता देश है और दूसरी पार्टी। उन्हें लगता है कि वे आज जिस मुकाम पर हैं, यह उनकी अपनी पार्टी की देन है। ऐसे में अगर वे अपने दल को आगे बढ़ाना चाहते हैं तो इसमें आपत्ति क्या है। वैसे तो एक्जिट पोल के बाद से ही सपा, बसपा और कांग्रेस के कार्यालयों पर मुर्देनी सी छाई हुई है और भाजपा कार्यालय पर रौनके बहार है। देखना होगा कि 11 और 13 मार्च भाजपा के लिए कैसा रहता है। होली केसरिया होगी या अन्य रंग की, यह तो चुनाव नतीजे ही तय करेंगे। नतीजों का भाजपा के पक्ष में आना यह साबित करेगा कि सपा परिवार में लट्ठ चलेगी या शांतिपूर्ण मंथन होगा। कांग्रेस औैर सपा के गठबंधन का भविष्य भी बहुत कुछ इसी चुनाव नतीजे पर आश्रित होगा। बसपा के भविष्य का भी निर्धारण करेगा यह चुनाव। इसलिए सभी राजनीतिक दलों के लिए मौजूदा चुनाव परिणाम इंतजारकारी रहेगा। सभी के दिल की धड़कनें बढ़ी-चढ़ी है। जनता की अदालत में किसे सजा मिलेगी, यह देखने वाली बात होगी। तीन दलों का उत्तर प्रदेश में वनवास खत्म होना है और सपा का नवीनीकरण होना है। जनता फैसला कर चुकी है। नतीजे आने हैं। देखना है कि कौन कहता है हो ली। होली मतलब अब राजनीति हो ली। यह चुनाव कई कीर्तिमान स्थापित करेगा, इसमें संदेह नहीं है। राजनतिक दलों के लिए आज की रात अंतिम भी है और भारी भी। शनिवार का सूरज उनकी जिंदगी में कुछ खास लाएगा। (लेखक- हिन्दुस्थान समाचार से जुड़े हैं)\

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