अभिव्यक्ति देशद्रोह का परमिट नहीं हो सकती : जयकृष्ण गौड़

कम्युनिस्टों के विचारों से दुनिया प्रभावित हुई थी, सोवियत संघ में कम्युनिस्ट मॉडल की शासन व्यवस्था बनी। दुनिया में वर्ग संघर्ष के द्वारा सर्वहारा की विजय की चर्चा प्रारंभ हुई। भारत में भी जहां कल कारखाने हैं, वहां कम्युनिस्टों ने संगठन बनाए। पं. बंगाल एवं केरल में कम्युनिस्ट सरकार बनाने में सफल हुए, लेकिन जैसे ही सोवियत संघ का बिखराव हुआ, जिस रोटी, कपड़ा, मकान के लुभावने नारों से गरीब आकर्षित हुए थे, जब लोगों को डबल रोटी के लिए कतारे लगानी पड़ी तो सोवियत संघ की जनता ने आक्रोशित होकर न केवल कम्युनिस्ट शासन को उखाड़ फेंका बल्कि लेनिन, स्टालिन नेताओं की प्रतिमाओं को भी ध्वस्त कर दिया। जिस तरह ड्रग के नशे से जीवन नष्ट हो जाता है, उसी तरह कम्युनिस्टों ने अपने विचारों के कथित बुद्धिजीवी तैयार किए। हालांकि इन विचारों को दुनिया के साथ भारत की जनता ने भी नकार दिया, लेकिन इन नास्तिक विचारों का थोड़ा बहुत प्रभाव पं. बंगाल, केरल में है। कम्युनिस्ट जहां भी शासन में रहे वहां उन्होंने सत्ता के बल पर विरोधियों को दबाना, कुचलना प्रारंभ किया। केरल में शासन पर काबिज होने से वहां लगातार देश भक्त संगठनों पर हमले हो रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों की हत्या की जा रही है। उनके घर जलाये जा रहे है। केरल संघ कार्यालय पर बम से हमले किए जा रहे हैं। संघ के स्वयंसेवक संस्कारित हैं वे सहिष्णु और मानीवय संवेदना से प्रेरित हैं, ऐसे स्वयंसेवकों की हत्याओं को रोकने की बजाय केरल सरकार कम्युनिस्ट गुंडों को हत्या के लिए प्रेरित करती है। वहां कम्युनिस्ट तानाशाही का खूनी खेल चल रहा है, पूरे देश में धरना, प्रदर्शन कर संघ के स्वयंसेवकों एवं नागरिकों ने केरल में कम्युनिस्टों द्वारा की जा रही हत्याओं का विरोध किया। कम्युनिस्टों की तानाशाही विचारभूमि से नक्सलवाद, माओवाद, लेनिनवादी आतंकी संगठन पैदा हुए हैं। इस बारे में कम्युनिस्टों के इतिहास को भी थोड़ा खंगालना होगा, आजादी के संघर्ष के दौरान भी इन कॉमरेडों ने देश भक्तों के साथ गद्दारी की। नेताजी सुभाषचंद्र बोस को जापान के प्रचार मंत्री तोजो का कुत्ता कहा। जब इंदिराजी ने लोकतंत्र का गला घोंटकर आपातकाल लागू किया, तो कम्युनिस्ट पार्टी ने आपातकाल का समर्थन किया, लेकिन मार्क्सवादियों ने साथ नहीं दिया। इनका देश के साथ गद्दारी का इतिहास रहा है, अब भी ये कॉमरेड कभी चीन की कंपनियों को रियायसत देने की बात करते हैं, कभी कश्मीर के अलगाववादियों, सुरक्षा जवानों पर पत्थरों से हमला करने एवं आतंकियों को संरक्षण देने वालों के समर्थन में खड़े दिखाई देते हैंं। कभी सहिष्णुता की चर्चा के द्वारा मोदी सरकार को घेरने की कोशिश करते हैं। इनके विचार के वामपंथी लेखक मेडल वापस करने का नाटक करते हैं। हालांकि राजनीतिक दृष्टि से इनके किले ध्वस्त हो गए हैं, लेकिन शैक्षणिक जगत में वामपंथी संगठन एआईएसए सक्रिय है, उमर खालिद, कन्हैया जैसे नेता जवाहरलाल नेहरू वि.वि. में जब अफजल गुरु वासित जैसे आतंकियों के समर्थन में नारे लगाते है। कश्मीर की आजादी की मांग करते है। नक्सलियों के शहीद भगतसिंह बताते है और विश्वविद्यालयों की दीवारों पर ऐसे पोस्टर चस्पा करते है। इनके समर्थन में कम्युनिस्ट, कांगे्रस आप के नेता खड़े हो जाते है। जब देश भक्त छात्र संगठन अभा विद्यार्थी परिषद के छात्रों ने देशद्रोहियों का तीखा विरोध किया तो ये देशद्रोहियों के समर्थन में अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे का माहौल बनाने लगे। कुछ मीडिया घराने भी देश विरोधी तत्वों के समर्थन में समाचार प्रसारित करने लगे। उमर खालिद, कन्हैया जैसे देशद्रोही छात्रों का समर्थन करने वाले नेता चाहे सीताराम येचुरी हो या राहुल गांधी हो, ये देश की अखंडता को खंडित करने की साजिश करने वाले गद्दरों के रक्षा कवच बनकर खड़े हो जाते हैं। अभिव्यक्ति की आजादी देशद्रोह का परमिट नहीं हो सकती। दुनिया के किसी भी देश में देशद्रोहियों को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, इन्हें सख्ती से कुचल दिया जाता है। इनकी पैरोकारी करने वाले भी वैसे ही हैं, जिन्हें जयचंद की श्रेणी में रखा जा सकता है। दुनिया के किसी देश में संविधान, व्यवस्था और कानून के ऊपर राष्ट्र हित रहता है। भारत में भी संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था और संवैधानिक अधिकार देश के लिए है, अभिव्यक्ति के नाम पर देश हित को बलिदान नहीं किया जा सकता। वामपंथी विचार ऐसा धीमा जहर है जो देश की जड़ों को कमजोर करता है। इस जहर का स्वाद चखने राहुल, लालू यादव आदि नेता भी लपकते है। अभी जनेविवि में देश विरोधी कोलाहल शांत नहीं हुआ था कि दिल्ली वि.वि. की छात्रा गुरमेहर कौर ने ट्वीटर के द्वारा कहा कि उनको धौंस दी जा रही है और अश्लील बातें की जाती है, उन्होंने ये आरोप विद्यार्थी परिषद पर लगाए। उन्होंने अपने शहीद पिता के बारे में कहा कि वे कारगिल युद्ध में मारे गए, पाकिस्तान ने उन्हें नहीं मारा। इस सच्चाई को सब जानते है कि पाकिस्तान की सेना से कारगिल में लड़ाई हुई और उनके पिता पाकिस्तानी सैनिक के प्रहार से शहीद हुए। पाकिस्तान द्वारा थोपे गए युद्ध में शहीद हुए। इन सेकूलरों, इन कॉमरेडों ने गुरमेहर को अभिव्यक्ति का प्रतीक बनाकर प्रचारित किया। मीडिया ने भी इस संदर्भ के साथ अभिव्यक्ति पर बहस प्रारंभ की। देश भक्तों और देश विरोधियों के बीच चले संघर्ष को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की ओर मोड़ दिया। हमारे यहां जिस बारे में बहस केन्द्रित होना चाहिए, उसे नए मुद्दे के साथ प्रस्तुत कर बहस प्रारंभ हो जाती है। जब मुस्लिम महिलाओं का जीवन तीन तलाक से बर्बाद होने का विरोध प्रारंभ हुआ तो इसे मजहब पर प्रहार बताया गया। इसके साथ ही सेकूलर नेताओं ने यह कहना शुरू कर दिया कि भाजपा साम्प्रदायिक एजेन्डा चला रही है। इसी प्रकार जब समान कानून और कश्मीर की अलग पहचान बताने वाली अस्थायी धारा 370 को हटाने की चर्चा शुरू होती है तो इसकी भी साम्प्रदायिक एजेंडा कहकर आलोचना की जाती है। दिल्ली वि.वि. में खुले आम कश्मीर की आजादी, नक्सलियों को शहीद बनाने के पोस्टर चस्पा किए गए है। अब तो महामना पं. मदनमोहन मालवीय द्वारा स्थापित काशी हिन्दू वि.वि. को बदनाम करने की भी कोशिश की गई। इससे जाहिर है कि न केवल भारत के देश विरोधी संगठन बल्कि बाहर की ताकते भी भारत को अस्थिर करने के लिए छात्र जगत में देश विरोधी जहर घोल रही है। भारत के युवाओं को देश विरोधी विचारों के समर्थन खड़े करने की साजिश हो रही है। राष्ट्रवादी विचार प्रवाह से इसे असफल करना होगा। अलीगढ़ मुस्लिम वि.वि. में 1947 के पहले से ही मजहबी आधार पर देश को तोडऩे की मुहिम मुस्लिम छात्रों ने प्रारंभ की। इसके बाद पूरे देश में देश विभाजन की मांग उठी और लाखों लोगों के खून से देश विभाजन की रेखा खींची गई। उसी तरह की साजिश अब भी घिसे पीटे वाम पंथियों और चीन पाकिस्तान की ओर से चलाई जा रही है। राशिद अलवी जैसे कांग्रेेसी नेता यह सवाल करते है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में ही ऐसे विवाद क्यों होते है? सवाल इसलिए सही है कि कांगे्रस की सरकारों के समय देश विरोधी साजिश करने की खुली छूट दी जाती थीं। राष्ट्रभाव से प्रेरित संगठन और छात्रों को दबाया जाता था। अब राष्ट्रवादी सरकार केन्द्र में होने से ऐसे देश विरोधियों को उतना अवसर नहीं मिलता। देश को खंडित करने के षड्यंत्र को असफल करने के लिए यदि अभिव्यक्ति, सहिष्णुता और सेकूलरी विचारों से हटकर कार्रवाई की जाए तो इससे भी किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यह देश बचाने का संघर्ष है। इसमें विजयी होने के लिए राष्ट्रवादी विचार के प्रवाह को इतना तेज करना होगा जिससे ये छद्म सेकूलरी देशद्रोह पर अभिव्यक्ति का नकाब न लगा सके। इन मानवतावादी और वोटों के सौदागरों की साजिश सफल नहीं हो सके। विदेशी ताकतों का षड्यंत्र भी तभी ध्वस्त होगा, जब राष्ट्रभाव से प्रेरित जनशक्ति होगी। देश से ऊपर न अभिव्यक्ति होती है और न संविधान।

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