असंतुलित उर्वरकों से बीमार हो रही धरती – राधा मोहन सिंह

भोपाल। नए भारत और नए मध्यप्रदेश की ओर कदम बढ़ाने संबंधित विविध आयामों पर मंथन के लिए नईदुनिया-नवदुनिया फोरम में केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह कृषि संकट पर अपनी बात रखी। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि हम अपने इतिहास को देख लें, जब देश गुलाम था और महात्मा गांधी के नेतृत्व में हम आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे। तब वे कहते थे कि हिंदुस्तान की आत्मा गांव में बसती है। उन्होंने सोचा कि आजादी मिलने से हम एक साल पहले अं‍तरिम सरकार बनाएं, ताकि समझ मिले कि आजादी के बाद हम देश का संचालन किस तरह करेंगे। इसीलिए एक साल पहले 1946 में अंतरिम सरकार बनी, तो गांधीजी ने डॉ. राजेंद्र सिंह को पहला कृषि मंत्री बनाया जो गांव में किसानों के बीच रहे।

 

उन्होंने कहा कि देश में औद्योगिक क्रांति हुई, लेकिन कृषि के लिए उस समय ऐसा कुछ नहीं हुआ। हम पहले दूसरे देशों से अनाज मांगते थे। बचपन में हम पाउडर से दूध बनाकर पीते थे। लाल बहादुर शास्त्री ने नारा दिया ‘जय जवान-जय किसान’। तब किसानों को लगा कि कोई ऐसा प्रधानमंत्री आया है, जो हम पर ध्यान दे रहा है। इसके बाद हरित क्रांति हुई, लेकिन इसके साइड इफेक्ट पर किसी का ध्यान नहीं था। सूखा पड़ने से कई किसान मुश्किल में आ गए थे। इसको लेकर किसानों के लिए कुछ रिफॉर्म हुए।

बकौल राधामोहन सिंह, दुनिया के तमाम देशों को संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि स्वाइल हेल्थ (मिट्टी की सेहत) का ध्यान रखें। आज स्वाइल हेल्थ कार्ड की बात कही जा रही है। हम इस पर काम कर रहे हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि हमने 2 साल में 10 करोड़ 70 लाख किसानों के स्वाइल हेल्थ कार्ड बनाए गए। प्रधानमंत्री की विशेष रूचि के चलते देश में 10,000 से ज्यादा लैब बनाई गई हैं। जो किसान स्वाइल हेल्थ कार्ड का उपयोग कर रहा है, उसके यहां फसल उत्पादन बढ़ा है और उसने खेती में रसायन का उपयोग कम किया है। हम किसानों की चिंता के साथ धरती और धारा का भी ध्यान रख रहे हैं।

असंतुलित उर्वरकों के कारण धरती बीमार हो रही है, कहीं-कहीं जहर उगल रही है। दूसरे राज्यों में गेहूं का अच्छा उत्पादन करने वाले लोग दुकान में जाकर मध्यप्रदेश का गेहूं ढूंढते हैं। धरती हमारी मां है, हम इसी की गोद में बढ़ते हैं। जब तक धरती मां बीमार है, तब तक उसका पुत्र किसान कभी संपन्न नहीं हो सकता।

उन्होंने कहा कि यूरिया लेने के लिए पहले लाठियां खाई जाती थी। सस्ते यूरिया के लिए किसान नेपाल तक चले जाते हैं। दूसरी तरफ 40 फीसदी यूरिया केमिकल फैक्ट्री को, सिंथेटिक दूध बनाने के लिए जाता था। 2003 में प्रधानमंत्री अटलजी के समय की कमेटी की रिपोर्ट में था कि अगर यूरिया को नीम कोटेड कर दिया जाए यह यूरिया किसान ही उपयोग कर पाएंगे, लेकिन यूपीए ने 10 सालों तक कुछ नहीं किया। आज यूरिया 100 फीसदी किसानों के उपयोग में आ रहा है। इसलिए ना तो कोई संकट है और ना ही किसानों को यूरिया लेने के लिए लाठियां खानी पड़ रही है।

मंत्री ने कहा कि पहले दाल का उत्पादन 16 मिलियन टन था जो अब बढ़कर 24 मिलियन टन हो गया है।वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से प्रजनन क्षमता प्रभावित होगी। दुनिया के वैज्ञानिकों ने यह भी कहा था कि भारत की गायों में प्रतिरोधकता की क्षमता अधिक है, इससे उन पर जलवायु परिवर्तन का कुप्रभाव नहीं पड़ेगा। अटलजी का सपना था कि किसानों के लिए ई-मार्केटिंग हो, उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरा किया।

मंत्री राधामोहन सिंह ने कहा कि हमारे देश में गाय ग्रामीण भारत की आर्थिक स्थिति की मेरुदंड है। हमने देश मे 2 नेशनल कामधेनु ब्रीडिंग सेंटर बनाए हैं, जो जल्द ही अपना काम शुरू करेंगे। गोकुल केंद्र बनाए, ई-पशुधन हाट शुरू किए, नकुल स्वास्थ्य कार्ड भी शुरू किए, ये सब काम हमने 48 महीनों में किए हैं। हमने गायों के लिए राष्ट्रीय गोकुल मिशन बनाया और राज्यों को देशी गायों के लिए 600 करोड़ दिए। कई देशों में अपनी गायों की नस्लों के लिए ब्रीडिंग सेंटर है। प्रधानमंत्री ने भारत में भी इसके लिए शुरुआत की।

मंत्री ने कहा कि दूध उत्पादन की वृद्धि दर पूरे विश्व की 2 प्रतिशत है, लेकिन हमने 4 सालों में दूध का उत्पादन में 4 प्रतिशत की वृद्धि हासिल कर ली। इसी तरह अब हम ब्लू रेवोल्यूशन पर काम कर रहे हैं। इसके तहत मछली उत्पादन पर काम कर रहे हैं। कोस्टल इलाकों में तीन महीने मछली पकड़ने पर रोक रहती है, क्योंकि वो समय मछली के प्रजनन का समय होता है, इस दौरान मछुआरों को सरकार द्वारा आर्थिक मदद दी जाती है।

राधामोहन सिंह ने कहा कि हमारे प्रधानमंत्री ने कहा कि जो देश का खजाना है, इस पर सबसे पहला हक किसानों का है। हमारी सरकार आने के बाद वैज्ञानिकों की मदद से राज्य सरकारों द्वारा किसानों को प्लान उपलब्ध कराया गया ताकि सूखे के दौरान या प्राकृतिक आपदा में किस तरह खेती की जाए, ये बताया गया। जिसका फायदा किसानों को मिला।

उन्होंने कहा कि हमारी सरकार इस कोशिश में है कि जब भी फसलों की कीमत समर्थन मूल्य से नीचे जाए तो इसकी भरपाई किसानों से कैसे की जाए। इसे लेकर हम राज्य सरकारों के साथ लगातार बैठक कर रहे हैं। मंत्री ने कहा कि पहली बार जब हमारे प्रधानमंत्री से उनकी सरकार की प्रतिबद्धता के बारे में पूछता गया तो उन्होंने कहा था- गांव, गरीब और किसान।

मोदी सरकार के चार साल के कार्यकाल में 2 साल(चार सीजन) में रबी और खरीफ में सूखा पड़ा, इसके बावजूद देश में अनाज और दलहनों की कोई कमी नहीं आई। यूपीए सरकार के आखिरी 5 साल में कृषि का बजट एक लाख 61 हजार करोड़ का था। हमारे 5 साल के कार्यकाल का बजट दो लाख करोड़ से ज्यादा का है। बजट से अलग 40 हजार करोड़ का क्राप्स बजट भी दिया गया है।

राधा मोहन सिंह से सवाल-जवाब

भावांतर योजना से जुड़े सवाल पर राधामोहन ने कहा कि राज्य सरकार जो प्रस्ताव देगी, उस पर नीति आयोग से सलाह के बाद राज्य सरकार के अनुकूल ही फैसला लिया जाएगा। क्योंकि खरीदी तो राज्य सरकार को ही करनी है।

कृषि और उद्योग मंत्रालय के समन्वय से जुड़े सवाल पर कहा – कृषि के क्षेत्र में वेल्यू एडिशन का काम कर रहे हैं। कृषि और उद्योग को साथ लाने के लिए काम हो रहा है, फूड प्रोसेसिंग यूनिट इसी का उदाहरण है।

किसानों की समस्याओं को खत्म करने के सवाल पर मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा कि इतने सालों में योजनाओं के अभाव में किसानों के लिए समस्याओं का पहाड़ ही खड़ा हुआ है। किसान को लागत नहीं मिलती, उपज खरीदी नहीं होती, बिजली नहीं मिलती उसे भी कई समस्याएं हैं। लेकिन हमारी सरकार चरणबद्ध तरीके से इन्हें सुलझाने का प्रयास कर रही है।

 

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